प्रवाह : पुण्य के मुखौटे में पाप

पिछले कुछ दशकों में भ्रष्टाचार राजस्थान में शिष्टाचार का रूप ले चुका है। पकड़े जाने के बाद भी कई अधिकारियों के चेहरों पर किसी तरह की चिंता दिखाई नहीं देती।

By: भुवनेश जैन

Published: 12 Apr 2021, 07:36 AM IST

- भुवनेश जैन

भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (एसीबी) बधाई का पात्र है। पिछले कुछ माह से वह राजस्थान में भ्रष्टाचार में लिप्त बड़े-छोटे सब तरह के अधिकारियों के चेहरों से ईमानदारी का मुखौटा उतारने में लगा है। इस दौरान की गई कार्रवाइयों और सामने आए चेहरों से स्पष्ट है कि पिछले कुछ दशकों में भ्रष्टाचार राजस्थान में शिष्टाचार का रूप ले चुका है। पकड़े जाने के बाद भी कई अधिकारियों के चेहरों पर किसी तरह की चिंता दिखाई नहीं देती। शायद उन्हें भरोसा है कि राजनीतिक संरक्षण के बूते पर या तो वे सबूतों को कमजोर करवा देंगे या फिर उन पर मुकदमे चलाने की अनुमति ही नहीं दी जाएगी।

चिंता की बात यह है कि राजस्व मंडल जैसी संस्था में भी भ्रष्टाचार जड़े जमाने लगा है। राजस्व मंडल को भू-राजस्व मामलों का उच्च न्यायालय कहा जाता है। प्रदेशभर के राजस्व न्यायालयों की अपीलें, रिवीजन और रेफरेंस मामले राजस्व मंडल के पास आते हैं। रियासती काल में लगान वसूली के नाम पर गरीब, निरक्षर और भोले-भाले किसानों पर जम कर जुल्म ढाए जाते थे। हर रियासत और उससे जुड़े जागीरदारों ने इसके लिए अपने-अपने हिसाब से मनमाने नियम-कानून बना रखे थे। कृषि राजस्व की मोटी रकम तो जागीरदारों और रियासतों को जाती ही थी, भूमि संबंधी दस्तावेज में भी मनमाना फेरबदल किया जाता था। ग्रामीणों और किसानों को इस मनमानी से मुक्ति दिलाने के लिए ही खर्चीली और समय खर्च करने वाली न्यायिक व्यवस्था से अलग राजस्व न्यायालयों की व्यवस्था शुरू की गई थी, जिसे अब भ्रष्टाचार और निष्क्रियता की दीमक खोखला कर चुकी है।

वर्तमान में राजस्व मंडल के लगभग ६४ हजार मामले लम्बित हैं। पिछले डेढ़ साल में तो केवल नाममात्र के फैसले हुए हैं। जयपुर के रामगढ़ बांध के भराव क्षेत्र से अतिक्रमण नहीं हट पा रहे तो इसका मुख्य कारण यह है कि इससे संबंधित बहुत से मामले राजस्व मंडल में फाइलों की कब्रगाह में दफन पड़े हैं। एक बार किसी मामले में स्टे लग गया तो वर्षों तक स्टे जारी रहता है। सदस्यों के एक-तिहाई पद रिक्त पड़े हैं। मंडल में दलालों का बोलबाला है, जो पैसों के बदले मनमाना फैसला लाने का दावा करते हैं।

राजस्व मंडल में आने वाले मामलों में भ्रष्टाचार के चलते गरीब व असहाय लोगों को न्याय नहीं मिल पाता। सरकारें एक तरफ ग्रामीण और किसानों की हितचिंतक होने का दावा करती हैं, दूसरी ओर वे यहां आकर स्वयं को ठगा सा महसूस करते हैं। प्रभावशाली और सम्पन्न लोग लम्बे-लम्बे स्टे पाने में सफल हो जाते हैं।

राजस्व मंडल का गठन जिन उद्देश्यों के लिए किया गया था, उनकी पवित्रता बनाए रखना हर सरकार की जिम्मेदारी है। तभी कथनी और करनी में साम्यता नजर आएगी। सरकार को एसीबी की पीठ थपथपानी चाहिए और राजस्व मंडल में फैल रही भ्रष्टाचार की जड़े साफ करने का संकल्प लेना चाहिए।

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