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अपने आराध्य की निंदा के रास्ते स्तुति भी स्वीकार्य

बात-बात पर आस्था के आहत होने का बहाना तलाशने वाले लोगों के लिए राजस्थानी के प्राचीन कवि ईसरदास बारहठ की रचना 'निंदा-स्तुति' का उदाहरण रोचक हो सकता है। ईसरदास बारहठ के लिए लोक में 'ईसरा सो परमेसरा' जैसी उक्ति प्रचलित है और उनका जीवन अनेक चमत्कारों के आख्यान से जुड़ा है। ईसरदास बारहठ ने 'निंदा-स्तुति' नाम से एक किताब लिखी। इसमें विभिन्न अवतारों की स्तुति इस तरह से की गई है कि वह प्रथम दृष्ट्या निंदा प्रतीत होती है।

Published: July 08, 2022 07:09:00 pm

अतुल कनक
साहित्यकार और
लेखक

संसार के सभी धार्मिक विश्वासों का आधार भक्ति है। भक्ति शब्द की उत्पत्ति भज् धातु से हुई है, जिसका अर्थ है - 'सेवा करना' या 'भजना'। इसका अर्थ यह हुआ कि श्रद्धापूर्वक अपने आराध्य के प्रति समर्पण का भाव भक्ति है। महर्षि दयानंद ने लिखा है कि जिस प्रकार अग्नि के पास जाने से ठंड की अनुभूति कम हो जाती है और ताप का अनुभव होने लगता है, ठीक उसी प्रकार प्रभु के स्मरण से दुख कम हो जाता है और आनंद की अनुभूति होती है। भारतीय शास्त्रों में भक्ति के अनेक रूप और साधन बताए गए हैं, लेकिन हर रूप में भक्ति की एक ही शर्त है, अपने आराध्य के प्रति समर्पण।
भक्ति का आनंद अद्भुत है। एक बार उस आनंद की उपलब्धि होने पर दुनिया की कोई भी शक्ति उसे खंडित नहीं कर सकती। बृज की गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम भक्ति का ही एक रूप था। कहते हैं कि एक बार गोपियों ने कृष्ण से पूछा कि तुम हमें क्या सुख दे सकते हो? कृष्ण ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया था कि मैं तुम्हें सुख नहीं, आनंद दे सकता हूं। आनंद जब उपलब्ध हो जाता है, तो वह अखण्ड होता है। दुर्भाग्य से दुनिया ने पाखंड को भी भक्ति मानना शुरू कर दिया और आसक्ति को आनंद की उपलब्धि का साधन। कृष्ण ने गोकुल छोड़ दिया, लेकिन गोपियों का प्रेम अक्षुण्ण बना रहा, क्योंकि वास्तविक प्रेम देह के सामीप्य के समीकरणों को नहीं साधता। कहते हैं कि एक बार कृष्ण ने अपने मित्र उद्धव को यह कहते हुए बृज भेजा कि वे गोपियों को निर्गुण भक्ति की सीख दें। लेकिन गोपियों ने अपने प्रेम के पक्ष में ऐसे-ऐसे तर्क दिए कि उद्धव जवाब नहीं दे सके।
सूरदास ने अपनी रचना भ्रमर गीत में इस संदर्भ में कई पद लिखे हैं। उनकी गोपियां प्रेम में उन कृष्ण को कोसने से भी नहीं शर्मातीं, जो कृष्ण अवतार हैं और जिनसे वे गोपियां अगाध प्रेम करती हैं। एक छंद में गोपियां कहती हैं -'मधुकर! श्याम हमारे चोर/ मन हरि लियो, माधुरि मूरति चितै नयन की कोर।Ó अर्थात् 'सुनो उद्धव, कृष्ण तो चोर अर्थात् हमारे अपराधी हैं। उन्होंने अपने नयनों की कोरों से हमें देख-देख कर हमारा चित्त चुरा लिया है।' आराध्य को चोर कौन कहता है। लेकिन जब सखा भाव की भक्ति जागृत होती है, तो वह अपने आराध्य को भी उलाहना देने से नहीं चूकती। लोकजीवन इससे आहत नहीं होता, क्योंकि इन उलाहनों के मूल में छुपी आस्था को वह समझता है। सूरदास की गोपियां तो इससे भी आगे जाकर यहां तक कहती हैं - 'ऊधो! सब स्वारथ के लोग!/आपुन केलि करत कुब्जा संग, हमहिं सिखावत जोग।' अर्थात् 'हे उद्धव, सब लोग स्वार्थ का रिश्ता रखते हैं। ( कृष्ण) खुद तो कुब्जा के संग लीला रचाते हैं और हमें योग की शिक्षा देना चाहते हैं?Ó सोचिए, क्या कोई अपने आराध्य को स्वार्थी कहने की गुस्ताखी करेगा? लेकिन जब समर्पण अपने चरम पर होता है, तो वह सब कुछ बिसर जाता है। वह येन-केन-प्रकारेण यानी उलाहना देकर भी अपने प्रिय का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहता है। तभी तो मीरा अपने आराध्य को खरीद लेने का दम भरते हुए कहती रहीं - 'माई री मैं तो लियो री गोविन्दो मोल।' भगवान बिकाऊ नहीं होते। भगवान को खरीद लेने की बात आज के दौर में आस्था को आहत करने का बहाना बन सकती है, लेकिन भगवान तो भक्त की भावनाओं को समझते हैं। वे आहत नहीं होते।
बात-बात पर आस्था के आहत होने का बहाना तलाशने वाले लोगों के लिए राजस्थानी के प्राचीन कवि ईसरदास बारहठ की रचना 'निंदा-स्तुति' का उदाहरण रोचक हो सकता है। ईसरदास बारहठ के लिए लोक में 'ईसरा सो परमेसरा' जैसी उक्ति प्रचलित है और उनका जीवन अनेक चमत्कारों के आख्यान से जुड़ा है। ईसरदास बारहठ ने 'निंदा-स्तुति' नाम से एक किताब लिखी। इसमें विभिन्न अवतारों की स्तुति इस तरह से की गई है कि वह प्रथम दृष्ट्या निंदा प्रतीत होती है। लेकिन, वस्तुत: कवि इस रूप में परमात्मा का स्मरण करते हुए अपनी मुक्ति की कामना करता है। ईसरदास इस कृति में लिखते हैं - 'मासी गिणै न मन में मामा, करै तसा पहुंचावै कामा।' (अर्थात् न तेरे कोई मौसी है, न मामा। तू किसी का सगा नहीं है, क्योंकि सबको उनके कर्मों के अनुसार फल देता है।) इस कृति में विविध अवतारों की लीलाओं को उपालंभ का आधार बनाया गया है।
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