scriptscenes of dissent disappeared and proved ineffective | UP Election Result Analysis: बेअसर साबित हुए विरोध और असंतोष के दृश्य | Patrika News

UP Election Result Analysis: बेअसर साबित हुए विरोध और असंतोष के दृश्य

  • उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नतीजों का विश्लेषण: विपक्ष के काउंटर-नैरेटिव को भाजपा ने नहीं दिया मौका
  • बहुल अस्मिताओं की उपस्थिति में अंतिम रूप में कौन-सी अस्मिता प्रभावी होती है इसका पूर्वानुमान कठिन है। अब अपने पक्ष में लामबंद वंचित समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना भाजपा के लिए चुनौती है।

Published: March 11, 2022 12:18:26 pm

अर्चना सिंह

(एसोसिएट प्रोफेसर, गोविंद बल्लभ पंत सोशल साइंस इंस्टीट्यूट, प्रयागराज)

उत्तर प्रदेश के चुनाव हमेशा ही सभी के लिए एक उत्सुकता का विषय रहते हैं। प्रदेश की जनसंख्या, राजनीतिक चेतना, जाति के आधार पर स्पष्ट विभाजन, अस्मिता की सशक्त राजनीति, ये सभी कारक चुनावी विश्लेषकों, शोधार्थियों और अकादमिक लोगों के सामने उत्तर प्रदेश को एक चुनौती के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
UP Election Result Analysis
UP Election Result Analysis
उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव 2022 में भाजपा की जीत एक बार फिर से दृश्य और अदृश्य चुनावी विमर्शों की पड़ताल मांगती है। इस बार चुनाव से पहले ही विपक्ष कोरोना महामारी का असर एवं राज्य की व्यवस्था व संसाधनों पर बड़े प्रश्न खड़े कर रहा था। विश्लेषकों की दृष्टि में राज्य कई जगह विफल हो रहा है, जबकि कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कुशल प्रशासन की सराहना की गई थी। चुनाव के दौरान जमीन पर ये मुद्दा अदृश्य ही रहा। भाजपा के लिए किसान आंदोलन एक और बड़ी चुनौती बना। अधिकतर विश्लेषकों का मानना था कि ये मुद्दा भाजपा की हार का कारण बनेगा। लेकिन प्रधानमंत्री ने कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा के साथ किसानों से माफी मांग ली और आश्चर्यजनक रूप से यह मुद्दा उत्तर प्रदेश चुनाव, यहां तक कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के परिणामों को भी बहुत अधिक प्रभावित न कर सका। ऐसा ही एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा जो कि सरकार के पक्ष में गोलबंदी के लिए अनुमानित था - राममंदिर, काशी विश्वनाथ और मथुरा। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से ये मुद्दे भाजपा के चुनावी विमर्श से बस हिन्दू मन को छू कर गुजर गए।
चुनावी विमर्श का हिस्सा न बनने में केवल सरकार के लिए नकारात्मक परिणाम देने वाले मुद्दे ही जमीन से नहीं गायब हुए। बल्कि ऐसे मुद्दे भी गायब रहे, विपक्ष जिनके काउंटर नैरेटिव तैयार कर रहा था। विपक्ष को पूरा विश्वास था कि ये सरकार इन मुद्दों को अपने पक्ष में गोलबंदी के लिए जनता के बीच ले आएगी। और वे अपने काउंटर नैरेटिव से भाजपा को ध्वस्त करेंगे। भाजपा ने उन्हें यह मौका ही नहीं दिया। महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दे पूरे चुनावी विमर्श को प्रभावित करते हुए दिखे। लोगों में नाराजगी थी महंगाई व बेरोजगारी के लेकर। युवाओं में असंतोष दिखा। पर ये असंतोष भी वोट के रूप में परिणत नहीं हुआ। पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि धर्म का मुद्दा जमीन से गायब रहा। हिन्दुत्व मोबिलाइजेशन का टूल नहीं बना। या लोक के गुस्से का असर, वह चाहे किसान आंदोलन को लेकर रहा, या बेरोजगारी या सरकारी भर्तियों में तकनीकी खामियों के कारण हुई देरी, कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाया।
