रिजर्व बैंक: स्वायत्तता बनाम जिम्मेदारी

रिजर्व बैंक: स्वायत्तता बनाम जिम्मेदारी

Dilip Chaturvedi | Publish: Jan, 07 2019 06:27:26 PM (IST) विचार

दुनिया के किसी भी केंद्रीय बैंक और सरकारों के बीच अक्सर आर्थिक नीतियों पर द्वंद्व चलता रहता है। यह द्वंद्व कभी-कभी 'बोर्ड रूमÓ से बाहर आ जाता है। पर विवादों के घेरे में आ जाए, ऐसा कभी-कभार होता है। आरबीआई व सरकार के बीच यह उस सीमा तक पहुंचा और उर्जित पटेल को इस्तीफा देना पड़ा।

 

अश्विनी महाजन, आर्थिक मामलों के जानकार
हाल ही में देश ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के संदर्भ में एक बड़ी बहस और घटनाक्रम देखा है। आरबीआई कहें या दुनिया का कोई भी केंद्रीय बैंक उसके और सरकार के बीच अक्सर आर्थिक नीतियों के बारे में द्वंद चलता रहता है। द्वंद का कारण होता है कि मौद्रिक और साख (यानी उधार) नीति कैसी होनी चाहिए और कौन मौद्रिक नीति का 'सुप्रीमो' है। यह द्वंद कभी-कभी 'बोर्ड रूम' से बाहर तक पहुंच जाता है। लेकिन यह इस हद तक पहुंच जाए कि वह विवादों के घेरे में आ जाए, यह कभी-कभार ही होता है। लेकिन उर्जित पटेल की अगुआई में रिजर्व बैंक और सरकार के बीच यह विवाद उस सीमा तक पहुंचा और उर्जित पटेल को इस्तीफा देना पड़ा, भले ही उन्होंने इस्तीफे के निजी कारण बताए हैं, लेकिन यह सर्वविदित ही है कि उनका यह कदम उसी विवाद के कारण से है।

आरबीआई के सरका के साथ विवादों को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला भाग वे विवाद है, जो रिजर्व बैंक और सरकार के बीच सदैव चलते हैं। इसमें ब्याज दर नीति संबंधी और उधार नीति से संबंधित विवाद है। किसी भी केंद्रीय बैंक का मानना होता है कि मौद्रिक नीति और उधार नीति का मुख्य लक्ष्य मंहगाई पर काबू करना होता है। इसलिए उन्हें मंहगाई होने का खतरा होने पर ब्याज दरों को ऊंचा रखना पड़ेगा। भारत के संदर्भ में भी रिजर्व बैंक का यही रवैया रहता है। लेकिन सरकार का कहना होता है कि मंहगाई पर काबू पाने के साथ-साथ हमें ग्रोथ के लक्ष्य को नहीं भूलना चाहिए और मौके के अनुसार ब्याज दर घटाकर ग्रोथ को प्राथमिकता देनी चाहिए।

महंगाई लक्षित उधार नीति (यानी क्रेडिट पॉलिसी) भी रिजर्व बैंक को प्रिय होती है। और मंहगाई की आशंका होने पर क्रेडिट को संकुचित करना उसकी नीति का हिस्सा बनता है, जो सरकार को अकसर पसंद नहीं होता तथा इस प्रकार रिजर्व बैंक और सरकार के बीच विवाद चलता रहता है। यह पहले भी चलता रहा है। इसमें कोई नई बात नहीं है। वर्तमान सरकार के समय सुविचारित ब्याज दर नीति के लिए मौद्रिक नीति कमेटी का भी गठन किया गया, ताकि सुविचारित ब्याज दर नीति बने।

रिजर्व बैंक और सरकार के बीच विवाद ज्यादा सामने तब आ गया जब रिजर्व बैंक के एक डिप्टी गवर्नर ने एक भाषण में कहा कि सरकार रिजर्व बैंक के रिजर्व को हथिया लेना चाहती है, जिससे देश में अर्जेंटीना जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। जब रिजर्व बैंक व सरकार के विवाद मुखर हो गए तो उन्हें विस्तार से समझना जरूरी हो जाता है। हुआ यूं कि काफी समय से बैंकों के एनपीए का काफी गंभीर स्थिति में पहुंच चुका है।

इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कह जाना सटीक लगता है कि एनपीए की समस्या पिछली सरकार द्वारा अंधाधुंध उधार देने के कारण हुई। मात्र 4-5 साल में ही बैंकों के उधार 4 गुणा बढ़ गए। गौरतलब है कि रिजर्व बैंक, बैंकों का नियंत्रणकर्ता भी होता है। ऐसे में जब यह सब हो रहा था, रिजर्व बैंक के मौन रहने से भी समस्या गंभीर हुई। यह सही है कि समस्या हो जाने पर तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन ने उस पर सबसे पहले ध्यान आकृष्ट करवाया। एनपीए की गंभीरता को मद्देनजर रिजर्व बैंक ने बैंकों की पूंजी पर्याप्तता (कैपिटल एडिक्वेसी) के बारे में कड़े मापक लगा दिए। यह सही है कि बेसिल कमेटी (जो अंतरराष्ट्रीय निपटान बंदोबस्त संस्थान, स्विटजरलैंड द्वारा गठित की गई थी) ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूंजी पर्याप्तता पर मानक लागू करने की सिफारिश की थी। जिसमें सबसे कड़े मानक 'बेसिल 3' हैं। लेकिन आरबीआई ने बेसिल 3 से भी ज्यादा कड़े मानक बैंकों पर लागू किए जिससे उनकी पूंजी की अनिवार्यता बढ़ गई और वे आगे उधार देने में अक्षम हो गए। यहीं नहीं इस अनिवार्यता को पूरा करने के लिए सरकार को भी ज्यादा पैसा बैंकों को देना जरूरी हो गया।

रिजर्व बैंक बोर्ड जो काफी समय से चर्चा करते हुए निणर्य लेने के बजाए रिजर्व बैंक के अधिकारियों के निर्णय पर मात्र मुहर लगाने का काम करता रहा, ने इस बाबत सवाल खड़ा किया कि जब दुनिया के दूसरे देशों ने बेसिल मानकों से दूरी बनाई हुई है तो रिजर्व बैंक ने उससे भी कड़े मानक क्यों लागू किए? बोडऱ् ने यह भी सवाल खड़ा किया कि लंबे समय से रिजर्व बैंक ने खासा बड़ा 'रिजर्व फंड' क्यों बनाया हुआ है। गौरतलब है कि केंद्रीय बैंक के अतिरेक पर सरकार का अधिकार होता है और अपने पास रिजर्व बढ़ाने के लिए उसे सरकार से अनुमति लेना जरूरी होता है। पर रिजर्व बैंक द्वारा इसमें कोताही बरती गई। ऐसे में बोडऱ् का इस पर सवाल खड़ा करना लाजमी है। पिछली बोडऱ् बैठक में इस संबंध में कमेटी का गठन करने का फैसला किया गया है, जो इसके लिए सिफारिशें देगी। ऐसे 11 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, जहां एनपीए की समस्या गंभीर हो गई है। त्वरित कार्यवाही योजना के तहत उनके द्वारा ऋण देने पर लगभग रोक लगा दी गई है। ये बैंक एक ओर जमा तो स्वीकार कर रहे हैं लेकिन ऋण नहीं दे पाने के कारण और अधिक संकट में आ चुके हैं। बोर्ड ने सवाल उठाया कि ऐसे मानक लागू न किए जाएं जो विश्व में कहीं लागू नहीं है और जिसके कारण बैंकों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए।

सरकार द्वारा नया बैंकरप्सी कानून बनाने के बाद जो ऋण एनपीए हो चुके हैं, उन कंपनियों और व्यक्तियों को जल्द से जल्द दिवालिया घोषित करते हुए उनकी परिसंपत्तियों की नीलामी का प्रावधान बना है। बड़े उधार लेने वालों में से ऐसे कई हैं जो जानबूझकर उधार नहीं चुका रहे। लेकिन कई छोटे ऋणियों (लघु एवं मंझोले उद्यमियों) की समस्या यह है कि पिछले काफी समय से मंदी की मार पडऩे के कारण वे ऋण नहीं चुका पा रहे। इस संबंध में रिजर्व बैंक उनको कोई रियायत देने की मन: स्थिति में नहीं था। लेकिन बोर्ड के हस्तक्षेप करने के बाद अब 25 करोड़ तक के ऋणों की अदायगी को आगे बढ़ाया गया है।

रिजर्व बैंक और सरकार के बीच विवाद का एक बड़ा मुद्दा उसके 'गवर्नेंस' यानि शासकीय व्यवस्था को लेकर है। हालांकि संविधान और कानून स्पष्ट है कि रिजर्व बैंक और उसके अधिकारी रिजर्व बैंक बोडऱ् के प्रति जिम्मेवार हैं, लेकिन अभी तक का आचरण उससे अलग रहा है और रिजर्व बैंक बोर्ड एक रबर स्टैंप के रूप में ही रहा। यह विषय 14 दिसंबर, 2018 की बोडऱ् बैठक में चर्चा में आया।

हालांकि रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल द्वारा इस्तीफा देने के बाद शशिकांत दास को रिजर्व बैंक का नया गवर्नर बनाया गया है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि रिजर्व बैंक की स्वायत्तता की क्या परिभाषा होगी? लेकिन यह बात माननी होगी कि स्वायत्तता कभी निरंकुश नहीं होती, वह जिम्मेवारी के साथ ही होगी।


(लेखक, दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन। स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक।)

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