कोरोनाकाल में बिजली खरीद अनुबंधों की प्रासंगिकता

वर्तमान में जब देश एक असाधारण आपदा काल से गुजर रहा है तब महंगी बिजली खरीद व स्थाई शुल्क की बाध्यता को लेकर भी ठोस फैसला करना होगा। ऐसा करते वक्त मौजूदा प्रावधानों के दुष्परिणामों को भी ध्यान में रखना होगा।

By: Prashant Jha

Published: 18 May 2020, 01:55 PM IST

अर्जुन सिंह , पूर्व प्रबंध निदेशक , जयपुर डिस्कॉम

बिजली देश की आर्थिक उन्नति एवं खुशहाली के लिए आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर के सबसे अधिक महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील अंगों में से एक है। हमारे दैनिक जीवन में इसकी उपयोगिता उतनी ही जरुरी हो गई है जितनी श्वसन के लिए ऑक्सीजन। भारतीय संविधान की समवर्ती सूची में शामिल विधुत क्षेत्र का प्रषासन एवं संचालन केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है। यह संचालन राष्ट्रीय ग्रिड के रूप में होने के कारण अधिनियम, नियम, कोड आदि केंद्र द्वारा अधिसूचित किये जाते हैं। बिजली उत्पादन, प्रसारण, वितरण, व्यापार एवं विद्युत उद्योग के विकास, उसके प्रतिस्पर्धा संवर्धन, उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण, सभी क्षेत्रों को विद्युत आपूर्त करने आदि के लिए केन्द्रीय विद्युत अधिनियम 2003 लागू हुआ। इस अधिनियम के द्वारा ही देश में विद्युत उत्पादन को लाईसेंस मुक्त किया गया। विद्युत क्षेत्र में रीफार्मस का दौर चालू हुआ तथा उत्पादन, प्रसारण एवं वितरण क्षेत्रों में सार्वजनिक एवं निजी निवेश को प्रोत्साहन मिला।

बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ी

विद्युत अधिनियम 2003 के अधिनियमन के समय हमारे देश की विद्युत उत्पादन क्षमता 112000 मेगावाट थी तथा प्रति व्यक्ति वार्षिक खपत लगभग 400 यूनिट थी। कुछ अपवादों को छोड़कर यह उत्पादन एवं प्रसारण क्षमता सार्वजनिक क्षेत्र में थी। वर्तमान में देश की उत्पादन क्षमता लगभग 376000 मेगावाट (45 फ़ीसदी निजी क्षेत्र में) तथा प्रति व्यक्ति वार्षिक खपत 1181 यूनिट है। यह खपत विश्व की औसत खपत की आधी से भी कम तथा संयुक्त राज्य अमेरिका की 25 फीसदी एवं चीन की 50 फीसदी से भी कम है। वर्ष 2003 के पूर्व एवं बाद के दशक में देश की विद्युत उत्पादन क्षमता मांग से कम थी। विद्युत अधिनियम 2003 के अधिनियमन के बाद उत्पादन, प्रसारण एवं वितरण के क्षेत्र में तेजी से सार्वजनिक एवं निजी निवेश हुआ। वर्ष 2013-14 के बाद आपूर्ति एवं मांग का अन्तर शून्य होकर वर्तमान में अधिकांश राज्य एवं देश पावर सरप्लस हैं। इस प्रकार विद्युत क्षेत्र में हो रहे निरंतर परिवर्तन, प्रगति, तकनीकी विकास एवं रेगुलेट्री व्यवस्थाओं के कारण क्षेत्र का वर्तमान परिदृष्य पिछले पांच वर्ष से भिन्न है तथा आने वाले पांच वर्ष की अवधि में एक देष एक टैरिफ, अक्षय ऊर्जा (सौर एवं पवन) क्षमता में वृद्धि एवं बैट्री स्टोरेज की आर्थिक साध्यता आदि अहम् परिवर्तन संभावित हैं। यानी विद्युत भी एक अन्य सामान्य उपभोग की वस्तु के समान होने की प्रबल संभावना है।