हमें एक गहन पड़ताल करनी होगी जहां इतने सारे दृश्य विरोध व असंतोष के मौजूद थे, पर चुनाव परिणामों पर इसका अपेक्षित असर नहीं दिखा। इसका एक बड़ा कारण है कि हमें हमेशा प्रभावी कथ्य, तेज आवाजें, प्रतिरोध ही दिखता है और इसी के आधार पर हम नतीजों की कल्पना करते हैं। पर ढेर सारे अदृश्य तथ्य, खामोशी, छिपे हुए प्रतिरोध हमारी दृष्टि से छूट जाते है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहां एक बड़ी जनसंख्या आज भी विभिन्न सामाजिक कारणों से सीमांत है, उसकी आकांक्षाएं, आवाज, प्रतिरोध हम तक नहीं पहुंच पाते हैं। क्योंकि इनके कथ्य बिखरे हुए, असंगठित व छिपे हुए अर्थों वाले होते हैं। इस अदृश्य प्रभाव को नापने के टूल अभी भी कम हैं। महिलाएं भी ऐसे सीमांत समुदाय के एक बड़े हिस्से का निर्माण करती हैं। इनकी बढ़ती हिस्सेदारी इनके वोटिंग प्रतिशत में दिखती है। निश्चय ही गोलबंदी तो हुई। पर मुद्दे शायद अलग लेंस से देखे जा सकेंगे।
सच है 'वोट तो ओट में होता है'। सुरक्षा एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना। कमजोर व सीमांत वर्ग अपनी सुरक्षा को लेकर सशंकित दिखा। बहुत सारे दलित वर्ग के लोगों में अपनी सुरक्षा को लेकर भय दिखा। वे भाजपा से असंतुष्ट थे सरकार से उनकी ढेर सारी अपेक्षाएं थीं, पर उनकी स्मृतियों में सपा के शासनकाल में हुए अत्याचार आज भी ताजा हैं। उनके लिए निर्णय कठिन था। वह भी ऐसे दौर में, जबकि मायावती का प्रचार कमजोर था, बसपा चुनावी विमर्श से बाहर थी। बसपा का गैर जाटव वोट का स्थानांतरण भाजपा की ओर हुआ। इसका बड़ा कारण था उनका अपने को वृहत्तर हिन्दू अस्मिता में देखना और मुसलमानों के सपा के ध्रुवीकरण के खिलाफ गोलबंदी। ये ऐसे अंडरकरंट थे जिन्हें समझना कठिन था। एक विमर्श जो बाद में चर्चा आया था, वह है लाभार्थी चेतना। जिसकी बात प्रोफेसर बद्रीनारायण बार-बार कर रहे थे। पर इसका वोट के रूप में बदलना एक बड़ा प्रश्न था। फील्ड के दौरान हमारी टीम के सदस्य लगातार ग्रामीण जनता, विशेषकर महिलाएं व दलित, से सरकार से मिलने वाले कैश व फ्री राशन की बात कर रहे थे। पर येे बहुत ही फ्रैगमेन्टेड नैरेटिव था। जिसे पकड़ पाना थोड़ा कठिन था। क्योंकि उनकी बातों में उनकी शिकायतें अधिक प्रभावी थीं। कुछ महिलाएं 'जेकर खाई उही के गाई' जैसे कथन कह रही थीं, धीमी, क्षीण आवाज में। पर लाभार्थी चेतना ने न सिर्फ उन्हें गोलबंद किया, बल्कि आगे भी ऐसे लाभ मिलने की आकांक्षा ने उन्हें भाजपा की ओर बढ़ाने का काम किया।
उत्तर प्रदेश की आबादी के एक बड़े हिस्से, जो कि गांवों में रहता है, की आंकाक्षाएं, उनकी परिभाषाएं, उनके कथन की डिकोडिंग ही हमें सही परिदृश्य दिखा सकती थी। इन नतीजों ने हमारे लेंस पर प्रश्न खड़ा किया है। क्योंकि हमें देखना होगा कि किसान, मजदूर, छात्र के पास भी हिन्दू मन है, जातीय अस्मिता है। इन बहुल अस्मिताओं की उपस्थिति में अंतिम रूप में कौन-सी अस्मिता प्रभावी होती है इसका पूर्वानुमान कठिन है। अब चुनाव नतीजों के बाद अपने पक्ष में लामबंद इन वंचित समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना भाजपा के लिए एक चुनौती है। अभी तक उच्च जातियों की पार्टी की छवि वाली भाजपा के लिए छोटे समुदायों की दबी-कुचली आवाजें सुनना, उन्हें आदर देना कठिन चुनौती होगी।

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