चेतावनी: ग्लोबल वार्मिंग का खतरा, 2025 तक बढ़ सकता है 1.5 डिग्री वैश्विक तापमान

- पिछले दशक के मुकाबले पारा बढऩे की आशंका दोगुनी
- 2015 के बाद गर्म रहे 6 साल।

By: विकास गुप्ता

Published: 28 May 2021, 11:43 AM IST

नई दिल्ली। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी पर औसत तापमान अब 1800 के दशक के अंत की तुलना में लगातार 1 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म है। संयुक्त राष्ट्र की इस एजेंसी की रिपोर्ट में पाया गया है कि वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस वार्मिंग की ओर बढ़ रहा है। 40 फीसदी आशंका है कि अगले पांच साल में यानी 2025 तक पृथ्वी पर औसत वार्षिक तापमान अस्थायी रूप से किसी वर्ष 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा तक पहुंच जाएगा। पिछले दशक में यह अनुमान लगाया गया था कि किसी एक वर्ष के 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा तक पहुंचने की आशंका केवल 20% थी। दूसरे शब्दों में पारे के इतना गर्म होने की आशंका दोगुनी हो गई है।  डब्ल्यूएमओ ने अपनी स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट 2020 रिपोर्ट में कहा कि 2015 के बाद से छह साल सबसे गर्म रहे हैं और 2011-2020 सबसे गर्म दशक रहा।

क्या है पेरिस जलवायु समझौते का लक्ष्य-
पेरिस जलवायु समझौते का लक्ष्य पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में तापमान में वृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना है। आदर्श रूप से वार्मिंग को 1.5 डिग्री से नीचे रखने का प्रयास करना है। इस तरह मानवता के लिये संभावित खतरे से बचाव को सुनिश्चित करना है।

पार न कर जाएं सीमा-
पृथ्वी पर वार्षिक तापमान में अल्पकालिक जलवायु चक्रों के अनुसार उतार-चढ़ाव होता है, जिसका अर्थ है कि कुछ वर्ष दूसरों की तुलना में बहुत अधिक गर्म होते हैं। भले ही समग्र रेखा लगातार ऊपर जाती है। डब्ल्यूएमओ के अनुसार पिछले साल 1800 के अंतिम दशक की तुलना में वैश्विक तापमान 1.2 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म था। सूखे, बाढ़ और हीटवेव ने अंटार्कटिका को छोड़कर हर महाद्वीप पर लोगों की जान ले ली।

मुसीबतों को न दें बुलावा-
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के सबसे विनाशकारी और दीर्घकालिक प्रभावों से बचने के लिए औसत वार्षिक वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर जाने से रोकना चाहिए। तापमान के इस सीमा तक पहुंचने का मतलब बाढ़, गंभीर सूखा, महासागरों की गर्मी, उष्णकटिबंधीय तूफानों को बढ़ावा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सतत विकास पर बुरे असर को बुलावा देना है।

लॉकडाउन से नहीं लगा ब्रेक-
पिछले साल लॉकडाउन से कुछ उम्मीद थी कि आवागमन और उद्योगों के कामकाज में कमी जलवायु परिवर्तन की गति में एक ब्रेक बन सकती है। लेकिन सच कहूं तो ऐसा नहीं है।
—रॉडेल सरवेनी, जलवायु वैज्ञानिक, एरिजोना यूनिवर्सिटी, अमरीका

विकास गुप्ता
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