साइंस एंड टेक : अब एआइ बचाएगा फसल को

- बढ़ती पर्यावरण और स्वास्थ्य चिंताओं के मद्देनजर एआई का प्रयोग किसानों के लिए पारम्परिक कीटनाशकों का विकल्प लेकर आया है

By: विकास गुप्ता

Published: 05 Feb 2021, 07:48 AM IST

एंड्रयू नौएल और एग्निजस्का डिसूजा

नई दवाओं के निर्माण के क्षेत्र में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस पहले ही कमाल दिखा रहा है। अब कीटनाशक उद्योग भी इसे आजमा रहे हैं। स्विट्जरलैंड की कम्पनी सिन्जेंटा अब इनसिल्को मेडिसिन के साथ मिल कर आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के टूल्स का प्रयोग कर खरपतवार नाशक बनाने में लगी है। इसके लिए पारम्परिक तौर पर प्रयोगशालाओं में होने वाली प्रारंभिक चरण की प्रक्रिया के बाद एआई की सहायता से ऐसे अणु बनाए जा सकते हैं, जो फसल संरक्षण में उपयोगी हों। कम्पनियां ऐसे कीटनाशक बनाना चाहती हैं, जो लंबे समय तक असरदार रहें और पर्यावरण के अनकूल हों। बढ़ती पर्यावरण और स्वास्थ्य चिंताओं के मद्देनजर एआई का प्रयोग किसानों के लिए पारम्परिक कीटनाशकों का विकल्प लेकर आया है, जो लंबे समय तक असरदार रहने वाला है। नियामकों के दबाव के चलते भी इसकी मांग को समर्थन मिल रहा है। खास तौर पर कानूनी मुकदमों के कारण भी ऐसा देखा जा रहा है। बेयर का 11 बिलियन डॉलर का विवाद समझौता इसका उदाहरण माना जा सकता है, जिसमें दावा किया गया है कि लंबे समय से इसके द्वारा प्रयुक्त किया जा रहा कीटनाशक ग्लाइफोसेट हर्बिसाइड कैंसर कारक है। सिन्जेंटा में फसल संरक्षण अनुसंधान प्रमुख कैमिला कोरसी ने कहा-'यह गेमचेंजर साबित हो सकता है।' विवादों में आने के बावजूद पचास साल पुराना रसायन ग्लाइफोसेट आज भी ज्यादातर किसानों की पहली

पसंद है, लेकिन अब कीटों व खरपतवार पर इसका असर होना बंद हो गया है। कोरसी ने कहा है कि ग्लाइफोसेट का विकल्प तैयार करना कीटनाशक उद्याोग के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है और हम इसके लिए कई सालों से प्रयासरत हैंं। एआई तकनीक से ही इसका समाधान मिल सकता है। यह बात पिछले साल तब सुर्खियों में आई जब गूगल की एक इकाई ने प्रोटीन की संरचना संबंधी भविष्यवाणी की, जिसमें कहा गया कि ये औषधि अनुसंधान से लेकर एंजाइम बनाने तक में काम आ सकते हंै, जो प्रदूषणकारी तत्वों को भी खत्म करने में कारगर होंगे। कृषि क्षेत्र की बात की जाए, तो पारम्परिक पेस्टीसाइड्स का विकल्प लाने के लिए ही रसायन एवं जैव तकनीकी कम्पनियां साथ मिलकर काम कर रही हैं। सिन्जेंटा ऐसे जैविक समाधानों में निवेश करने में लगी है, जिनके जरिये सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीटों के यौन फेरोमोन्स का प्रयोग फंगल संक्रमण और कीटों से मुकाबले के लिए किया जा सके। दरअसल, कम्पनियां चाहती हैं कि पारम्परिक रसायनों के बदले ऐसे कीटनाशकों का प्रयोग किया जाए, जो मनुष्यों के लिए विषाक्त न हों और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील हों।

फिलेडेल्फिया की ही एक कम्पनी एफएमसी कॉर्प ने डेनमार्क की नोवोजाइम्स के साथ साझेदारी की है, जो कीटों को निशाना बनाने वाले माक्रोब्स (जीवाणु) बनाती है। नियामकों द्वारा रसायनों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने का दबाव बढ़ता जा रहा है और उपभोक्ताओं की भी निरंतर यही मांग है।
ब्लूमबर्ग

विकास गुप्ता
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