scriptPolitical stir amid appointment of future army chief | भावी सेना प्रमुख की नियुक्ति के बीच राजनीतिक हलचल | Patrika News

भावी सेना प्रमुख की नियुक्ति के बीच राजनीतिक हलचल

Published: Sep 28, 2022 07:55:49 pm

Submitted by:

Patrika Desk

पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान अपने खुद के अनुभव से वाकिफ हैं कि सेना कितनी ताकतवर है और उसके मुखिया किस तरह राजनीतिक नियति बदल सकते हैं। इतिहास इसका साक्षी भी है कि किस तरह सेना प्रमुख अयूब खान, जिया-उल-हक और परवेज मुशर्रफ ने नागरिक सरकारों को गिरा दिया था और वे देश के शासक बन बैठे थे। गौरतलब है कि इमरान खान भी सेना के समर्थन से ही सत्ता तक पहुंच सके थे।

भावी सेना प्रमुख की नियुक्ति के बीच राजनीतिक हलचल
भावी सेना प्रमुख की नियुक्ति के बीच राजनीतिक हलचल
अरुण जोशी
दक्षिण एशियाई कूटनीतिक मामलों के जानकार

पाकिस्तान का अगला सेना प्रमुख कौन होगा, इसे लेकर गहन अटकलें जारी हैं। नए सेना प्रमुख की नियुक्ति नवंबर में की जानी है, लेकिन अभी से ही यह चर्चा है कि इस नियुक्ति मेंवरिष्ठता और योग्यता की बजाय किस चीज को प्राथमिकता दी जाएगी? इस बार इस पद पर नियुक्ति को लेकर संदेह पाकिस्तान में विपक्ष के नेता इमरान खान ने उत्पन्न किया है। इमरान जनसमूह को लामबंद करने और उसे इस विचार के इर्द-गिर्द झटके से मोडऩे में समर्थ रहे हैं कि शहबाज सरकार ने जो कुछ किया है, कर रही है या आगे करेगी, वह साफ तौर पर गलत है। वह सेना प्रमुख की नियुक्ति को लेकर भी यही तर्क दे रहे हैं।
सवाल यह है कि इमरान को सेना प्रमुख के बारे में इतना चिंतित क्यों होना चाहिए और सरकार को इस मुद्दे पर जवाबी हमला क्यों करना चाहिए। असल में इन मुद्दों को सभी वर्ग के लोगों और विचारकों के दिमाग में भर दिया गया है, जो जानते हैं कि पाकिस्तान सेना द्वारा चलाया जाता है और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बाधित करने में इसकी भूमिका है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान अपने खुद के अनुभव से वाकिफ हैं कि सेना कितनी ताकतवर है और उसके मुखिया किस तरह राजनीतिक नियति बदल सकते हैं। इतिहास इसका साक्षी भी है कि किस तरह सेना प्रमुख अयूब खान, जिया-उल-हक और परवेज मुशर्रफ ने नागरिक सरकारों को गिरा दिया था और वे देश के शासक बन बैठे थे। गौरतलब है कि इमरान खान भी सेना के समर्थन से ही सत्ता तक पहुंच सके थे। 2018 के चुनावों में वह पाकिस्तानी सेना के पसंदीदा थे। कई विश्लेषकों ने कहा भी था कि चुनावों से महीनों पहले, सैन्य और खुफिया अधिकारियों ने विरोधी पार्टियों के नेताओं को धमकाया और ब्लैकमेल किया था, ताकि उनकी जीत का रास्ता साफ हो सके। इन सबके पीछे भी वजह थी। नवाज शरीफ विदेश और सुरक्षा नीति पर पकड़ बनाए थे। वे सेना के लिए चुनौती बने हुए थे और सेना उन्हें हटाने पर आमादा थी। सेना ने अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए नवाज शरीफ की पीएमएल-एन पार्टी की कुछ प्रमुख हस्तियों को इमरान के पक्ष में करने का इंतजाम किया था। इमरान खान ने भी वही गलती की जो नवाज शरीफ ने की थी। ले.ज. फैज हमीद की जगह ले.ज. नदीम अंजुम को आइएसआइ का नया प्रमुख नियुक्त करने की जनरल बाजवा की सिफारिश पर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने ध्यान नहीं दिया। हालांकि बाद में उनको इसे अपनी मंजूरी देनी पड़ी थी। सरकार-सेना के बीच तकरार का यह शुरुआती बिन्दु था। यह घटना अक्टूबर 2021 की है।
मार्च 2022 तक, सरकार और सेना के बीच रिश्ते टूटने तक पहुंच चुके थे। इमरान ने अप्रेल में अपनी सरकार के गिर जाने को अमरीका और विपक्ष की साजिश के हिस्से के रूप में देखा। उन्हें भरोसा था कि सेना उनकी मदद के लिए आएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नेशनल असेम्बली में इमरान खान के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग के राजनीतिक नाटक के बीच सेना ने तटस्थ होने का दावा किया। इमरान ने इस तटस्थता को साजिश के हिस्से के रूप में देखा। प्रधानमंत्री पद के चले जाने के बाद इमरान ने देश में जल्द चुनाव कराने के लिए अभियान चलाया। उन्हें विश्वास था कि जनता, विशेषकर युवाओं के मिल रहे समर्थन के बलबूते वह सत्ता में वापसी कर सकते हैं। वैसे चुनाव 2023 के मध्य में होने हैं। जल्द चुनाव के लिए उनकी गतिविधि इस विचार पर आधारित है कि नवंबर में उनकी पसंद का सेना प्रमुख नियुक्त होने से चुनाव जीतने पर वह आसानी और बिना किसी दिक्कत के अपना कार्यकाल जारी रख सकेंगे। अब उन्होंने अपनी रणनीति बदल दी है। कहा है कि या तो जल्द चुनाव हों अथवा चुनाव खत्म होने तक मौजूदा सेना प्रमुख को विस्तार दिया जाए। उन्होंने सितंबर के पहले हफ्ते में फैसलाबाद की एक रैली में दावा किया कि शहबाज शरीफ सरकार जल्द चुनाव से इसलिए बच रही है कि अगर एक देशभक्त सेना प्रमुख नियुक्त हो गया तो वह गलत तरीके से अर्जित उनकी सम्पत्ति के बारे में उनसे पूछेगा।
सरकार अपने तरीके से सोच रही है, आकलन कर रही है। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति की सलाह से सेना प्रमुख की नियुक्ति पर निर्णय लेते हैं लेकिन रिटायर हो रहे सेना प्रमुख अपने उत्तराधिकारी के नामों को शॉर्टलिस्ट करते हैं और फिर प्रधानमंत्री को भेजते हैं। उनका इनपुट ज्यादा मायने लिए होता है। पाकिस्तान के राजनीतिक हालात ने दबाव बनाया है। शायद यह पहला अवसर है जब इमरान की 'स्ट्रीट पावरÓ और पूर्व में ऐसी नियुक्तियों की परम्परा के बीच विवादित स्थिति बन रही है। अगला सेना प्रमुख जो भी होगा, उसे अपने कार्यकाल के दौरान राजनीतिक खींचतान का सामना करना होगा। अभी यह अनिश्चित है कि नवम्बर में माहौल कैसा रहेगा?

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