कांग्रेस का संकट

यदि राहुल गांधी और उनकी पार्टी वाकई चाहती है कि कांग्रेस मूल्यों की जड़ें फिर से स्थापित हों तो उन्हें रणनीति के साथ व्यवहार करना होगा

By: dilip chaturvedi

Published: 21 Jun 2019, 03:17 PM IST

भावहीन राजनीति मूल्यहीन भी हो जाती है। इसलिए राजनीति में देश की भावनाओं का उचित सम्मान होना ही चाहिए। लेकिन, किसी पार्टी का भावनाओं से दिग्दर्शित होना न सिर्फ पार्टी के लिए, बल्कि देश के लिए भी घातक हो सकता है। अब कांग्रेस को ही लें, लोकसभा चुनाव हारने के बाद इसके अध्यक्ष राहुल गांधी का व्यवहार एक ऐसे रूठे व्यक्ति जैसा प्रतीत हो रहा है जो कह रहा हो, ‘चलो! मेरे बगैर चुनाव जीतकर दिखाओ।’ और पूरी पार्टी उन्हें यह कहकर मनाने में लगी है कि ‘हारने की जिम्मेदारी हमारी, बस! अब आप मान जाओ।

’ ऐसा ‘इमोशनल ड्रामा’ भी तभी काम आता है जब जड़ें गहराई से धंसी हों। इस चुनाव ने साबित किया है कि कांग्रेस की जड़ें उखड़ चुकी हैं। इसलिए धारणा बन रही है कि कांग्रेस अनिर्णय का शिकार है। जिन्होंने कांग्रेस को वोट दिया, वे भी ठगा-सा महसूस कर रहे हैं। ऐसे समय जब न सिर्फ नेता-कार्यकर्ता, बल्कि कांग्रेस समर्थक भी एक मजबूत विपक्ष की आवश्यकता महसूस कर रहे हों और भाजपा विरोधी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए अन्य दल कांग्रेस के कदम की प्रतीक्षा में हों, लोकसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी का अनिर्णय का शिकार हो जाना सत्ता पक्ष को वाकओवर देने जैसा है। इतना ही नहीं, कांग्रेस में राजनीतिक भविष्य आरक्षित मानकर अवसरवादी पाला बदलने लगे हैं। यह स्थिति हारने से नहीं, संभावनाओं के समाप्त हो जाने की धारणा से पैदा होती है।

दरअसल, राहुल के अध्यक्ष नहीं रहने का फैसला चुनाव के दौरान भाजपा द्वारा गांधी-नेहरू परिवार पर लगाए गए आरोपों से प्रभावित लगता है। यदि ऐसा है तो यह पार्टी के भाजपा के 'ट्रैप' में फंसने जैसा ही है। आज जो कांग्रेस है वह इंदिरा गांधी वाली है, गांधी-नेहरू-पटेल वाली नहीं जो लोकतांत्रिक मूल्यों को तरजीह देती थी। यदि राहुल गांधी वास्तव में परिवार मुक्त लोकतांत्रिक कांग्रेस बनाना चाहते हैं तो उन्हें भावनात्मक नहीं, तार्किक फैसला करना चाहिए। आम धारणा है कि गांधी परिवार का कोई नेता ही कांग्रेस को एकजुट रख सकता है।

बाहर का अध्यक्ष बनाना पार्टी को टूटने के लिए अपने हाल पर छोड़ देने जैसा होगा। गांधी परिवार भी निश्चित तौर पर ऐसा नहीं चाहेगा। गां धी परिवार पार्टी में लोकतंत्र समाप्त करने के लिए जिम्मेदार भले ही हो, इसकी बहाली भी यह परिवार ही कर सकता है। इसके लिए सबसे जरूरी व्यवहार में लोकतांत्रिक मूल्यों को तरजीह देना है न कि मैदान छोड़ देना। यदि राहुल गांधी और उनकी पार्टी वाकई चाहती है कि कांग्रेसी मूल्यों की जड़ें फिर से स्थापित हों तो उन्हें रणनीति के साथ व्यवहार करना होगा ताकि हर कदम सोच-समझकर उठाया गया प्रतीत हो। किसी प्रतिक्रिया, दबाव या भावुकता में उठाया गया कदम नहीं।

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