पूर्वाग्रह की गांठें

अस्तित्व को सत्ता कहते हैं। सत्-चित्-आनन्द का ‘सत्’ ही सत्ता है। ब्रह्म की सत्ता कहलाती है। वही सृष्टि का एकमात्र पुरुष है। सृष्टि का विस्तार, नियमन प्रकृति करती है।

By: Shri Gulab Kothari

Published: 24 Jul 2020, 07:23 AM IST

- गुलाब कोठारी

अस्तित्व को सत्ता कहते हैं। सत्-चित्-आनन्द का ‘सत्’ ही सत्ता है। ब्रह्म की सत्ता कहलाती है। वही सृष्टि का एकमात्र पुरुष है। सृष्टि का विस्तार, नियमन प्रकृति करती है। ब्रह्म और माया ही सत्य और ऋत हैं। अग्नि और सोम हैं। अग्नि प्रसार धर्मा, सोम संकोच धर्मा है। हमारा स्वरूप अद्र्धनारीश्वर का है। पुरुष में अग्नि की प्रधानता तथा स्त्री सौम्या कहलाती है। कई बार स्त्री शरीर में भी ‘पुरुष’ की प्रधानता देखी जा सकती है। तब जीवन दोहरा होता जान पड़ता है। स्त्री शरीर का उपयोग ‘मन’ के स्थान पर ‘बुद्धि’ के नियंत्रण में चला जाता है। संकोच के विषय अनेक हो जाते हैं। स्त्री स्वभाव से सुख भोगना चाहती है। कामना का नाम ही माया है। कामना ही पराधीन बनाती है, स्त्री को।

पुरुष बुद्धि प्रधान है। प्रसार चाहता है। जब पुरुष शरीर में ‘स्त्रैण’ अधिक हो, तब वह भी कामना प्रधान हो जाता है। वैसे पुरुष आक्रामक होता है। सीधे प्रहार करता है। स्त्री मन में गांठ बांध लेती है और सारी नीतियां राग और द्वेष की गांठें तय करती हैं। जहां पौरुष है, वहां गांठें पूर्व कर्मों की ही रहती हैं। इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि सत्ता में आने पर स्त्री और पुरुष की कार्यशैली में आमूल-चूल अन्तर रहेगा ही। न वहां ‘समानता’ का कोई अर्थ रह जाता, न किसी संविधान का। उनके संविधान का निर्माण ये गांठें ही करती हैं।

आप एक-एक करके स्त्री-पुरुष नेताओं के नामों की सूची तैयार करें। उनकी कार्यशैली में समानता और विषमता को श्रेणीबद्ध करें। एक ओर इन्दिरा गांधी, नन्दिनी सत्पथी, महबूबा मुफ्ती, मायावती, वसुन्धरा राजे, जयललिता, ममता बनर्जी जैसी नेत्रियां सामने आती हैं। भारत से बाहर देखें तो इजराइल की गोल्डा मायर, ब्रिटेन की मारग्रेट थैचर, श्रीलंका की सिरिमावो भंडारनायके तथा पाकिस्तान की बेनजीर भुट्टो ऐसे ही नाम आते हैं। हम इन्हें अलग नहीं कर रहे लेकिन ये सभी प्रकृति एवं स्वभाव से भिन्न हैं। उसमें कोई समानता भी नहीं ला सकता। इनमें से अधिकांश ने अपना ही संविधान बनाया, अपनी ही गांठों को द्वेषात्मक कार्यशैली का आधार बनाया और आगे बढ़ती गईं। ज्यादातर महिलाएं अपनी ‘बदले की राजनीति’ के कारण चर्चा में भी खूब रहीं। अधिकांश के व्यवहार में पौरुष भी प्रभावी रूप से दिखाई देता है। अत: इनको कई निर्णय किसी अन्य की मर्जी से भी, न चाहते हुए करने पड़ते हैं।

इतिहास गवाह है। हिटलर और क्लियोपैट्रा से लेकर आज तक सत्ता के पहिए दो ही रहे हैं। एक, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा तथा दो, गांठें। कुछ दिन पहले राजस्थान के मुख्यमंत्री ने सचिन पायलट के लिए कुछ कहा था। गांठें ही कहलवा रही थी न। शिवराज सिंह जी ने कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को लेकर बयान दिया था, गांठें ही खोल रहे थे। बयान देने वालों की श्रेणियां करनी होगी। हिटलर के मन में गांठें नहीं थीं। आज देश में भाजपा और कांग्रेस अपनी बातें कहां कर रही हैं। मन में जो भरा है, वे पोटलियां ही खोल रहे हैं। इनका न तो कानून से लेना-देना है, न ही सरकार से। दोनों ही कानून की मर्यादा को मानने को तैयार नहीं।

