वनों और शहरी हरियाली का संरक्षण जरूरी

भारत में जलवायु परिवर्तन आकलन रिपोर्ट कहती है कि यदि हम वायु प्रदूषण पर काबू पा सके तो इन्सान और परिवेश दोनों के पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इससे कार्य दक्षता में भी सकारात्मक असर होगा।

By: shailendra tiwari

Updated: 31 Jul 2020, 04:22 PM IST

पंकज चतुर्वेदी, पानी व पर्यावरण पर लेखन

हाल ही में जारी भारत में जलवायु परिवर्तन आकलन में चेतावनी दी गयी है कि देश का औसत तापमान वर्ष 2100 के अंत तक 4.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है । तापमान में तेजी से बढ़ोतरी के मायने हैं। भारत के प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र,कृषि उत्पादन और मीठे पानी के संसाधनों पर संकट में इजाफा होगा,जिसका गहरा विपरीत प्रभाव जैव विविधता, भोजन, जल और ऊर्जा सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ेगा ही । रिपोर्ट में भारतीय शहरों में पर्यावरण के प्रति लापरवाही से बचने और देश के जंगलों और शहरी हरियाली की रक्षा करने की दिशा में सशक्त नीति और अनुसन्धान की अनिवार्यता पर बल दिया है।


यह एक बेहद खतरनाक संकेत है कि हमारे देश में सन 1901-2018 की अवधि में ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के कारण औसत तापमान पहले ही लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है और अनुमान है कि यदि हमने माकूल कदम नहीं उठाये तो 2100 के अंत तक यह बढ़ोतरी लगभग4.4डिग्री सेल्सियस हो जायेगी |


भारत सरकार के केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय तैयार पहली जलवायु परिवर्तन मूल्यांकन रिपोर्ट के इशारे बेहद भयानक हैं । यह रिपोर्ट बताती है कि भारत में कई ऐसे इलाके हैं जो कि पेड़-पौधे व् प्राणियों की जैव विविधता की स्थानीय प्रजाति ही नहीं बल्कि वैश्विक प्रजातियों के लिए भी संवेदनशील माने गए हैं |यदि जलवायु परिवर्तन की रफ़्तार तेज होती है तो इन प्रजातियों पर अस्तित्व का खतरा हो सकता है | औद्योगिक क्रांति के पहले वैश्विक औसत तापमान में लगभग एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। 2015 के पेरिस समझौते में यह संकल्प किया गया कि औद्योगिक क्रांति के पहले के मानकों की तुलना में ग्लोबल वार्मिंग को दो डिग्री सेल्सियसतक सीमित रखा जाए और तापमान वृद्धि को 1.5डिग्री सेल्सियस तक रोका जाए लेकिन आज ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के जो हालात हैं उसके मुताबिक़ तो दुनिया के औसत तापमान में 3से 5 डिग्रीसेल्सियस की बढ़ोतरी को नियंत्रित करना असंभव है।


भारत की रिपोर्ट में भी आगाह किया गया है कि 2100 के अंत तक,भारत में गर्मियों (अप्रैल-जून) में चलने वाली लू या गर्म हवाएँ 3से 4गुना अधिक हो सकती हैं |इनकी औसत अवधि भी दुगनी होने का अनुमान है वैसे तो लू का असर सारे देश में ही बढेगा लेकिन घनी आबादी वाले भारत-गंगा नदी बेसिन के इलाकों में इसकी मार ज्यादा तीखी होगी । रिपोर्ट के अनुसार,उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर के समुद्र की सतह का तापमान (एसएसटी) भी 1951–2015 के दौरान औसतन एक डिग्री सेल्सियस बढ़ा है, जो वैश्विक औसत वार्मिंग 0.7 डिग्री सेल्सियस से अधिक है। तापमान में वृद्धि का असर भारत के मानसून पर भी कहरढा रहा है|


सनद रहे हमारी खेती और अर्थव्यवस्था का बड़ा दारोमदार अच्छे मानसून पर निर्भर करता है ।रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के ऊपर ग्रीष्मकालीन मानसून वर्षा (जून से सितंबर) में1951 से 2015 तक लगभग छह प्रतिशत की गिरावट आई है,जो भारत-गंगा के मैदानों और पश्चिमी घाटोंपर चिंताजनक हालात तक घट रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गर्मियों में मानसून के मौसम के दौरान सन1951-1980 की अवधि की तुलना में वर्ष 1981–2011 के दौरान 27 प्रतिशत अधिक दिन सूखे दर्ज किये गए | इसमें चेताया गया है कि बीते छह दशक के दौरान बढती गर्मी और मानसून में कम बरसात के चलते देश में सूखा ग्रस्त इलाकों में इजाफा हो रहा है|खासकर मध्य भारत,दक्षिण-पश्चिमी तट,दक्षिणी प्रायद्वीप और उत्तर-पूर्वी भारत के क्षेत्रों में औसतन प्रति दशक दो से अधिक अल्पवर्षा और सूखे दर्ज किये गए |

यह चिंताजनक है कि सूखे से प्रभावित क्षेत्र में प्रति दशक 1.3 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है । रिपोर्ट ने संभावना जताई है कि जलवायु परिवर्तन की मार के चलते ना केवल सूखे की मार का इलाक़ा बढेगा,बल्कि अल्प वर्षा की आवर्ती में भी औसतन वृद्धि हो सकती है । रिपोर्ट कहती है कि यदि हम वायु प्रदूषण पर काबू पा सके तो इन्सान और परिवेश दोनों के पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और इससे कार्य दक्षता में सुधर होगा | रिपोर्ट कहती है कि तापमान बढ़ने से बरसात बढ़ सकती है और यदि हम चाहें तो इसे अवसर में बदल सकते हैं-जरूरत इस बात की होगी कि हम आसमान से गिरने वाली हर बूंद को सहेजने के लायक संरचनाएं तैयार कर सकें ,इससे हमारी विद्युत उत्पादन क्षमता पर भी सकारात्मक असर होगा ।

shailendra tiwari
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