सवाल जल स्त्रोतों की दुर्दशा लिए जिम्मेदार कौन, जवाब प्रशासन

पत्रिकायन में पूछा गया सवाल कि जल स्त्रोतों के लिए जिम्मेदौर कौन है, पत्रिका के पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रिया आई। पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रिया

By: shailendra tiwari

Updated: 24 Aug 2020, 06:10 PM IST

प्रशासन और सरकार जिम्मेदार
जल स्रोतों की दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं प्रशासन और सराकारें जिम्मेदार हैं। नियम कानून सब बनते हंै, लेकिन कभी भी जमीनी स्तर पर कोई काम नहीं होता है। ऐसा नहीं है कि सरकारें पैसा नहीं खर्च करती है। जल स्रोतों के संरक्षण और संवर्धन के लिए बहुतायत में पैसा खर्च होता है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता हंै। धरातल पर कोई काम नहीं होता है। आज रामगढ़ बांध को ही देख लीजिए। सब बेड़ा गर्क अफसरों ने किया और वह सब भी नेताओं के संरक्षण में। न्याय पालिका ने कितने ही आदेश पारित कर दिए, लेकिन नौकरशाहों ने ठोस कार्रवाई ही नहीं की। नतीजा सब के सामने है। आज रामगढ़ बांध सरकारों और अफसरों की नाकामी का जीता जागता उदाहरण है ।
आशुतोष शर्मा, विद्याधर नगर जयपुर
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प्रशासन की लापरवाही
कुएं, तालाब, नहरें और नदियां मनुष्यों ही नहीं, पशु-पक्षियों और दूसरे जीव-जंतुओं के लिए भी जरूरी है। मुश्किल यह है कि स्थानीय प्रशासन की उपेक्षा के चलते इनका अस्तित्व समाप्त होता जा रहा है। शहरों में कुएं व तालाब लगभग समाप्त हो चुके हैं। नदियों भी संकट में हैं।
-आलोक ब्यौहार, सिहोरा, म.प्र.
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भ्रष्टाचार की शिकार योजनाएं
जल स्रोतों के संरक्षण के नाम पर बनी सरकारी योजनाएं भ्रष्टाचार की शिकार हैं। जल स्रोतों की दुर्दशा के लिए नागरिक भी जिम्मेदार हैं। औद्योगिक और घरेलू कचरा जल स्रोतों में डाल दिया जाता है।
-राजेन्द्र मीना, अलवर
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उपेक्षा का परिणाम
पुराने जल स्रोतों की अनदेखी के लिए सरकारी तंत्र तो जिम्मेदार है ही, हम भी कम कसूरवार नहीं। बदलते जमाने के साथ इनकी जरूरत नहीं समझी। इन्हें बेकार छोड़ दिया। बहुतों का अस्तित्व मिटा, तो बहुत से मिटने की कगार पर हैं। अब जब पाइप लाइन से पानी की बूंदें नहीं टपकती, तो लोगों को पुराने जल स्रोत याद आते हैं।
-आयुषी शर्मा, झालावाड़
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मनुष्य का लालच जिम्मेदार
प्राकृतिक जल स्रोतों की दुर्दशा के लिए मनुष्य का लालच जिम्मेदार है। प्राकृतिक जलस्रोतों की सम्भाल न करना और तकनीक के सहारे अत्यधिक दोहन जैसे कारण जिम्मेदार हैं। पहले वर्षा जल आसानी से भूमि में पहुंच जाता था। वर्तमान में मकान, सड़क और आंगन पक्के हो गए हैं। शहरीकरण से भूमिगत जल रीचार्ज नहीं हो पाता है। वर्षा जल के प्रवाह के मुख्य स्रोत कई नदी, नालों और तालाबों पर अतिक्रमण हो गया हैं। जल प्रवाह के रास्ते रुक गए हैं। इस मामले में जनता को ही जागना होगा। इसलिए इसमें सुधार भी जनता के प्रयासों से ही संभव है।
-डॉ.भँवर मालवीय, जोधपुर
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अतिक्रमण ने बढ़ाई समस्या
जल स्रोत नष्ट हो रहे हैं। ओरण पर अतिक्रमण के चलते समस्या गंभीर हो गई है। रही-सही कसर महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत तालाबों की अंधाधुंध खुदाई ने पूरी कर दी है। इससे तालाबों की जल सोखने की क्षमता बढ़ गई है। इससे उनमें पानी का ठहराव नहीं होता है और कुछ ही दिनों में पानी खत्म हो जाता है।
