प्रवाह : मत पधारो 26 को...

तकनीकी चाहे कितनी ही विकसित हो जाए, हमारे नेता और अफसर अब भी दशकों पुरानी लकीर पर चले जा रहे हैं। क्या यह तथ्य हमारे अफसरों की 'बौद्धिक क्षमता' को प्रदर्शित नहीं करता कि दिसंबर 2019 में घोषित इस 'रीट' को पांच बार स्थगित किया जा चुका है। अब भी 16.51 लाख परीक्षार्थियों की एक ही दिन में परीक्षा ली जाएगी।

By: भुवनेश जैन

Published: 24 Sep 2021, 06:30 AM IST

- भुवनेश जैन

पधारो म्हारा देस! आपका राजस्थान में स्वागत है। पर 26 सितम्बर को मत आना। जाने कब क्या हो जाए! यह दिन ऐसा होगा, जब प्रदेश के विभिन्न जिलों में अव्यवस्था का आलम होने की आशंका है। यदि युद्धस्तर पर प्रयास कर उचित कदम नहीं उठाए गए तो अव्यवस्था अराजकता में भी बदल सकती है।

26 सितम्बर को ऐसी स्थिति बनने जा रही है-हमारे प्रदेश की 'काबिल' अफसरशाही की अदूरदर्शिता और मनमाने निर्णय के कारण। इस दिन पूरे प्रदेश में एक साथ अध्यापक पात्रता परीक्षा (रीट) करवाई जाएगी। साढ़े सोलह लाख परीक्षार्थी परीक्षा केंद्रों तक पहुंचने के लिए सड़कों पर होंगे। हालांकि परीक्षा दो पारियों में कराई जा रही है, पर दूसरी पारी समाप्त होने के बाद जब राज्य के हर शहर में हजारों-लाखों परीक्षार्थी घर पहुंचने की जल्दी में भागदौड़ करेंगे, तो कैसी बदइंतजामी होगी, इसकी कल्पना की जा सकती है। जयपुरवासियों को याद होगा जब कुछ वर्ष पूर्व सेना की भर्ती परीक्षा के बाद भूखे-प्यासे हजारों अभ्यर्थी काबू से बाहर हो गए थे।

दुनिया चाहे कितनी ही आगे बढ़ जाए। तकनीकी चाहे कितनी ही विकसित हो जाए, हमारे नेता और अफसर अब भी दशकों पुरानी लकीर पर चले जा रहे हैं। क्या यह तथ्य हमारे अफसरों की 'बौद्धिक क्षमता' को प्रदर्शित नहीं करता कि दिसंबर 2019 में घोषित इस 'रीट' को पांच बार स्थगित किया जा चुका है। अब भी 16.51 लाख परीक्षार्थियों की एक ही दिन में परीक्षा ली जाएगी। यानी 'आ बैल मुझे मार' की तर्ज पर सीधे-सीधे अराजकता को न्योता दे दिया गया है। यह ठीक है कि कार्यक्रम में कुछ संशोधन कर 7.30 लाख परीक्षार्थियों के लिए गृह जिलों में ही परीक्षा केंद्र बना दिए गए हैं। फिर भी हर जिले में गांवों-कस्बों से केंद्रों तक की यात्रा परीक्षार्थियों और नागरिकों दोनों के लिए सिरदर्द साबित होने वाली है।

'रीट' के परीक्षार्थियों से फीस के रूप में 100 करोड़ रुपए से ज्यादा इकट्ठा किए जा चुके हैं। केंद्र आंवटित करके और फर्नीचर लगाकर अफसरों ने अपनी 'ड्यूटी' पूरी कर ली। अब परीक्षार्थी जाने या नागरिक। वातानुकूलित कक्षों में बैठकर फैसले लेने वाले अफसरों को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि लाखों गरीब परीक्षार्थियों को यह परीक्षा देने के लिए कितने कष्ट उठाने पड़ेगे। वे कहां रुकेंगे? क्या खाएंगे-पिएंगे? छात्राओं की सुरक्षा का क्या होगा? उनके साथ आने वाले अभिभावक कहां रुकेंगे? सरकारी तंत्र ने कम्प्यूटर पर गणना की और कार्यक्रम बना दिया। अंग्रेजी मानसिकता वाले अफसरों का वैसे भी संवेदनाओं से कोई सरोकार नहीं होता।

जब तिथि नजदीक आने लगी है तब सरकार और अफसरों के हाथ-पांव फूलने लगे हैं। कभी आम यात्रियों को 26 सितम्बर को यात्रा नहीं करने की सलाह दी जा रही है तो कभी रोडवेज के साथ निजी वाहनों का इंतजाम करने की बात की जा रही है। ऐनवक्त पर समाजसेवी संगठनों से अपील की जा रही है कि वे खाने-पीने-ठहरने की व्यवस्था में सहयोग करें। और तो और कलक्टरों को जरूरत पडऩे पर इंटरनेट बंद करने को भी कह दिया है।

सवाल यह है कि प्रदेश की इस सबसे बड़ी परीक्षा के लिए समय पर रणनीति क्यों नहीं बनाई गई। क्या सब-इंस्पेक्टर परीक्षा की तरह इसे कई चरणों में आयोजित नहीं किया जा सकता था। क्या इतनी बड़ी परीक्षा में तकनीकी का उपयोग बेहतर तरीके से नहीं किया जा सकता था। उल्टे इंटरनेट बंद करने का प्रतिगामी तरीका इस्तेमाल किया जा रहा है।

एक तरफ कोरोना के प्रसार का खतरा अभी तक बना हुआ है, दूसरी ओर रेलगाडिय़ों और बसों में परीक्षार्थियों को ठूंसने का इंतजाम कर लिया गया है। शायद उन्हें भेड़-बकरियों से ज्यादा नहीं समझते हमारे नीति-नियंता। काश वे अपने आरामगाहों से निकलकर जनता की तकलीफें जानने का समय निकाल पाते!

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