ब्लूमबर्ग से... पेंडोरा पेपर्स से जुड़े अमीरों को कोई न कोई रास्ता मिल ही जाएगा

विश्व परिदृश्य : पेंडोरा पेपर्स लीक, विश्व के खोजी पत्रकार समुदाय इंटरनेशनल कॉन्सोर्टियम ऑफ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (आइसीआइजे) के लिए अब तक का सबसे बड़ा लीक है। मीडिया में जॉर्डन के बादशाह अब्दुल्ला द्वितीय, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सहयोगी, चेक प्रधानमंत्री आंद्रेज बाबिस और केन्या के राष्ट्रपति उहुरू केन्याटा का नाम विदेशों में संपत्ति छिपाने के मामले में सामने आया है।

By: Patrika Desk

Published: 06 Oct 2021, 09:57 AM IST

डेविड फिकलिंग (कमोडिटीज से जुड़े मामलों के स्तम्भकार)

विदेशों में पैसा जमा रखने संबंधी करीब 4 करोड़ दस्तावेजों के लीक होने के आठ साल बाद भी कोई खास बदलाव क्यों नहीं आ सका है? इस सवाल का जवाब आपको मिलेगा बिली हॉलिडे के एक गाने में। इसमें कहा गया है - 'जिनके पास है, उन्हें मिलेगा और जिनके पास नहीं है, उनका और खोएगा। बाइबल में भी यही कहा गया है और यह अभी भी खबर है।' पेंडोरा पेपर्स लीक, विश्व के खोजी पत्रकार समुदाय इंटरनेशनल कॉन्सोर्टियम ऑफ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (आइसीआइजे) के लिए अब तक का सबसे बड़ा लीक है। मीडिया में जॉर्डन के बादशाह अब्दुल्ला द्वितीय, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सहयोगी, चेक प्रधानमंत्री आंद्रेज बाबिस और केन्या के राष्ट्रपति उहुरू केन्याटा का नाम विदेशों में संपत्ति छिपाने के मामले में सामने आया है। 2013 में आइसीआइजे ने पहला ऐसा खुलासा किया था। तब से लेकर आज तक स्थितियां जस की तस हैं।

सरकारों द्वारा विदेशों की इस संपत्ति का इस्तेमाल कॉर्पोरेट टैक्स कम करने और राजस्व पूर्ति के लिए करने का वादा किया गया था लेकिन आठ साल में लगता है हर उपाय उल्टा ही पड़ा। विश्व के तटीय इलाकों में स्थित इन वित्तीय केंद्रों में इतना पैसा बहता है कि ऐसे कागजी लेन-देन की राशि किसी भी देश को आम तौर पर मिलने वाले विदेशी निवेश से कहीं ज्यादा है। इन वित्तीय ढांचों की रॉयल्टी और लाइसेंसिंग फीस वस्तु व्यापार और पारम्परिक सेवाओं के मुकाबले तेजी से बढ़ रही है। ज्यादातर विकासशील देशों ने पिछले एक दशक में अपने कॉर्पोरेट करों में कटौती कर सहयोग किया है। ईयू टैक्स ऑब्जर्वेटरी की गत माह आई रिपोर्ट के अनुसार, 2014 में लाए गए संपत्ति की घोषणा अनिवार्य करने संबंधी नियम भी कोई काम नहीं आए। हाल ही हुए लीक में जिन प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आए हैं, उससे जाहिर है कि जो लोग अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह के नियम और संधियां तय करते हैं, वे मौजूदा स्थिति से अत्यधिक लाभ उठाएंगे। जितनी ज्यादा गैर-वाजिब संपत्ति और अधिकार कुछ चुनिंदा लोगों और व्यवसाय के हाथ में रहेंगे, वे उसी जगह अपना पैसा रखेंगे, जहां उनके साथ नरमी से पेश आया जाएगा।

परामर्शदाता भी इससे फायदा उठाने की कोशिश करेंगे, वे खामियां ढूंढने वाले विशेषज्ञ बन जाएंगे। इससे संपत्ति का जमावड़ा बढ़ेगा और कर का आधार खत्म होगा। मुद्दा यह है कि ये कर कानून और संधियां काफी लंबी और जटिल हैं। जब कर अपवंचना के चर्चित ढांचे 'डबल आइरिश डच सैंडविच' की तर्ज पर पांच देशों में फैले क्षेत्र को 320 राष्ट्रीय और उप राष्ट्रीय न्यायधिकरणों में बांटा जाता है, तो स्पष्ट होता है कि खामियां अंतहीन हैं। ओईसीडी के जरिए 130 न्यायाधिकरणों के बीच संधि से कर नियम पुन: तय करने के मामले में भी यही लागू होता है। इसे इसी माह तय किया जाएगा।

प्रस्ताव का मुख्य तथ्य है- 15 प्रतिशत वैश्विक न्यूनतम कर (जीएमटी)। सरकारें इसे सर्वसम्मति से लागू कर सकती हैं। समय बीतने के साथ ही लगने लगा है कि यह वैश्विक अधिकतम कर में न तब्दील हो जाए। 1970 में ब्रैटन वुड्स व्यवस्था खत्म होने के बाद से विश्व भर में अनियंत्रित पूंजी प्रवाह असल समस्या है। साथ ही उन लोगों के हाथ में थोड़ी बहुत पूंजी सदा बनी रहती है, जो अपनी पूंजी कानून या कर अधिकारियों से बचाना चाहते हैं। दुनिया का वित्तीय ढांचा अभी यह तय करने के शुरुआती दौर में है कि पूंजी खाते खोलना और मौद्रिक आत्मनिर्भरता खोना या विनिमय दरों में स्थिरता फायदे का सौदा है या घाटे का। अगर सरकारें लक्षणों की मरहम पट्टी करने की बजाय कर अपवंचना के असल कारण का समाधान करना ही चाहती हैं तो उन्हें पुनर्विचार करना होगा।

(ब्लूमबर्ग से विशेष अनुबंध के तहत)

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