-सुभाष बिश्नोई, जोधपुर
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शहरीकरण से बढ़ा संकट
जल स्रोतों की दुर्दशा पर नजर डालें, तो वर्तमान में भूमिगत जल प्रबंधन का कोई प्रभावी नियम मौजूद नहीं है। इसके संबंध में कोई नई तकनीक का विकास नहीं हो सका और शहरीकरण बढऩे के साथ-साथ प्राकृतिक जल प्रबंधन के साधन में कमी देखने को मिली है। दूसरी ओर ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर आदि जैसी तकनीकी समाधान पर किसी भी सरकार ने कोई गंभीर कदम नहीं उठाए है
-मनोज बगडिय़ा, सीकर
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हम सब जिम्मेदार
जल स्रोतों की दुर्दशा के लिए हम सब जिम्मेदार हंै। जल स्रोतों की दशा सुधारने के लिए अभी तक कोई सार्थक प्रयास नहीं हुए हैं। कुएं-तालाबों को पाटा जा रहा है। घरों का ही नहीं औद्योगिक प्रदूषित जल भी तालाबों एवं नदियों में लगातार छोडा़ जा रहा है। हम जल स्रोतों की उपेक्षा कर रहे हैं, जिससे जीवन ही संकट में पड़ सकता है।
-सुरेश दीवान, रायपुर, छत्तीसगढ़
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लापरवाही पड़ी भारी
झील, बांध एवं तालाबों का उपयोग सिंचाई व पेयजल के लिए किया जाता है, लेकिन कुछ लोग इनमें पशुओं को नहलाते हैं। घरों से निकले अपशिष्ट पदार्थों को फेंकते हैं। कारखानों का दूषित जल और अपशिष्ट पदार्थ भी नदी-नालों में डाल दिया जाता है। इससे जल स्रोतों का जल प्रदूषित होता है। जल स्रोतों की समय रहते मरम्मत व देखभाल नहीं होने से वे धीरे-धीरे सूख जाते हैं।
-हिमांशु छाबा, ब्यावर
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मानव जिम्मेदार
जल स्रोतों की दुर्दशा का जिम्मेदार स्वयं मानव ही है। इंसान ने आधुनिकता के नाम पर सीमेंट और कंक्रीट का जंगल बसा लिया। जल स्रोतों तक जल पहुंचने के मार्गों को अवरुद्ध कर दिया। इसके कारण जल स्रोतों का हलक सूख रहा है। कुछ हद तक इनकी दुर्दशा का जिम्मेदार प्रशासन है।
-कमल वर्मा, फुलेरा, जयपुर
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कोई एक कारण नही
जल स्रोतों की दुर्दशा के लिए कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है। अशिक्षा, अनुशासनहीनता, अंधविश्वास और भ्रष्टाचार इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। सवाल यह है कि नदियों के किनारे जहरीले पानी को उगलने वाले उद्योग लगाने की अनुमति कैसे दी जाती है?
-अनिल भार्गव, गुना्र
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सरकार की अनदेखी
भारत में तीव्र नगरीकरण से तालाब और झीलों जैसे परंपरागत जलस्रोत सूख गए हैं। शुद्ध जल जहां एक अमृत है, वहीं पर दूषित जल विष है। सरकार की अनदेखी और जागरूकता का अभाव इसके लिए जिम्मेदार है।
-कुश शर्मा, बारां
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लालच जिम्मेदार
जल स्रोतों की दुर्दशा के लिए बहुत हद तक हमारा लालच जिम्मेदार है। औद्योगिक इकाइयां के अपशिष्ट पदार्थ नष्ट करने की बजाय जल स्रोतों में प्रवाहित कर दिए जाते हैं। इनकी देखभाल भी ठीक तरह से नहीं होती। इसके दुष्परिणाम हमें भोगने पड़ रहे हैं।
-सव्यसाची द्विवेदी, डूंगरपुर
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पाट दिए गए जल स्रोत
