scriptPolitical parties promising free schemes to the public in elections | Patrika Opinion : चुनावी वादों में 'मुफ्त की चाशनी' | Patrika News

Patrika Opinion : चुनावी वादों में 'मुफ्त की चाशनी'

- चिंता की बात यही है कि आजादी के सत्तर साल बीत जाने के बावजूद विकास की बातें करने के बजाए हमारे नेता न केवल भाषणों में जनता से सस्ती या मुफ्त योजनाओं का चुनावी वादा करते हैं बल्कि राजनीतिक दल चुनावी घोषणा-पत्रों की इबारत में यह सब मोटे अक्षरों में लिख देते हैं। जैसे जनता अब भी इन लुभावने वादों के पीछे उनकी मंशा समझेगी ही नहीं।

नई दिल्ली

Published: October 26, 2021 08:13:58 am

हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा होय।' चुनावी समर में कूदने वाले राजनीतिक दल व उनके नेता जब जनता को वस्तु व सेवाएं मुफ्त उपलब्ध कराने का दावा करते हैं तो यह लोकोक्ति याद आ ही जाती है। अगले साल की शुरुआत में ही उत्तरप्रदेश व पंजाब समेत पांच राज्यों के चुनावों के लिए भी लोकलुभावन घोषणाओं की कुछ ने शुरुआत कर दी है और कुछ आगामी दिनों में करने वाले हैं। कहीं मुफ्त बिजली, कहीं किसानों की कर्ज माफी का ऐलान, कहीं मुफ्त इलाज और कहीं लैपटॉप, साइकिल-स्कूटी और अन्य वस्तुओं को मुफ्त में देने की बातें या तो हो गई हैं या फिर होने वाली हैं। छोटे से लेकर बड़े राजनीतिक दल में जैसे होड़-सी लगने वाली है कि मुफ्तखोरी की ऐसी योजनाओंं में कौन-किससे कितना आगे रहता है।

Patrika Opinion : चुनावी वादों में 'मुफ्त की चाशनी'
Patrika Opinion : चुनावी वादों में 'मुफ्त की चाशनी'

चिंता की बात यही है कि आजादी के सत्तर साल बीत जाने के बावजूद विकास की बातें करने के बजाए हमारे नेता न केवल भाषणों में जनता से सस्ती या मुफ्त योजनाओं का चुनावी वादा करते हैं बल्कि राजनीतिक दल चुनावी घोषणा-पत्रों की इबारत में यह सब मोटे अक्षरों में लिख देते हैं। जैसे जनता अब भी इन लुभावने वादों के पीछे उनकी मंशा समझेगी ही नहीं।

चुनाव वाले राज्यों में ही नहीं, बल्कि समूचे देश में जनता को बिजली-पानी, सड़क, चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं की ज्यादा जरूरत है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे वादे यों तो बरसों पहले से किए जा रहे हैं। हर बार इस व्यवस्था पर सवाल भी खड़े होते आए हैं। बड़ा सवाल यही है कि क्या इस तरह के वादे मतदाताओं को सीधे-सीधे प्रलोभन के रूप में नहीं माने जाने चाहिए। राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद बेरोजगारी खत्म करने, महंगाई कम करने व विकास कार्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की बातें न केवल कहें, बल्कि उन पर अमल भी करें तो अच्छा लगता है। देखा जाए तो जनता खुद नहीं चाहती कि उसे पानी-बिजली, लैपटॉप, स्मार्टफोन जैसी चीजें मुफ्त में दी जाएं। देश का प्रत्येक युवा पढ़-लिखकर सक्षम बन जाए तो फिर ऐसी योजनाओं की भला आवश्यकता ही क्यों रह जाएगी?

जनता द्वारा चुकाए गए करों से जुटाई गई रकम मुफ्त में इस तरह से लुटाने का अधिकार किसी को भी कैसे मिल सकता है? क्या ऐसे बोझ से विकास कार्यों के लिए कोष का संकट पैदा नहीं होगा? लेकिन शीर्ष अदालत व राज्यों के हाईकोर्ट की टिप्पणियों के बावजूद सब कुछ जारी है। चुनाव आयोग भी आंखें मूंदे बैठे हैं। जाहिर है राजनीतिक दलोंं को सिर्फ वोटबैंक नजर आता है और उसे वे मुफ्त की चुनावी चाशनी में लिपटे वादों में ही तलाशते रहना चाहते हैं।

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