सवाल भरोसे का

न केवल दिल्ली और सर्वोच्च न्यायालय बल्कि देश के अधिकांश राज्यों और उनके उच्च न्यायालयों में भी यही कहानी दोहराई जा रही है।

By: सुनील शर्मा

Published: 24 Jul 2018, 09:47 AM IST

- गोविन्द चतुर्वेदी

सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली में अतिक्रमण और अवैध निर्माण हटाने के काम में तेजी लाने के निर्देश दिये हैं। सरकार ने इन निर्देशों की पालना का पूरा भरोसा दिलाया है। न ये निर्देश पहली बार हैं और ना ही यह भरोसा पहली बार दिया गया है। न केवल दिल्ली और सर्वोच्च न्यायालय बल्कि देश के अधिकांश राज्यों और उनके उच्च न्यायालयों में भी यही कहानी दोहराई जा रही है। आज से नहीं दशकों से लेकिन अतिक्रमण और अवैध निर्माण पूरे देश में, न घट रहे हैं - न हट रहे हैं। उल्टे ‘मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा करी’ की तर्ज पर बढ़ते ही जा रहे हैं।

राजस्थान का एक 25 साल पुराना उदाहरण है। हम कुछ पत्रकार तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखावत के पास बैठे थे। शहर में अवैध निर्माण और अतिक्रमणों पर बात चल रही थी। तभी वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण चंद छाबड़ा ने उनसे कहा - मुख्यमंत्री जी आप कुछ करिए या मत करिए, बस हमें हमारा फुटपाथ लौटा दीजिए। वे चाहते थे फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिये खाली रहें। शेखावत ने थोड़ी-बहुत हंसी-मजाक के बाद तत्कालीन स्वायत्त शासन मंत्री भंवरलाल शर्मा और तब के महापौर मोहन लाल गुप्ता को उसी समय निर्देश दिए, पर हुआ क्या? जयपुर ही नहीं पूरे राजस्थान में, आज फुटपाथ नाम की तो कोई चीज ही नहीं बची। ज्यादातर जगह वह सडक़ में मिल गए। पैदल चलने वाला तो आज जान जोखिम में डालकर इन्हीं सडक़ों पर चलने को मजबूर है।

तब प्रश्न यह है कि, अदालतें हों या सरकार ,उनके निर्देश-आदेशों के क्या मायने हैं? क्या वे केवल सरकारी फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए ही रह गए हैं? सरकारी आदेशों को एक बारगी भूल भी जाएं तो अदालती आदेशों की तो अपनी अलग गरिमा है। उनका अपना अलग विश्वास और भय है।

आज व्यक्ति देश-प्रदेश के किसी भी कौने हो, उसे विश्वास है तो केवल न्यायालय पर। सब जगह से थक हार कर वह न्याय के लिए अदालत की शरण में आता है। जब अदालती आदेशों के बाद भी सरकारें या प्रशासन उसे न्याय नहीं देते तब फिर यही कहते हुए चुप बैठ जाता है कि ‘‘ऊपर वाले को यही मंजूर है। जब कोर्ट के आदेश भी लागू नहीं हो रहे, तब कहां जाऊं।’’ इस स्थिति में भी वह सरकार को झूठा मानता है और अदालती आदेश की अवमानना पर अफसोस जताता है। जिनकी हैसियत होती है, वे इस अवमानना पर न्यायालय में जाते हैं और जिनकी हैसियत नहीं होती, वे चुपचाप घर बैठ जाते हैं। वे कोर्ट से ही उम्मीद करते हैं कि वह अपने फैसलों को लागू कराए।

आज की तारीख में तो देश-प्रदेशों की सरकारों को शायद यह भी पता न हो कि, उनसे संबंधित कितने निर्णय किस कोर्ट ने दिये हैं? यह तभी संभव है जब न्यायालय अपने निर्णयों की मानीटरिंग करें। सर्वोच्च न्यायालय से निचली अदालतों तक सब में यह व्यवस्था हो। कौन सा फैसला लागू हुआ और कौन सा नहीं, इसकी मासिक, त्रैमासिक या वार्षिक समीक्षा हो। जो फैसले, कोर्ट द्वारा दी गई समय सीमा में लागू नहीं हों, उनके लिये दोषी अफसरों को दण्डित किया जाए। जिस दिन यह सिलसिला शुरु हो गया, नेता-अफसरों के हौंसले ठंडे पड़ जाएंगे। आज की तरह उनकी यह कहने की हिम्मत नहीं होगी कि, कोर्ट का आदेश है, पर हम आंख बंद कर लेंगे। या फिर पीडब्लूडी द्वारा हाइकोर्ट के आदेश का हवाला देकर जयपुर के रामनिवास बाग में मसाला चौक नहीं बनाने की लिखित टिप्पणी के बावजूद वहां मसाला चौक बन जाए।

मास्टर प्लान का मामला हाइकोर्ट में होने के बावजूद, मंत्री कोई रास्ता निकालने की तब बात भी नहीं कर पायेंगे अथवा रामगढ़ के बहाव क्षेत्र के अतिक्रमण तब किसी सूरत में बच नहीं पाएंगे। सवाल जनता के भरोसे का है।

सुनील शर्मा
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