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ढहते निर्माणों के बीच विकास पर सवाल

सवाल यह है कि भारत को किस तरह का विकास करना चाहिए? हमारे पास शानदार हवाई अड्डे और जर्जर बस सेवाएं एक साथ हैं। चमचमाते मॉल्स भी हैं जहां एक दिन में ही लाखों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं और कचरा घर भी, जहां कामगारों के पास कोई सुरक्षात्मक उपाय या स्वास्थ्य बीमा तक नहीं है।

जयपुरJul 03, 2024 / 08:21 pm

Gyan Chand Patni

जगदीश रत्तनानी
पत्रकार व संकाय सदस्य, एसपीजेआइएमआर (द बिलियन पे्रस)
इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के टर्मिनल-1 की छत का एक हिस्सा गिरने या फिर अयोध्या में राम मंदिर के आसपास के क्षेत्रों में बारिश का पानी भरने जैसी घटनाओं से विकास के तौर-तरीकों पर सवाल उठने लगे हैं। इसी तरह मुंबई में नव-निर्मित निर्माण, जिन्हें प्रभावशाली और नामी-गिरामी बिल्डरों ने तैयार किया है, से नए और उच्च कीमतों वाले अपार्टमेंट्स के आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हुई है। बेंगलूरु आइटी सिटी के रूप में विख्यात है। इस साल ही मई में असामान्य और भारी बारिश से पूरे शहर में जलभराव और बड़ी संख्या में पेड़ गिरने से जन-जीवन खतरे में पड़ गया। दिल्ली में भारी बारिश से वीआइपी इलाकों में भी पानी भर गया।
सवाल यह है कि भारत को किस तरह का विकास करना चाहिए? हमारे पास शानदार हवाई अड्डे और जर्जर बस सेवाएं एक साथ हैं। चमचमाते मॉल्स भी हैं जहां एक दिन में ही लाखों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं और कचरा घर भी, जहां कामगारों के पास कोई सुरक्षात्मक उपाय या स्वास्थ्य बीमा तक नहीं है। कारखानों में श्रमिक सुरक्षा, पहाड़ी इलाकों या संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्रों में बेतरतीब निर्माण, जाम लगने वाली सड़कों पर शानदार कारें, नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा दिए जा रहे कर्ज) में वृद्धि की कहानी, आम आदमी के लिए बैंकिंग सेवाओं का शिथिल होना जबकि ‘धनाढ्य’ ग्राहकों पर ज्यादा ध्यान, ये सभी असंतुलित विकास की कहानी के प्रतिबिम्ब हैं। महात्मा गांधी ने इस तरह के विकास को ‘कचरे की घास से छाया हुआ और बेढंगा’ विकास कहा था। उन्होंने उस वक्त किसी को न दिखाई देने वाले खतरे के प्रति पहले ही आगाह कर दिया था। अपनी मृत्यु से सिर्फ तीन दिन पहले, 27 जनवरी 1948 को उन्होंने कहा था- ‘भारत ने राजनीतिक आजादी तो हासिल कर ली, अब भी आर्थिक, सामाजिक और नैतिक स्वतंत्रता हासिल करना बाकी है।’ उन्होंने कहा था कि राजनीतिक आजादी तो हासिल करना आसान था, लेकिन अन्य स्वतंत्रताएं अधिक कठिन हैं।
आज भी ज्वलंत प्रश्न बना हुआ है कि ‘कमजोर और प्रबंध करने में मुश्किल विकास’ से कैसे छुटकारा पाया जाए। जैसे-जैसे दुनिया अपने प्रति चिंतित हो रही है, अपने निर्माण कार्य को सतर्कता और सावधानी से अंजाम दे रही है, पर भारत में इस तरह की सतर्कता दिखाई नहीं दे रही। इस रोशनी में, दिल्ली और अयोध्या जैसी घटनाएं नकारात्मक संकेत दे रही हैं। इस तरह के हादसों से होने वाली पीड़ा और तबाही का सामना आम लोगों को करना होगा। इसलिए विकास के तौर-तरीकों और गुणवत्ता पर बहस आज बहुत जरूरी है। एक ओर, आर्थिक विकास को ज्यादातर संख्याओं में मापा जाता है जैसे जीडीपी वृद्धि। लोगों के जीवनस्तर को उच्च स्तर तक ले जाने के लिए उद्देश्यपूर्ण संकल्पना के रूप में विकास की कोशिश हो रही है। इस धारणा को लंबे समय से चुनौती दी गई है। दूसरी ओर विकास की एक व्यापक पहचान (कल्याणकारी आयाम) भी है जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, श्रमिक सुरक्षा और खाद्य सामग्री का उपभोग भी शामिल है। यही व्यापक दृष्टिकोण संयुक्त राष्ट्र का मानव विकास सूचकांक है जिसके मानकों के अनुसार 193 देशों में भारत 134वें स्थान पर है-बांग्लादेश, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका जैसे देशों से नीचे। इसी तरह भारत का नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) इस तथ्य को मापता है कि कितने बच्चे एनीमिया से पीडि़त हैं, पांच वर्ष से कम शिशु की मृत्यु दर क्या है। सिर्फ सात राज्यों (सिक्किम, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा, यूपी, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल) में पांच वर्ष से कम आयु के करीब 50 फीसदी बच्चे हैं जो एनीमिया से पीडि़त हैं। इस तरह के आंकड़ों की रोशनी में भारत सतत विकास का लक्ष्य हासिल नहीं कर सकता है।
अर्थशास्त्र में नोबेल विजेता और भारतीय अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने अपनी किताब ‘डेवलपमेंट एज फ्रीडम’ में लिखा है-विकास के लिए परतंत्रता के प्रमुख बड़े स्रोतों को हटाने की जरूरत है। ये हैं गरीबी के साथ-साथ अत्याचार, कमजोर आर्थिक अवसरों के साथ गहरे से पैठ जमाए सामाजिक अलगावाद, सार्वजनिक सुविधाओं की उपेक्षा के साथ-साथ दमनकारी राज्यों की असहिष्णुता। समृद्धि में अपूर्व वृद्धि के बावजूद दुनिया बड़ी तादाद में लोगों को प्राथमिक स्वतंत्रता से वंचित करती है। भारत को इस ओर ध्यान देना चाहिए

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