सत्ता में बैठा पुरुष भी कानों का कच्चा हो जाता है। लिहाज भी करता है और रिश्ते भी निभाता है। रंजन भट्टाचार्य और वाड्रा दो बड़े उदाहरण हैं, जो सुदृढ़ सत्ता के जहाज में छेद करने वाले साबित हुए। इन गांठों के कारण दोनों दलों की अपनी-अपनी गांठें, अपना-अपना संविधान बन गया। वाड्रा के कारण गांधी परिवार ही नहीं, कांग्रेस कमजोर पड़ गई। सोनिया गांधी का राग ही था। आज भी कांग्रेस को उनकी गांठें खुलने का इन्तजार है, कल भी रहेगा।

जहां-जहां स्त्रियां सत्ता में शीर्ष पर रहीं, उनके चारों ओर एक विशेष वातावरण बना देखा जा सकता है। उनके स्त्री होने का ग्लैमर। उनको भी समझ में तो आता ही है। किन्तु मुखर बात यह है कि अनेक महिलाएं भ्रष्टाचार के नए-नए रिकॉर्ड बना गईं। यह भी सच है कि भ्रष्टाचार में पुरुष कहीं पीछे नहीं है। किन्तु भ्रष्टाचार के कारण भिन्न होते हैं। पुरुष तो शुद्ध स्वार्थ और महत्वाकांक्षा से शासन करता है। सत्तासीन महिला के निर्णय स्वतंत्र वही होते हैं, जिन व्यक्तियों से उन्हें हिसाब चुकना होता है। पराधीनता के निर्णय पर्दे के पीछे होते हैं। गांठें खोलने के निर्णय सार्वजनिक होते हैं। ऊपर बैठे पुरुष पदाधिकारियों की मानसिकता और आक्रामकता एक अन्य कारण भी है।

आज तो आप केन्द्र को अथवा किसी भी राज्य सरकार को देखें। महिला मुख्यमंत्रियों या दल के प्रमुखों के वक्तव्य गांठों की पोटली से ही निकलते हैं। उनका प्रत्युत्तर भी गांठों से ही मिलता है। विपक्षी दलों के विरूद्ध कार्रवाइयां भी तो गांठों को खोलने का ही मार्ग है। प्रकृति में पुरुष और स्त्री की भूमिका समान नहीं होती। महाराजा और महारानी के सपने जनता के लिए समान नहीं होते। दोनों की गांठें ही राज चलाती हैं किन्तु होती अलग-अलग हैं। ये ही इस देश की तकदीर की रूपरेखा है। प्रकृति के नियमों को कभी बदला नहीं जा सकता। विज्ञान भी नहीं बदल सकता। महिला जब शासक बनती है तो राज काज में मातृभाव दिखना चाहिए पर पौरुष भाव काम करने लगता है। हम प्रकृति को तो नहीं बदल सकते पर ऐसी टीम अवश्य बना सकते हैं जो प्राकृतिक व्यवस्था को संतुलित रख सके। इसका प्रमुख टीम की राय पर ध्यान देते हुए संविधान की पालना करे। आपातकाल के बाद इस तरह का नियंत्रण देखने को नहीं मिलता। व्यक्ति कभी कानून से ऊपर नहीं ही सकता, लेकिन आज ऐसा ही है। हर कोई आपातकाल की बात तो करता है पर स्वयं उसी तौर तरीके से शासन चलाता है। न्यायपालिका भी ऐसा ही व्यवहार करती है।

जब तक देश में संविधान प्रभावी रहा, तब तक विकास हुआ। आपातकाल के बाद आकांक्षाएं भारी पडऩे लगी। उसी के कारण गांठों की भूमिका बढ़ गयी। तब से विकास ठहर गया। उलटी धारा चल पड़ी। गांठों ने आज संविधान का रूप ले लिया है। मूल संविधान सुप्त हो गया है।

अब नया युग आ गया है। जनता द्वारा चुना गया जनप्रतिनिधि, मंत्री, मुख्यमंत्री सभी बिकाऊ सामग्री बनने लगे हैं। कहीं कोई गांठें नहीं होंगी। विधायक मण्डी में उपलब्ध है। खरीदो और राज करो। अपना माल बटोरो और जनता को मतदान के लिए धन्यवाद देकर चले जाओ। विधायक के सामने विकल्प नहीं रह जाता। मतदाता लोकतंत्र के झांसे में अवाक् खड़ा देखता रहता है। हर खरीदार का अपना संविधान चलेगा। देश का नहीं। यह गांठ कैसे खुले!

Show More
Shri Gulab Kothari
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned