सरकारों की घोर अनदेखी की अभिव्यक्ति

‘करवट बदल रहा समय’ पर प्रतिक्रियाएं

कोरोनाकाल में भूखे-प्यासे, निरीह मजदूरों के नंगे पांव हजारों किलोमीटर दूर अपने घरों को लौटने वाले कारुणिक हालात पर पत्रिका में 22 मई को प्रकाशित पत्रिका के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी के अग्रलेख ‘करवट बदल रहा समय’ को प्रबुद्ध पाठक वर्ग ने मजदूरों की पीड़ा और सरकारों की घोर अनदेखी की सजीव अभिव्यक्ति बताया है। उन्होंने सरकारों के रवैये को मानवता पर से विश्वास उठने वाला भी बताया है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से

By: Prashant Jha

Updated: 22 May 2020, 05:14 PM IST

वक्त के मारों की मदद करे हर इनसान
इतिहास में पहली बार शायद इनसान ने इतनी भयावह परिस्थितियों का सामना किया है। यहसच है कि जिन्होंने अपने पास धन-धान्य का संचय कर रखा था, उन्होंने तो इस दुखदाई समय को काट लिया, पर उनका क्या जो रोज कमाते-खाते हैं। मजदूर भाई बहन ऐसे में क्या करें? मन में आया अनजान शहर में भूखे मरने से अपने गांव की जमीन पर भूखे रहना या मर जाना ही ठीक रहेगा और चल दिए मंजिल की ओर, बिना सोचे समझे कि अंजाम क्या होगा। कोई इनके इस अंतर मन की व्यथा को समझे तो जाने कि क्या बीत रही होगी। आज हम सभी को यही सोचकर हर संभव मदद पहुंचानी चाहिए कि इन वक्त के मारों का कोई तो दुनिया में है।
मोनिका जैन, योग प्रशिक्षिका, ग्वालियर
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तो शायद ऐसे पलायन के दृश्य नहीं दिखते
आज सभी यही विचार और मंथन कर रहे हैं कि घर लौटते इन मजदूरों को इतना कष्ट सहन करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर अब इन्हें काम कैसे मिलेगा। देश के राजनेताओं के मन में इनके लिए कोई करुणा भाव नहीं है। यदि होता तो शायद इनके पलायन के ऐसे दृश्य दिखाई नहीं देते। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सरकार की नीतियां सिर्फ दिखावा बनकर रह गई हैं। सरकारें चाह रही हैं कि मजदूर वर्ग वापस काम पर लौटे, पर अब ये आसानी से लौटने वाले भी नहीं हैं। अग्रलेख वाकई में समय के करवट बदलने की सही परिभाषा को दर्शा रहा है।
हरिदास अग्रवाल, अध्यक्ष, श्री अचलेश्वर महादेव न्यास ट्रस्ट, ग्वालियर
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श्रम इतना निरीह क्यों?
बादशाह का इकबाल दरक रहा है, यह साफ संकेत इस समय पढ़ा जा सकता है। उत्पादन के तमाम साधनों में श्रम इतना निरीह क्यों है? हमारे मठाधीश ने सही समय पर सही निर्णय क्यों नहीं किया? इतने लोगों की जान पर बन आई। समय सब देख रहा है। महाभारत में सूत्रधार यही समय था, अभी भी वह गुम हुए सूत्रों को जोड़ेगा, कुछ को गुमनामी में धकेलेगा और जिन्होंने चतुर चुप्पी ओढ़ ली है, समय लिखेगा उनका भी इतिहास।
डॉ. प्रताप राव कदम, वरिष्ठ साहित्यकार, खण्डवा
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गरीबों का रखवाला कौन?
लॉकडाउन की मौजूदा परिस्थिति में सबसे बड़ी विपदा गरीब और मजदूर वर्ग को उठाना पड़ी है। कैसे काम धंधे छोडक़र अपने गांव लौटना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में सरकार की फोरी राहत भी गरीब और लाचार लोगों तक नही पहुच पाई। राजनीतिक दल आरोप प्रत्यारोप में उलझ गए। गरीबों का रखवाला कोई नहीं है। कोठारी ने वास्तविकता को आईना दिखाया है।
अजीजुद्दीन शेख, समाजसेवी, खरगोन
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सरकारों पर सही कटाक्ष
कोठारी ने वर्तमान परिदृश्य में देश के हालात के संबंध में सरकारों पर जो कटाक्ष किया है, वह बिल्कुल सही है। वर्तमान में जनप्रतिनिधि हों या सरकारें, सभी पीडि़त मानवता की सेवा की जगह राजनीति पर उतारू हैं। किसी को भी उन बेसहारा मजलूम मजदूरों की फिक्र नहीं है जो नंगे पैर पैदल अपने घरों को लौट रहे हैं। उद्योग धंधे पूरी तरह से ठप हो चुके हैं और अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी है। मध्यमवर्ग पर हर तरफ से मार पड़ रही है, वहीं गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों को भी उनका संपूर्ण हक नहीं मिल पा रहा है। यह बात सही है कि जो श्रमिक अब अपने घर लौट रहा है वह जल्दी काम पर नहीं लौटेगा, जिससे उद्योग धंधों पर भी असर पड़ेगा। आशा है कि अगले वर्ष तक देश नए स्वरूप में नजर आए।
राजेंद्र अग्रवाल, सेवानिवृत्त अतिरिक्त मुख्य अभियंता, मध्य प्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी, जबलपुर
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सब दावे कागजी
कोठारी ने सही मुद्दा उठाया है। लॉकडाउन है। प्रवासी मजदूरों की मदद करने के बजाय उन परेशान लोगों पर लाठियां बरसाई जा रही हैं। दावे तो बड़े-बड़े हो रहे हैं, लेकिन यह सब कागजी हैं। प्रवासी मजदूरों के जले पर नमक छिडक़ा जा रहा है। वे अपने ही देश में परदेशी हो गए हैं।

भूपेंद्र गुप्ता, प्रवक्ता मध्यप्रदेश कांग्रेस, भोपाल
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राजनीतिक हित तक सीमित सरकारें
कोठारी ने सही लिखा है कि उच्च वर्ग कानून से ऊपर हो गया है और निम्न वर्ग भूखा मर रहा है। लॉकडाउन के बाद मजदूरों के प्रवास के मामले में सभी सरकारें पूरी तरह विफल रही हैं। यदि इन मजदूरों को एक दो महीने वहीं पर खाना पानी उपलब्ध करा दिया गया होता तो यह नौबत नहीं आती। लेकिन सरकारें अपने राजनीतिक हित साधने में लगी रहीं और मजदूर वर्ग ***** गया।
सुरेंद्र तिवारी, भोपाल सिटीजन फोरम, भोपाल
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बदतर हालात
बहुत सटीक बात पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने कही है। वाकई सृष्टि प्रकृति और पुरुष का संघर्ष ही है। उन्होंने जो मज़दूरों के पलायन और दर्द को उकेरा है, वह बिल्कुल सही है। हालात बदतर हैं। ऐसे हालात में कोई क्यों फिर वापसी करेगा? जो लौटकर आएंगे, उनकी संख्या भी बहुत कम होगी। सरकार और सियासत इन श्रमिकों के दर्द पर भी चरम पर है। लेकिन यकीनन ये बदलाव का दौर है, जिसकी शुरुआत हो चुकी है। बदलाव कितना और कैसा होगा यह बहुत जल्दी सामने आने वाला है।
डॉ. ज्ञानेंद्र मोहन सिन्हा, रिटायर्ड पशु चिकित्सक, विदिशा
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भूख में राजनीतिक भविष्य की तलाश का दुर्भाग्य
लोग नंगे पैर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल रहे हैं। बच्चे, महिलाएं, वृद्ध, अपाहिज, पढ़े लिखे बेरोजगार युवा भूखे हैं प्यासे हैं। ऐसे समय में भी यदि कोई राजनीति कर रहा है और राजनीतिक भविष्य तलाश रहा है तो इससे बड़ा दुर्भाग्य नहीं हो सकता। निश्चित रूप से समय करवट बदल रहा है, लोगों का खुद अपने चुने हुए जनप्रतिनिधियों से विश्वास उठने लगा है। करोड़ों की घोषणाओं के बावजूद उन्हें कुछ मिलेगा, ऐसा विश्वास नहीं रहा, क्योंकि घोषणाओं पर अमल में लम्बा समय लग जाएगा, तब तक स्थितियां और होंगी।
श्रद्धा सक्सेना, जिलाध्यक्ष कायस्थ महिला विंग, राजगढ़
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बदलाव की स्थिति की शुरुआत
कोठारी ने वर्तमान स्थिति को बताने का काम किया है। कोरोना संकटकाल में निम्न आय वर्ग भूखा मर रहा है। सरकार और सियासत के चलते मजदूरों का दर्द बढ़ता जा रहा है। हां, इतना जरूर है कि बदलाव की स्थिति प्रारंभ हो गई है। ये बदलाव आगे जाकर जरूर कुछ नया करेगा।
डॉ. प्रवीर गुप्ता, बीएमओ सिविल अस्पताल, आष्टा
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मजदूरों को वास्तविक मदद की जरूरत
