ईरान में आक्रोशित दबी-सहमी जनता

Sunil Sharma

Publish: Jan, 14 2018 09:28:39 AM (IST)

Opinion
ईरान में आक्रोशित दबी-सहमी जनता

ईरानी जनता बरसों से दबी सहमी रही है। आज उन्हें भरपेट भोजन और स्वतंत्रता चाहिए। ईरान में ना सिर्फ धन की बल्कि मानवाधिकारों की भी लूट मची है

- डॉ. ज्योतिका टेकचंदानी, मध्य-पूर्व मामलों की जानकार

पिछले कुछ दिनों से ईरान सरकार के खिलाफ पूरे देश में जनता विरोध प्रदर्शन कर रही है। ईरान के सबसे मशहूर शहर मशहद से शुरू हुआ विरोध आज अन्य शहरों में भी फैल चुका है। गौरतलब है कि मशहद ईरान का दूसरा सबसे बड़ी जनसंख्या वाला शहर है। ईरान की जनता सरकार की आर्थिक नीतियों और बढ़ती महंगाई के खिलाफ आंदोलन पर उतर आई। इसके अलावा वहां बढ़ती बेरोजगारी, आर्थिक विषमताओं और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता में आक्रोश है। सरकारी मीडिया के अनुसार अब तक हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान 21 लोग जान से हाथ धो चुके हैं।

आक्रोशित लोग सडक़ों पर ईरानी नेताओं और प्रशासन के खिलाफ नारे लगा रहे हैं। इसके साथ ही प्रदर्शनकारियों ने सत्ताधारी धार्मिक नेतृत्व के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया है। जनता की नाराजगी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पुलिस वाहनों, बैंकों और यहां तक कि मस्जिदों पर भी हमले किए जा रहे हैं, जिससे पूरे देश में तनाव का माहौल बना हुआ है। सरकार की आर्थिक नीतियों के खिलाफ शुरू हुआ जन आदोलन अब ईरान के राजनीतिक तंत्र पर सवाल उठाने वाला आंदोलन बन चुका है। ईरान में इन दिनों चारों ओर आर्थिक सुधारों और सामाजिक न्याय की मांग करने वाले नारों की गूंज है।

ईरान के मौजूदा संकट की मूल वजह बेरोजगारों की बढ़ती फौज है। ईरान में युवा आबादी अधिक है, जो मौजूदा हालात में कई तरह के प्रतिबंधों और कमजोर आर्थिक हालात के चलते लाचार दिखाई देती है। वहीं अगर राजनीतिक पृष्ठभूमि पर गौर करें तो दो महत्वपूर्ण वजह साफ तौर पर दिखाई देती हैं। क्रांति के बाद ईरान सीधे-सीधे दो बड़े राजनीतिक दलो के हाथों की कठपुतली बन गया है, ये हैं- सुधारवादी और कंजर्वेटिव। सुधारवादी गुट का नेतृत्व कर रहे हैं पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद खतामी। खतामी की विचारधारा ईरान को धीरे-धीरे अधिक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक बनाने पर बल देती है। दूसरी ओर हैं- ईरान के सर्वोपरि धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली खुमैनी के नेतृत्व वाला कंजर्वेटिव गुट। यह गुट देश को अधिकारिक तौर पर स्थिर देखना चाहता है और उसे बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध दिखता है।

ईरानी राष्ट्रपति हसन रौहानी वर्ष 2013 से सत्ता में है। सुधारवादी गुट के समर्थक नेता रौहानी ने ईरानी नागरिकों को अधिक स्वतंत्रता देने और वैश्विक सहयोग जुटाने का वादा किया था। कंजर्वेटिव शासन के दो कार्यकालों और कई वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध झेलने वाले ईरान के लिए रौहानी का यह वादा काफी राहत भरा था। रौहानी ने सत्ता संभालने के बाद अमरीका, यूनाइटेड किंगडम, रूस, फ्रांस, जर्मनी और चीन के साथ कूटनीतिक सम्बंध सुधारने के प्रयास किए। इसी का नतीजा था कि वर्ष 2015 में एक ऐतिहासिक समझौता हुआ जिसके तहत ईरान ने प्रतिबंध हटाने की एवज में अपने विवादास्पद परमाणु विकास कार्यक्रम में कटौती करने पर सहमति जताई।

इसके बाद वर्ष 2017 में एक बार फिर सुधारवादियों के समर्थन से रौहानी सत्ता में आए। भारी मतों से जीत कर आए रौहानी ने देशवासियों के समक्ष संकल्प लिया कि वे ईरान को आर्थिक स्थिरता देंगे और अपने दूसरे कार्यकाल में अंतरराष्ट्रीय संबंधों को और बेहतर बनाएंगे। परन्तु इस वर्तमान कार्यकाल में अपना वादा पूरा करने में उन्हें काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा रहा है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी बिना लाइसेंस चल रही क्रेडिट फाइनेंस कम्पनियां। पिछली सरकार के दो कार्यकालों के दौरान ईरान में ऐसी हजारों कम्पनियां पनपीं। हाल ही ईरान सरकार ने अगले वित्तीय वर्ष के लिए एक बजट विधेयक पारित किया।

सरकार ने आंशिक आर्थिक सुधारों के प्रयासों के तहत यह विधेयक पास किया। इसके तहत ईंधन की कीमतें बढ़ाना व सब्सिडी में कटौती करना शामिल था। इस बजट से ईरान के अल्प आय वर्ग में असंतोष गहरा गया। इस विधेयक में धार्मिक निकायों द्वारा वसूली जा रही ऊंची कीमतों का भी जिक्र किया गया। इससे जन आक्रोश और बढ़ गया क्योंकि अब तक तो इस बारे में कभी कोई जानकारी सार्वजनिक की ही नहीं गई थी। अराजक और हिंसक होती स्थिति में सरकार अपने प्रशासनिक अमले का बचाव करते हुए प्रदर्शनकारियों के खिलाफ प्रतिरोध जता रही है। आंदोलन पर कई दिनों की लंबी चुप्पी तोड़ते हुए राष्ट्रपति रौहानी ने इसे ‘एक अवसर’ के तौर पर परिभाषित किया।

उन्होंने इसे सरकार के लिए किसी तरह की चेतावनी मानने से इनकार करते हुए कहा कि देश में हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी वारदातें बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। दूसरी ओर, अयातुल्लाह खुमैनी ने आरोप लगाया कि जो लोग विरोध प्रदर्शनों में दखल दे रहे हैं, वे ‘ईरान के दुश्मन’ हैं। ईरानी जनता बरसों से दबी सहमी सी है। उन्हें भरपेट भोजन और स्वतंत्रता चाहिए। ईरान में लम्बे समय से ना सिर्फ धन की बल्कि मानवाधिकारों की भी लूट मची है। हालांकि भविष्य के बारे में फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन देखना यह है कि सरकार इस राष्ट्रीय संकट से कैसे उबरती है? क्या सरकार वर्ष 2009 की ही तरह फिर से गिरफ्तारियों और जनता से दुराचार का सहारा लेगी या फिर प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव लाएगी जो कि वक्त का तकाजा है।

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