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Patrika Opinion: रुपए को फौरन बूस्टर डोज देना आवश्यक

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद बदले वैश्विक आर्थिक-राजनीतिक हालात में कमजोरी रुपए का स्थायी भाव बनी हुई है। मुद्रा की कीमत में गिरावट का तात्कालिक प्रभाव मुद्रास्फीति में वृद्धि के रूप में सामने आता है।

Published: May 30, 2022 10:59:56 pm

डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए की कीमत में गिरावट के सिलसिले ने अर्थशास्त्रियों की चिंता बढ़ा रखी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में वैसे तो पहले भी इन दोनों मुद्राओं का भाव ऊपर-नीचे होता रहा है, पर पिछले कुछ दिनों से चिंता का स्तर इसलिए बढ़ा हुआ है कि रुपए में बार-बार भारी गिरावट दर्ज की जा रही है, जबकि रिकवरी का अनुपात उत्साहजनक नहीं है। एक डॉलर का भाव कई दिन से 77 रुपए से ज्यादा चल रहा है। पहले माना जाता था कि माह के आखिर में तेल कंपनियों की ओर से डॉलर की मांग बढऩे से भारतीय रुपया आम तौर पर कमजोर नजर आता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद बदले वैश्विक आर्थिक-राजनीतिक हालात में कमजोरी रुपए का स्थायी भाव बनी हुई है। मुद्रा की कीमत में गिरावट का तात्कालिक प्रभाव मुद्रास्फीति में वृद्धि के रूप में सामने आता है। यानी महंगाई के पीछे रुपए की कमजोरी भी है।
प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र
भारतीय रिजर्व बैंक के मुताबिक 2010 के मुकाबले 2022 में रुपया करीब 38 रुपए कमजोर हो चुका है। यानी 2010 में एक डॉलर की कीमत 45.72 रुपए थी, जो अब 77 रुपए से ज्यादा हो चुकी है। दूसरे बाजारों की तरह मुद्रा बाजार भी मांग व आपूर्ति पर काम करता है। मुद्रा बाजार में अमरीकी डॉलर के दबदबे का सीधा मतलब है कि मांग व आपूर्ति के मामले में वह दूसरी मुद्राओं से काफी आगे है। भारत का घटता विदेशी मुद्रा भंडार भी रुपए की सेहत बिगडऩे की बड़ी वजह माना जा रहा है। हमारा विदेशी मुद्रा भंडार इस साल 15 अप्रेल तक 603 अरब डॉलर था, जो 29 अप्रेल को घटकर 597.72 डॉलर रह गया। रुपए की मजबूती के लिए विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की गिनती बढ़ाने के लिए रिजर्व बैंक की कोशिशों के अपेक्षित नतीजे फिलहाल सामने नहीं आए हैं।
रुपए में गिरावट कई आर्थिक मोर्चों पर चुनौतियां खड़ी करती है और इससे हर वर्ग सीधे-सीधे प्रभावित होता है। आयात महंगा हो जाता है। विदेशों से सामान खरीदने के लिए पहले से ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है। नतीजतन घरेलू बाजार में यह सामान महंगा हो जाता है। पहले से महंगाई से त्रस्त जनता को दोहरी मार झेलनी पड़ती है। रुपए में गिरावट से शेयर बाजार को भी झटका लगा है। विदेशी संस्थागत निवेशक पहले से पैसे निकाल रहे हैं। नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) के मुताबिक इस साल विदेशी निवेशक 1.38 लाख करोड़ रुपए के शेयर बेच चुके हैं। रुपया इसी तरह कमजोर बना रहा तो उनके पैसे निकालने की रफ्तार और बढ़ सकती है। रुपए को बूस्टर डोज देने के लिए सरकार और रिजर्व बैंक जितनी जल्दी कदम उठाएंगे, देश की अर्थव्यवस्था के लिए उतना बेहतर होगा।

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