समाज के वंचित वर्ग की सुरक्षा सबसे पहले

- सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्यों को पिछले दिनों ही प्रतिबंधात्मक उपाय सख्त करने की नसीहत दी थी। कोरोना संक्रमण के डराने वाले आंकड़े सामने आ रहे हैं।

By: विकास गुप्ता

Published: 05 May 2021, 08:30 AM IST

कोरोना संक्रमण के डराने वाले आंकड़े सामने आ रहे हैं। अधिकतर राज्यों में लॉकडाउन जैसी पाबंदियां लोगों की रोजी-रोटी पर मंडराते संकट की ओर इशारा कर रही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भले ही लॉकडाउन को अंतिम विकल्प बताते हुए राज्यों को इससे बचने की सलाह दी है, लेकिन विषम हालात के बीच पहले की तरह सख्त लॉकडाउन की चर्चाएं भी चल निकली हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्यों को पिछले दिनों ही प्रतिबंधात्मक उपाय सख्त करने की नसीहत दी थी। साथ ही यह भी कहा था कि लॉकडाउन जैसे कदमों से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले लोगों को भी सुरक्षा देने के लिए कदम उठाने की जरूरत है। जाहिर है ऐसे तबके को, जिसकी रोजी-रोटी पर संकट आ खड़ा हुआ है, दोनों मोर्चों पर सुरक्षा देनी होगी।

आर्थिक संकट के साथ-साथ सेहत पर आया संकट दोहरी मजबूरी बन कर सामने आया है। मौजूदा परिदृश्य में केंद्र व राज्य सरकारों के सम्मुख समाज के कमजोर वर्ग का हाथ थामने की कोई ठोस योजना नहीं दिखती। दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने आगामी दो माह तक राशन कार्ड धारकों को दो माह का मुफ्त राशन देने के साथ ऑटो रिक्शा व टैक्सी ड्राइवर को पांच हजार रुपए की आर्थिक सहायता देने का ऐलान किया है। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार ने अस्पतालों में सेवाएं दे रहे चिकित्सकों व पैरा मेडिकल स्टाफ को २५ फीसदी अतिरिक्त वेतन देने की बात कही है। सभी राज्य अपने-अपने स्तर पर योजनाएं लागू कर भी रहे हैं। अदालतें भी समय-समय पर राज्यों को दिशानिर्देश जारी कर रही हैं। लॉकडाउन उपायों में कमोबेश सबकी ही आमदनी पर असर पड़ा है। जो बचत थी, वह पिछले साल के लंबे लॉकडाउन की भेंट चढ़ गई।

हालत यह है कि अस्पतालों में इलाज के लिए जगह नहीं है, तो ऑक्सीजन और जीवन रक्षक दवाइयों का संकट भी पैदा हो गया है। राज्यों के स्तर पर किए जा रहे प्रयास कम पडऩे लगे हैं। सरकारें अपना पूरा बजट सेहत को समर्पित कर भी दें, तो भी जनजागरूकता के बिना संक्रमण की कडिय़ों को तोडऩा काफी मुश्किल काम है। लॉकडाउन के तमाम खतरे हैं। फिर भी यह सख्ती मजबूरी में करनी पड़ जाए, तो वंचित वर्ग का खास ध्यान रखना होगा। चिंता यह है कि सरकारों ने कोरोना की पहली लहर से उपजे हालात से सबक लिया ही नहीं। चुनाव समेत भीड़ एकत्रित करने वाली तमाम गतिविधियों को अनुमति देना भारी पड़ गया। हालात भयावह हों, इससे पहले ही सरकारों को दीर्घकालिक योजना बनाने की जरूरत है।

विकास गुप्ता
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