मौज मस्ती की राजनीति

राजस्थान की जनता कोरोना संकट से ग्रस्त है। शहर हो या गांव-कस्बे हर जगह त्राहि-त्राहि मची है। दूसरी ओर राजस्थान के जन प्रतिनिधि (विधायक) ‘बाड़ेबंदी’ के नाम से पांच-सितारा होटलों में मौज-मस्ती में जुटे हैं।

By: भुवनेश जैन

Published: 17 Jun 2020, 10:45 AM IST

- भुवनेश जैन

राजस्थान की जनता कोरोना संकट में ग्रस्त है। शहर हो या गांव-कस्बे हर जगह त्राहि-त्राहि मची है। दूसरी ओर राजस्थान के जन प्रतिनिधि (विधायक) ‘बाड़ेबंदी’ के नाम से पांच-सितारा होटलों में मौज-मस्ती में जुटे हैं। पिछले एक सप्ताह से केवल सरकार और उसके मंत्री-विधायक ही यह स्वर्गिक सुख भोग रहे थे। अब खरबूजे को देखकर दूसरे खरबूजे ने भी रंग बदल लिया है। भाजपा विधायक भी चुनाव प्रशिक्षण के नाम पर तीन-चार दिन दूसरे पांच सितारा होटल में इकट्ठे हो रहे हैं। राजस्थान की जनता हैरत से अपने प्रतिनिधियों को देख रही है। क्या इसी दिन के लिए उन्हें चुना था कि जब जरूरत सबसे ज्यादा है तभी उनके प्रतिनिधि उन्हें भीषण गर्मी में कोरोना से जूझते हुए छोडकऱ वातानुकूलित कक्षों की ठंडक और नर्म बिस्तरों में जाकर दुबक जाएं।

अचरज की बात तो यह है कि 10 जून के बाद पूरी सरकार ही पांच सितारा होटल से चल रही है। अफसर फाइलें लेकर सुबह-शाम शहर से दूर स्थित होटल की ओर दौड़ लगाते हैं और मंत्रीगण वहीं पर बैठकर फाइलें निपटाते हैं। क्या सरकार को मंत्रियों पर भी विश्वास नहीं है? कम से कम उन्हें तो सचिवालय में या सरकारी आवासों में छोड़ा जा सकता था। होटल में वर्कशॉप, मीटिंग, डिनर, बर्थ डे पार्टी, खेलकूद, सिनेमा, हास्य कवि सम्मेलन सब चल रहा है। यानी मौज मस्ती और मनोरंजन का पूरा प्रबंध। वहां के फोटो यह भेद भी खोल रहे हैं कि न तो सोशल डिस्टेंसिंग की पालना की जा रही है और न फेस मास्क आदि लगाने का पूरा ध्यान रखा जा रहा है।

भाजपा हो या कांग्रेस दोनों दल दूषित राजनीति के हर हथकंडे अपना रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में बाड़ेबंदी के नाम पर ‘रिसोर्ट संस्कृति’ खूब फल-फूल रही है। जनप्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त खुले आम हो रही है। होना तो यह चाहिए कि जनप्रतिनिधियों के चरित्र को मजबूत बनाने पर जोर दिया जाए। गांधीवादी तौर-तरीकों को बढ़ावा दिया जाता। पर नेतृत्व भी अब मानकर चलता है कि उनकी पार्टी के सदस्य मौका मिलते ही ईमान बेच देंगे (जो सही साबित हो भी रहा है)। इससे बचने के लिए उससे भी ज्यादा गलत कदम उठाया जाता है-बाड़ेबंदी का। बाड़ेबंदी के दौरान कथित ‘नजरबंदी’ में ऐशो-आराम का पूरा ध्यान रखा जाता है।

जब जनता अपने नेताओं को बिना मास्क पहने, बिना सुरक्षित दूरी का ध्यान रखे डिनर खाते, फुटबाल या क्रिकेट खेलते देखती है तो उसे लगता है कि कोरोना में सावधानी की शायद कोई जरूरत नहीं है। बिना बात ही उसे लॉकडाउन और कर्फ्यू के कष्टों में जीने को मजबूर किया जा रहा है। कड़े नियमों की याद मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों को तभी आती है जब उन्हें कोरोना के कष्ट झेल रही जनता के बीच जाना होता है। आज यदि एक भी जनप्रतिनिधि कोरोना से पीडि़त मरने वालों के परिजनों से मिलने चला जाए तो उसे शायद पता लगे कि उसके क्षेत्र की जनता क्या कष्ट भोग रही है। अस्पतालों में उपचार की हकीकत क्या है? कोरोना के नाम पर कौन पैसा बना रहा है?

बाड़ेबंदी राजनीतिक ड्रामेबाजी की निकृष्टतम खोज है। बेईमानी से लडऩे के लिए बेईमानी का उपयोग। जनता के कष्टों से आंखें मूंदकर ऐशो-आराम में मग्न होने का साधन। जनता की पीड़ा पर अट्टहास। मगरमच्छी आंसूओं की पीछे अट्टहास की मुद्राएं कब तक छुपी रहेंगी?

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भुवनेश जैन
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