उद्योगों के देना पड़ रहा अतिरिक्त शुल्क

कोविड-19 से उत्पन्न लॉकडाउन के चलते बंद उद्योगों को उत्पादन हानि के अतिरिक्त विद्युत के स्थायी शुल्क का भी भुगतान करना पड़ रहा है। यदि विद्युत उत्पादन एवं प्रसारण कम्पनियों से इस असाधारण परिस्थितियों में कम मांग के अनुरूप स्थायी शुल्क में रियायत मिलती है तो डिस्कॉम्स उपभोक्ताओं को स्थायी शुल्क में छूट दे सकते हैं। विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 11 के अन्तर्गत समुचित सरकार एवं आयोग के निर्देश पर ऐसी रियायत देने का प्रावधान है जिसका उचित वित्तीय पुनर्भरण आयोग द्वारा भविष्य में किया जा सकता है। वर्तमान असाधारण परिस्थितियों का सफल समापन जीवन व्यापन के अधिकांश पहलुओं में परिवर्तन से संभव होगा। हमारे देश में प्रदूषण रहित ग्रीन पावर (सौर एवं पवन ऊर्जा) की विपुल संभावनाऐं हैं जिन्हें लक्ष्यबद्ध तरीके से विकसित किया जा रहा है। वर्ष 2023 तक ग्रीन पावर विद बैट्री स्टोरेज उपलब्ध होने की प्रबल संभावना है। जबकि डिस्कॉम्स द्वारा दीर्घकालीन पावर परचेज एग्रीमेंट्स के जरिये क्रय की जा रही अधिकांश पावर की लागत रू. 4.00 से 5.30 प्रति युनिट है। भविष्य में सस्ती दरों पर उपलब्ध पावर का लाभ उपभोक्ताओं को मिल सके, इसके लिए वर्तमान क्रय अनुबंधों (जो उस समय के हैं जब प्रतिस्पर्धा का अभाव एवं ब्याज दर अधिक थी) की टैरिफ की समीक्षा एवं यथा संभव संशोधन विद्युत एक्ट की धारा 3(3) के अनुसरण में करना समयानुकूल होगा।’
मांग एवं आपूर्ति का सिद्धान्त

वर्तमान में भी विद्युत अन्य उपभोग की वस्तुओं के समान मांग एवं आपूर्ति के सिद्धान्त पर मार्केट में उपलब्ध है। अन्य वस्तुओं के भांति इसकी भी ट्रेडिंग, आयात, निर्यात होने लगा है। एनर्जी एक्सचेंज के जरिये इसकी 24 घंटे सेल, परचेज उपलब्धता एवं मांग के अनुसार तय दर पर की जा सकती है। एक्सचेंज की माध्यम से ओपन मार्केट में वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 10-12 करोड़ यूनिट बिजली का औसत रू 3.25/यूनिट की दर पर लेन देन होता है। अनुबंधित कम्पनियों की दरों से एक्सचेंज/ओपन मार्केट से सस्ती होने के कारण डिस्कॉम्स भी एक्सचेंज से बिजली का लेन देन करते हैं।
राजस्थान सहित देश के सभी डिस्कॉम्स राज्य के अंदर अथवा बाहर स्थापित सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के संयंत्रों से 25 वर्षीय लॉग टर्म पावर परचेज एग्रीमेंट के जरिये विद्युत क्रय करते हैं। पावर के इंटरस्टेट ट्रांसमिशन/परिवहन हेतु केंन्द्रिय उपक्रम पी.जी.सी.आई.एल. अथवा निजी कम्पनी से तथा राज्य के अंदर प्रसारण हेतु राज्य की प्रसारण कम्पनी एवं निजी कम्पनी से दीर्घकालीन अनुबंध होता है। इनमें से अधिकांश अनुबंध ‘कास्ट पल्स‘ आधार पर है जिनकी टैरिफ प्रतिवर्ष समुचित आयोग द्वारा कम्पनी की दायर की गई कॉस्ट के आधार पर निर्धारित की जाती है। निजी कम्पनियों के साथ किये गये अनुबंध (कुछ अपवाद को छोड़कर) ‘टैरिफ बेस्ड कम्पीटिटिव बिडिंग’ के आधार पर हैं।

महंगी बिजली खरीदने की बाध्यता

लेकिन उत्पादन कम्पनियों के साथ किये गये अधिकांश अनुबंध 6-7 वर्ष अथवा उससे भी पूर्वकाल के हैं जब विद्युत की उपलब्धता एवं मांग में काफी अन्तर होने के कारण प्रतिस्पर्धा का अभाव था तथा पूंजी की लागत (ब्याज) दर काफी अधिक थी। सौर एवं पवन ऊर्जा के क्षेत्र में हो रहे निरन्तर रिसर्च एवं तकनीकी विकास के चलते इनकी प्रतिस्पार्धात्मक दर रू 2.55/यूनिट तक आ गयी है। जैसा कि पूर्व में बताया, विद्युत की एनर्जी एक्सचेंज के जरिये 24 घंटे ट्रेडिंग होती है तथा एक मेगावाट से अधिक मांग वाले उपभोक्ता ओपन एक्सचेंज से बिजली खरीद सकते हैं। एक्सचेंज में औसत रू. 3.25/यूनिट की दर से बिजली उपलब्ध होती है क्योंकि डिस्कॉम की दीर्धकालीन अनुबंधों की दर पर बिजली खरीदना अनिवार्य है तो ओपन एक्सचेंज से उपभोक्ताओं द्वारा सस्ती दर पर क्रय की गई विद्युत पर क्रास सब्सिडी एवं सरचार्ज लागू कर प्रभावी दर में वृद्धि कर दी जाती है। यानि कि मार्केट में सस्ती बिजली उपलब्ध होने एवं इसको क्रय करने का एक्ट में प्रावधान होने के बावजूद उपभोक्ता दीर्घकालीन अनुबंधों की बाध्यता के चलते उनसे महंगी बिजली खरीदने को बाध्य हैं।


उत्पादन एवं प्रसारण के दीर्धावधि अनुबंधों की टैरिफ की समीक्षा हेतु निम्न पहलुओं पर विचार किया जा सकता है

