प्रवासी मजदूरों की समस्या का स्थायी हल 'बिल्ड अप इंडिया' पर प्रतिक्रियाएं

कोरोनाकाल में अपने गांवों में लौटे प्रवासी 'आगे भी गांव में ही रहकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करें' , की भावना पर आधारित पत्रिका के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी के अग्रलेख 'बिल्ड अप इंडिया' का पाठक वर्ग ने स्वागत किया है।

By: Prashant Jha

Published: 23 May 2020, 05:27 PM IST

कोरोनाकाल में अपने गांवों में लौटे प्रवासी 'आगे भी गांव में ही रहकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करें' , की भावना पर आधारित पत्रिका के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी के अग्रलेख 'बिल्ड अप इंडिया' का पाठक वर्ग ने स्वागत किया है। उन्होंने कहा है कि मजदूरों की समस्या का स्थायी हल वास्तव में यही है। सरकार को इस दिशा में ठोस व सुदूरवर्ती कदम उठाने चाहिए। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से

समस्या का स्थायी समाधान
अपने अग्रलेख में गुलाब कोठारी ने प्रवासी मजदूरों की समस्या का स्थाई हल ढूंढ निकाला है। इस हल तक पहुंचनेे के लिए पत्रिका की ओर से बिल्ड अप इंडिया अभियान की घोषणा भी स्वागत योग्य है। क्योंकि लॉकडाउन के चलते अपनी रोजी-रोटी से वंचित होकर प्रवासी मजदूरों के अपने गांव में सकुशल पहुंच जाने से ही समस्या का अंत नहीं हो जाएगा। इससे भी बड़ी समस्या उनके सामने है कि वे अपने उस गांव में जीने- खाने के साधन कैसे पाएंगे, जिस गांव में उनके पास पहले ही कोई साधन नहीं था और जिसके कारण उन्हें गांव छोड़कर शहर जाना पड़ा था। मजदूरों को अपने गांव में ही काम मिलने लगेगा तथा धनार्जन के अवसर मिलने लगेंगे तो वे दूसरे शहर में भटकने को मजबूर नहीं होंगे और उनका गांव भी उनकी मेहनत से विकास करेगा। डॉ. सुश्री शरद सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार, सागर


गांवों में संसाधन भी जरूरी

प्रवासी श्रमिक अब गांव में रहें और गांव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करें, इसके लिए गांव में संसाधन होना बहुत जरूरी है। संसाधन इतने कम समय में उपलब्ध हो पाना एक चुनौती है। पहले गांव का व्यक्ति शहर की ओर भाग रहा था। अब संकट आने पर शहर का व्यक्ति गांव की ओर भाग रहा है। पढ़ा लिखा व्यक्ति विदेश जा रहा था, देश में रहना काम करना पसंद नहीं कर रहा था।
डॉ. उदय तिवारी, शिक्षाविद, सागर


नए इतिहास की पृष्ठभूमि
नए इतिहास की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है। ईसा पूर्व और ईसा पश्चात की तर्ज पर कोरोना वायरस के पहले की दुनिया और बाद की दुनिया का जीवन तय हो रहा है। इस वैश्विक परिवर्तन में भारत के महानगरों से पलायन कर रहे श्रमिक अब अपने गांवों में ही शेष जीवन की तकदीर और गांव की नई तस्वीर सुनिश्चित करेंगे। यह चिंता की बात है कि लॉकडाउन के पहले इन करोड़ों मजदूरों के भविष्य पर किसी भारतीय विचारक की न तो कलम चली और न ही जार्ज फर्नांडिज, दत्ता सामन्त या समग्र क्रांति के प्रणेता जेपी की तरह मजदूर हित में किसी ने बात की। भारतीय गांवों का दिल समुद्र की तरह विशाल है। यदि बड़ी मछलियों की भूख ने इस दर्द की पीड़ा को समझ लिया तो नए सवेरे की खुली हवा एक नया अध्याय लिखेगी। आशुतोष गुप्ता, होशंगाबाद


संस्कृति की अवहेलना से दुर्दशा
भारतीय ज्ञानवेद को पूरे विश्व ने माना है। भारतीय संस्कृति ही है जो आत्मकल्याण के साथ दुनिया के सुख और समृद्धि की बात करती है। देश की आजादी के बाद हमारी भारतीय संस्कृति को विस्मृत किया जा रहा है। उसे पुरातन और पिछड़ा दर्शाकर नई पीढ़ी को दूर किया गया। सही है कि आज हम जिस स्थिति में आ गए हैं, उसके पीछे कारण हमारी संस्कृति की अवेहलना करना है। कोठारी को साधुवाद कि वे समय-समय पर भारतीय संस्कृति को लेकर आवाज उठाते हैं और निश्चय ही उनके लेख पढऩे से चिंतन शुरू होता है। अवधेशपुरी महाराज, उज्जैन


