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प्रसंगवश : नियुक्तियां समय रहते हों, तो मिल सकती है राहत

विशेषज्ञों के साथ समाज के वंचित वर्ग के प्रतिनिधियों को बीस सूत्री कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति में लेने पर ही मकसद पूरा हो सकता है

Published: April 07, 2022 08:28:46 pm

सरकारें चाहे केन्द्र की हों या फिर राज्यों की, वे सब विभिन्न योजनाएं इसलिए बनाती हैं ताकि वास्तविक हकदार को राहत मिल सके। ऐसी योजनाओं से अभावग्रस्त, पीडि़त और वंचित वर्ग से जुड़े लोगों को सहज जीवनयापन में सहयोग मिल सके। एक तरह से उसकी आर्थिक कठिनाइयां भी कम हो सकें। सरकार के आंकड़ों की नजर से देखें तो हर योजना जबरदस्त तरीके से सफल हो रही है। दावे यहां तक हैं कि हर जरूरतमंद को राहत दी जा रही है। लेकिन, जब हम अपने चारों और नजर दौड़ाते हैं, तो पाते हैं कि योजनाओं के जो वास्तविक हकदार हैं, वे तो इनका लाभ ले ही नहीं पा रहे। वे आए दिन सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
सरकारी योजनाओं का यह हाल इसलिए है, क्योंकि इनके क्रियान्वयन का जिम्मा सरकारों ने नौकरशाहों के भरोसे छोड़ रखा है।
राजस्थान में बीस सूत्री कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति को योजनाओं के क्रियान्वयन पर निगाह रखनी होती है, लेकिन हकीकत यह है कि कई जिलों में तो ये कमेटियां अपने सदस्यों का ही इंतजार कर रही हैं। भले ही इन कमेटियों में नियुक्तियों को राजनीतिक नियुक्तियां माना जाता रहा है, लेकिन यह बात भी सच है कि ऐसी कमेटियों के माध्यम से सरकारी तंत्र की निरंकुशता पर अंकुश लगाने का काम होता है। मौजूदा सरकार का कार्यकाल पूरा होने में करीब डेढ़ साल बचा है, लेकिन अब भी राज्य स्तर पर उपाध्यक्ष और दस जिलों की कमेटियों में उपाध्यक्ष की नियुक्ति हुई है। 23 जिलों में उपाध्यक्ष व सदस्यों के पद रिक्त हैं। प्रदेश के विभिन्न आयोग-बोर्ड के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष की नियुक्ति भी लम्बे समय तक पद खाली रहने के बाद हाल ही हुई है। ऐसा इन नियुक्तियों के धीरे-धीरे राजनीतिक नियुक्तियों की रंगत ले लेने के कारण होने लगा है। ऐसी सभी नियुक्तियों के संदर्भ में निश्चित समयावधि में अनिवार्य नियुक्ति किए जाने के प्रावधान होने चाहिए। नियुक्ति प्रक्रिया को भी और अधिक पारदर्शी बनाए जाने की जरूरत है। इनमें विशेषज्ञों, एनजीओ के सदस्यों, समाज के वंचित वर्गों के प्रतिनिधियों को नियुक्ति में प्राथमिकता मिले, तो मकसद पूरा हो सकता है। आयोग- बोर्ड आदि में लम्बे समय तक पद खाली रहने से इन पदों के अधिकार नौकरशाही के पास आ जाते हैं। समुचित अंकुश के अभाव में इनमें मनमानी की आशंका बनी रहती है। (अ.सिं.)
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