1 - रिटर्न ऑन इक्वीटी 15.5 फीसदी को वर्तमान पूंजी की लागत (ब्याज दर) जो पहले से काफी कम है, के अनुसार किया जावे।
2. वर्किंग कैपिटल पर ब्याज तथा भुगतान देरी पर सरचार्ज बैंक ब्याज दर से 2.5 फीसदी अधिक का प्रावधान है। यह दर वास्तविक देय ब्याज के बराबर की जा सकती है।
3. मूल्य हृास की गणना कुल पूंजीगत लागत (इक्विटी एवं ऋण) के शेष पर की जाती है लेकिन कुल अनुमत मूल्य द्वारा की राशि का समायोजन पहले केवल ऋण राशि में किया जाता है। नतीजन लगभग 75ः अनुबंध काल में पूर्ण इक्विटी पर रीटर्न वसूला जाता है जो ऋण पर देय ब्याज से 70 फीसदी अधिक होता है।


आपदाकाल में हो समाधान

वर्तमान में जब देश एक असाधारण आपदा काल से गुजर रहा है तब महंगी बिजली खरीद व स्थाई शुल्क की बाध्यता को लेकर भी ठोस फैसला करना होगा। ऐसा करते वक्त मौजूदा प्रावधानों के दुष्परिणामों को भी ध्यान में रखना होगा। राजस्थान के विद्युत उपभोक्ताओं ने भी उद्योग धंधे बन्द होने के कारण स्थाई शुल्क माफ करने की मांग रखी लेकिन डिस्कॉम्स मांग को पूरा करने की वित्तिय स्थिति में नहीं है। क्योंकि विद्युत मांग में लगभग 40 फीसदी कम होने के बाद भी उत्पादन एवं प्रसारण कम्पनियों को अनुबंध के अनुसार पूरे स्थाई शुल्क का भुगतान करना पड़ेगा। दो माह के लिए 40 फीसदी कम मांग के अनुरूप अगर उत्पादक एवं प्रसारण कम्पनियां स्थाई शुल्क नहीं प्राप्त करती हैं तो यह उनके अनुबंध काल के कुल स्थाई शुक्क़ का लगभग 0.3 फीसदी होगा। विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 11 के अन्तर्गत समूचित सरकार एवं आयोग के निर्देश पर ऐसी रियायत देने का प्रावधान है जिसका उचित वित्तिय पुनर्भरण आयोग द्वारा भविष्य में किया जा सकता है।
राजस्थान के विद्युत क्षेत्र पर नजर डालें तो यहां की वर्तमान अधिकतम) डिमांड लगभग 14300 मेगावाट तथा वार्षिक ऊर्जा की मांग 8300 करोड़ यूनिट है। डिस्कॉम्स को उपलब्ध प्रत्येक यूनिट की लागत (प्रसारण शु ल्क सहित) करीब रू 4.55/- यानि कुल वार्षिक लागत लगभग 37000 करोड़ रूपये है। राज्य की विद्युत ऊर्जा की कुल मांग की 33 फीसदी आपूर्ति राज्य के बाहर स्थित संयंत्रों (एनटीपीसी, टाटा पावर, भाखड़ा व्यास, रिलायंस पावर आदि) तथा शेष राज्य के अंदर स्थित संयंत्रों (उत्पादन निगम, अडानी, राजवेस्ट आदि) से दीर्घकालीन पावर परचेज एग्रीमेंट के जरिये होती है। क्रय की जा रही कुल विद्युत के 70 फीसद से अधिक की लागत राज. ग्रिड पर 4 रू. से अधिक 5.50 रू. प्रति युनिट तक है। राज्य के बाहर से खरीदी जा रही विद्युत की इंटरस्टेट ट्रांसमिशन षुल्क लगभग 82 पैसे प्रति युनिट तथा राज्य के अंदर प्रसारण की लागत करीब 33 पैसे प्रति युनिट है। तापीय विद्युत घरों के पर्यावरण्ीाय मानकों की अनुपालना एवं प्रसारण शुल्क में प्रस्तावित वृद्धि एवं अन्य कारणों से निकट भविष्य में डिस्कॉम्स की पावर परचेज कास्ट में 80-90 पैसे प्रति युनिट वृद्धि संभावित है। यानि डिस्कॉम्स की पावर परचेज की वार्षिक लागत में लगभग 7500-8000 करोड़ रू. की वृद्धि। राजस्थान में सौर एवं पवन ऊर्जा की भी विपुल संभावनाऐं हैं। यहां 250000 मेगावाट से भी अधिक अक्षय ऊर्जा की क्षमता है।

ऐसे संभावित परिदृष्य में निति निर्धारकों एवं रेगुलेटर्स की भूमिका अहम होगी ताकि उपभोक्ताओं के हितों का संरक्षण सुनिष्चित किया जा सके। उपभोक्ता प्रचुर मात्रा में उपलब्ध सस्ती ग्रीन पावर का लाभ उठा सकें, इसके लिए वर्तमान दीर्घकालीन पावर परचेज एवं प्रसारण एग्रीमेंट्स की विद्युत दरों की समीक्षा एवं यथासंभव संशोधन पर विचार का यह सही वक्त है।

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