नई अर्थव्यवस्था, नया अर्थशास्त्र
ये नई अर्थव्यवस्था के नए अर्थशास्त्र का ही दौर है। सरकारों को अब सुनिश्चित करना चाहिए कि बड़े औद्योगिकीकरण की आंधी में छोटे उद्योगों की लौ मद्धम न पड़े। यही छोटे और कुटीर उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। सरकार को पलायन रोकने के लिए भी ठोस कदम उठाने होंगे ताकि लोगों को अपनी ज़मीन में ही रोजगार मिल सके। चंद्रप्रभाष शेखर, पूर्व मंत्री, भोपाल


ग्राम उदय से ही भारत उदय संभव
बिल्डअप इण्डिया अभियान के लिए पत्रिका को साधुवाद। कोठारी ने अपने लेख के माध्यम से भविष्य के भारत और उस तक पहुंचने के संकेत दिए हैं। ग्राम उदय से ही अब भारत उदय संभव है।
डॉ राजेश मिश्र, प्राध्यापक, अटल बिहारी हिंदी विवि, भोपाल


शासितों की उपेक्षा
कोठारी ने सही लिखा है कि वर्तमान में दो वर्ग हैं। एक शासित और दूसरा शासक। कायदे से तो शासक को शासितों का ध्यान रखना चाहिए। यह उनका नैतिक दायित्व भी है, लेकिन मजदूरों के मामले में इस दायित्व की पूरी तरह उपेक्षा हुई है। अब शासितों को भी अपनी ताकत दिखाने की जरूरत है। लोकतंत्र में वे चुनाव के माध्यम से ही अपनी ताकत दिखा सकते हैं। उनके साथ हुए व्यवहार का ध्यान में
खते हुए ही उनको अपने मताधिकार का उपयोग करना चाहिए ताकि शासकों की समझ में आ जाए कि जनता सब समझती है। केसी मल्ल, रिटायर्ड वन अधिकारी, भोपाल

जड़ों की ओर वापसी का समय
भारत का मूल आधार कृषि और किसान ही हैं। लगातार बेरोजगारी और काम की कमी ने हमारे ग्रामीण और आंचलिक युवाओं को महानगरों की चकाचौंध में खो दिया था। थोड़ी सी आमदनी और दिखावे की जिंदगी पाने की खातिर मेहनतकश युवा पीढ़ी अपनी ही जड़ों को भुला बैठी थी। अब इन जड़ों की ओर वापसी का समय है। सभी को सीख लेकर तय करना है कि जो मेहनत वे किसी अन्य शहर में कर रहे थे, वही अगर अपने ही गांव में करें तो गांव की तरक्की के साथ-साथ रोजगार सृजन की भी राह खुलेगी। जिनके पास स्वयं की कृषि भूमि है, वे सब्जियों की जैविक खेती को नगद आय का जरिया बना सकते हैं। दूध उत्पादन का विकल्प है। जो कुशल श्रमिक हैं, वे तकनीक का इस्तेमाल करके अपने ही गांव में आय की राह बना सकते हैं। विवेक दीक्षित, ग्वालियर


प्रशंसनीय अभियान
पत्रिका का बिल्ड अप अभियान प्रशंसनीय है। आज देश कठिन दौर से गुजर रहा है। न हम पूरी तरह से देशी बन पाए और विकास में जिस पश्चिम का अंधानुकरण किया, उसका भी कुछ हासिल कर पाए। कोठारी ने सरकार को एक नई राह दिखाई है। सबसे पहले देश में बनी वर्गों वाली खाई का अंतर पाटना होगा। काशी प्रसाद शर्मा, नागौद (सतना)


ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा
बिल्ड अप इंडिया का यह अभियान प्रवासी मजदूरों न केवल संबल देगा, बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में मदद करेगा। साथ ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा। इसके लिए हमें उन्हें प्रेरित भी करना होगा। सुधा तोमर, श्योपुर


विकल्पों की तलाश करनी होगी
वर्तमान हालात ने हमें सीख दी है कि हम नए विकल्प तलाश कर युवाओं को रोजगार दें। शिक्षा पद्धति को भी उसी हिसाब से तैयार करना होगा कि युवा बेरोजगारों की फौज तैयार होने की बजाय रोजगार के अवसर सृजित हों। टी एन चतुर्वेदी, दतिया

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