आधुनिकीकरण की होड़ में लाखों जल स्रोतों को पाटकर बड़ी-बड़ी इमारतें एवं होटल खड़े कर दिए गए हैं। दूसरा कारण किसानों को मुफ्त या रियायती बिजली और पंप देने से खूब बोरवेल खोदे गए और अंधाधुंध पानी निकाला गया। इससे भूमिगत जल नीचे चला गया और जल स्रोत भी सूख गए। सरकार को जल स्रोतों को संभालना होगा, ताकि ये बचे रहें और जल संकट भीषण न हो।
-महेश आचार्य, नागौर
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सरकार जिम्मेदारी
जल स्रोतों की दुर्दशा के लिए सरकार ही मुख्य रूप से जिम्मेदार है, लेकिन सरकार अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहती है।सरकार ही जब अपनी जिम्मेदारियोंं से पल्ला झाड़ेगी, तो आम आदमी से अपेक्षा कदापि नहीं हो सकती है।
-सुनिल नटवाडिया, नीमकाथाना सीकर
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कृषि और जल
जल प्रबंधन की शुरुआत कृषि क्षेत्र से करनी चाहिए, क्योंकि कृषि क्षेत्र में सर्वाधिक मात्रा में जल का दुरुपयोग होता है। जनमानस में धारणा है कि अधिक पानी से अधिक उपज होती है, जो कि गलत है। फसल के लिए भरपूर पानी का मतलब मात्र मिट्टी में पर्याप्त नमी ही होती है, परंतु वर्तमान कृषि पद्धति में जल का अंधाधुंध इस्तेमाल किया जा रहा है। धरती के गर्भ से पानी का आखिरी बूंद भी खींचने की कवायद की जा रही है। देश में हरित क्रांति के बाद से कृषि के कारण जल संकट का मार्ग प्रशस्त हुआ है। बूंद-बूंद सिंचाई, फव्वारा तकनीक तथा खेतों के समतलीकरण से सिंचाई में जल का दुरुपयोग रोका जा सकता है ।
-रघुवीर सुथार, जयपुर
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नैतिक मूल्यों की अनदेखी
जल स्रोतों की दुर्दशा की मुख्य वजह पुरातन नैतिक मूल्यों की अनदेखी है। भारतीय संस्कृति मेंं जल को देवता माना जाता है। बहते जल में मल-मूत्र त्याग, साबुन से कपड़े धोना पाप समझा जाता था। प्रत्येक पूजा पाठ, संस्कार, सूतक आदि में पवित्र होने के लिए आवश्यक था इनका स्नान। महत्व हम ही नकारते गये। अवहेलना होती गयी। अब फिर से इन मूल्यों की तरफ ध्यान देनार होगा।
-अनन्त शर्मा, मानसरोवर, जयपुर
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सामाजिक जागृति जरूरी
हमारी धरती का पर्यावरण हजारों वर्षों में उतना नहीं बिगड़ा, जितना कि पिछली दो सदियों में बिगड़ा है। जल स्रोतों से लेकर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सरकारों के साथ हमारी अपनी भी जवाबदारी है। भारत में बहुत ज्यादा भूजल का दोहन होता है। जल स्रोतों की दुर्दशा को रोकने के लिए हमें सामाजिक जागृति लानी होगी।
-सतीश उपाध्याय, मनेन्द्रगढ़ कोरिया, छत्तीसगढ़
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उपेक्षा से बिगड़े हालात
कभी कुए, बावडिय़ां आदि बारह महीने पानी से लबालब भरे होते थे, लेकिन आम जन ने इनमें कचरा डालना शुरू कर दिया। इससे यह पानी पीने लायक नहीं रहा। स्थानीय निकायों ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। घर-घर में नल से पानी आने लगा, तो जनता ने इनकी उपेक्षा करनी शुरू कर दी।
-लता अग्रवाल, चित्तौडग़ढ़
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स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी तय की जाए
जल स्रोत पेयजल और सिंचाई के लिए तो इस्तेमाल होते ही रहे हैं, इनका सांस्कृतिक महत्व भी रहा है। मुश्किल यह है कि आमजन तथा शासन-प्रशासन की अनदेखी के चलते इनकी दुर्दशा हो रही है। प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने, सुरक्षित व संरक्षित रखने के लिए स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय की जाए!
-कैलाश सामोता, कुंभलगढ़ राजसमंद

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