अपनी रोजी रोटी और गांव सहित लगभग सब कुछ गंवा चुके मजदूरों के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे दुव्र्यवहार को लेकर जिस तरह से अग्रलेख में सरकार की करनी और कथनी पर सवाल उठाया गया है, वह वाजिब है। मजबूरी में अपने घर लौट रहे मजदूरों के लिए सिर्फ घोषणाएं नहीं, वास्तविक मदद करने की जरूरत है।
विनय सराफ, एडवोकेट, इंदौर
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उम्मीद की किरण
आज मजदूर और कामगार कोरोना त्रासदी के सबसे अधिक प्रभावित और पीडि़त हैं, जिनकी व्यथा-कथा सुनने वाला कोई नहीं। कोरोना संकट के इस दुस्समय में एक उम्मीद की किरण यह भी है कि मजदूर, कामगार और किसान की घनीभूत पीड़ा की बदौलत व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन होगा और नए साल में नए सिरे से यह देश मेहनतकश लोगों के माध्यम से नई इबारत लिखेगा।
प्रो. सत्येन्द्र कुमार शेन्डे, शासकीय पीजी कॉलेज, सिवनी
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मजबूरों की बेबसी समझें
लॉकडाउन में बाहर फंसे लोग इतने मजबूर हो गए हैं कि उनके पास अपने गांव-घर जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, जबकि उन्हें पता है कि घर की वापसी की राह आसान नहीं है। ऐसे मजबूर मजदूरों की बेबसी को समझकर उनकी मदद करने की जरूरत है। अपने घरों को लौट रहे मजदूरों की दशा देखकर किसी का भी दिल पिघल जाए, लेकिन शासन-प्रशासन उनके प्रति संवेदनशीलता उतनी ही दिखा रहा है, जितने से उनकी मंशा की पूर्ति हो रही है।
दमयंती पाणी, सचिव, गांधी स्मारक निधि, छतरपुर
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पुरुषार्थ और संयम का मेल बढ़ाने वाला अग्रलेख
‘सृष्टि प्रकृति और पुरुष का संघर्ष है’ के साथ ही कोठारी ने कोरोना वायरस के संक्रमण के दौर में मजदूरों की परेशानी और सरकार जनप्रतिनिधियों के ऊपर से उठ रहे भरोसे को जिस संवेदना के साथ उठाया है, वह हमारी व्यवस्था को उजागर करता है। लेख में केवल निराशा ही नहीं है, पुरुषार्थ और संयम का मेल भी है, जो निश्चित ही इस विपत्ति की घड़ी में हिम्मत बढ़ाने वाला है।
वीणा चौकसे, पार्षद छावनी परिषद, सागर
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राहत पैकेज कागजों में न रह जाए
देश की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए सरकार ने भले ही घोषणा कर दी है, लेकिन उससे लोगों को कितना लाभ मिलेगा, यह नियम कायदे आने पर पता चलेगा। देखना होगा कि राहत पैकेज कागजों मे ही न रह जाए। सरकार ने श्रम कानून में बदलाव कर श्रमिकों के अधिकारों पर कुठाराघात किया।
अश्विन शर्मा, संयोजक, संयुक्त श्रमिक संगठन, रतलाम

कमजोर होता लोकतंत्र
काल बली होता है वही मनुष्य को बलवान और निर्बल बनाता है। आज अर्थ प्रधान बनते जा रहे इस युग में फिर से सज्जनों की रक्षा के लिए एक श्री कृष्ण की आवश्यकता है। पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी जी ने ‘करवट बदल रहा समय’ लेख में आज की राजनीति में कमजोर होते लोकतंत्र व जनता की आत्मिक पीड़ा को सामने लाने का सार्थक प्रयास किया है। इसमें सामयिक राजउानीतिक घटनाक्रम की भी परतें खुलती नजर आती हैं।
- डॉ. शंकर लाल शास्त्री, शिक्षाविद्, शाहपुरा,जयपुर।
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प्रकृति निकली न्याय करने
देश की आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिता रही है। निम्न वर्ग भूखा मर रहा है। मध्यम वर्ग को हर विभाग मार रहा है। सरकार की नीतियां भी कुछ और ही कह रही है। यह उच्च वर्ग पर लागू भी नहीं होती। इसलिए श्रमिक गुस्सा लिए अपने घरों को लौट रहे हैं। प्रकृति न्याय करने निकल पड़ी है और समय करवट बदल रहा है।
- सुदर्शन सोलंकी, मनावर, धार, (मप्र)
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उबरने में लगेगा वक्त
पत्रिका में गुलाब कोठारी के ‘करवट बदल रहा समय’ आलेख में यह सही कहा गया है कि यह जीवन प्रकृति और पुरुष का सतत संघर्ष है। वर्तमान समय में मन में लोगों में अकल्पनीय भय समा गया है। यही कारण है कि सभी पलायन कर घर वापसी पर हैं। इससे तो एक तरह से अराजकता होने लगी है। राज्य सरकारें मनमानी कर रहीं हैं। लोगों में विश्वास का ह्रास हो गया है। राहत पैकेज घोषणाएं बनकर रह गये हैं। ये जिन हाथों से गुजरेंगे, वे लोग इन्हें आधे से ज्यादा चट कर जायेंगे। कोरोना संक्रमण के उपचार के नाम पर करोड़ों रुपए अन्यत्र उपयोग में लाए जाने की आशंका बन गई है। जो वर्ग इस आपदा में जमीन पर लौट गया उसे उबरने में फिलहाल वक्त लगेगा।
डॉ. नलिन जैन, सागर
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विषैली व्यवस्था पर तमाचा
गुलाब कोठारी का आलेख ‘करवट बदल रहा समय’ विषैली व्यवस्था के गाल पर करारा तमाचा है । सुर-असुर हमारे मन के ही दो प्रक्षेपण है। राम भी हम और रावण भी हम है । अंधेरे की कोख में पलते सूरज भी हम है । कोरोना किसी महामारी का नही बल्कि सागर मंथन का प्रतीक है । सागर मंथन की इस वेला में अमृत और जहर दोनों अलग हो रहे है । परंतु यह भी तय है कि इस सिसकती मानवता की आहों से ही अमृत भी बाहर निकलेगा । घनघोर अंंधेरे की कोख से नई सुबह का सूरज पल रहा है ।
-शंकर जोशी ‘आहुति’ प्रधानाचार्य, टोकर
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राजनीति से बाज आएं
कोरोना संकट के दौर की परिस्थितियों व भविष्य की संभावनाओ पर लिखा गया ‘ करवट बदल रहा समय’ लेख कठोर किंतु जनहित की बात करने वाली बेहतरीन विवेचना है। इस भयावह संकट के दौर मे देश के जनप्रतिनिधि, जनतंत्र की ताकत व अपनी जिम्मेदारी को भूलकर राजनीतिक बयान बाजी मे लिप्त हैं जो दुर्भाग्यजनक है। ये जनप्रतिनिधि चुनाव के समय डोर -टू-डोर कैंपेन करते हैं। सत्ता के लिए लिए प्रवासी वोटरों को लाने की व्यवस्था भी करते हैं। लेकिन इस समय वे न तो गरीबों व मजदूरो के लिए राशन -पानी की उचित व्यवस्था कर पाए और न ही प्रवासियों को लाने के लिए परिवहन के साधनों की व्यवस्था कर पाए। जरूरत है, भारत सरकार व राज्य सरकारें चारों तरफ फैले निराशा, आर्थिक अभाव, अवसाद-तनाव, उदासी व बेरोजगारी से भरे काले बादलों को छांटे तथा भारतीय लोक मानस में उत्साह का संचार करे। मजदूरों में भी विश्वास की बहाली करनी होगी।
- विशनाराम माली, शिक्षाविद् मोकलपुर

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