वैज्ञानिक सीख रहे हैं शीत-निद्रा

भिक्षुओं द्वारा योग साधना में प्रयोग की जाने वाली शीत-निद्रा मंगल जैसे मिशन के लिए जरूरी मानी जा रही है। इस साधना में लीन हो जाने पर भिक्षुओं को चिकित्सीय रूप में मृत घोषित कर दिया जाता है। उनके शरीर से कोई दुर्गंध भी नहीं आती और फिर वे सामान्य अवस्था में भी आ जाते हैं।

By: सुनील शर्मा

Updated: 21 Jun 2021, 10:55 AM IST

- प्रमोद भार्गव, लेखक एवं साहित्यकार, मिथकों को वैज्ञानिक नजरिए से देखने में दक्षता

बौद्ध भिक्षु रूस के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को ऐसे तरीके सिखा रहे हैं, जिनके जरिए हफ्तों तक अर्ध-सुप्तावस्था या शीत-निद्रा में रह सकें। भिक्षुओं की ये ज्ञान पद्धतियां अंतरिक्ष अभियानों में यात्री उपयोग में लाएंगे, जिससे उनकी यात्रा सरल हो जाए। मास्को स्टेट विवि के वैज्ञानिक दलाई लामा की अनुमति से सौ बौद्ध भिक्षुओं पर यह अध्ययन कर रहे हैं।

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मार्स-500 और लंबी दूरी के रूसी स्पेस मिशन के प्रमुख प्रो. यूरी बबयेव का कहना है कि भिक्षुओं द्वारा योग साधना में प्रयोग की जाने वाली शीत-निद्रा मंगल जैसे मिशन के लिए जरूरी मानी जा रही है। बबयेव का समूह मुख्य रूप से तिब्बती भिक्षुओं की ‘टुकड़म प्रणाली’ पर शोध कर रहा है। इस साधना में लीन हो जाने पर भिक्षुओं को चिकित्सीय रूप में मृत घोषित कर दिया जाता है। तत्पश्चात भी वे बिना किसी शारीरिक तत्वों के क्षरण के सीधे बैठे रहते हैं। उनके शरीर से कोई दुर्गंध भी नहीं आती और फिर वे सामान्य अवस्था में भी आ जाते हैं। यह दल मानसिक चेतना की बदलती हुई अवस्थाओं पर भी अध्ययन कर रहा है।

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शीत-निद्रा, योग-निद्रा, ध्यान और प्राणायाम जैसी पद्धतियों को सीखकर ये वैज्ञानिक चयापचय (मेटाबॉलिज्म) की गति को नियंत्रित करने अथवा परिवर्तित करने के गुण सीख रहे हैं। लंबी दूरी की अंतरिक्ष यात्रा भोजन की कमी के बावजूद सुगमता से करने में इससे मदद मिल सकती है और शरीर को किसी प्रकार की हानि भी नहीं होगी। ऐसा माना जाता है कि शीत-निद्रा या योग-निद्रा की प्रेरणा ऋषि-मुनियों ने वन्य-प्राणियों से ली थी।

तिब्बती बौद्धों में इस साधना में उत्तीर्ण होने के लिए एक कठिन परीक्षा से गुजरना होता है। इसमें शिक्षार्थियों को तिब्बत के पठारों पर जब बर्फ गिरती है, तब गिरती बर्फ के नीचे बैठकर साधना में लीन होने की आज्ञा दी जाती है। जब ये भिक्षु साधना की पूर्ण स्थिति में लीन हो जाते हैं, तब शून्य से नीचे तापमान होने के बाद भी इनके शरीर से पसीना गिरता रहता है। शरीर और मन पर नियंत्रण की यह अद्वितीय साधना भिक्षु की अंतिम परीक्षा होती है। बहरहाल, क्या रूस के वैज्ञानिकों से प्रेरित होकर भारतीय वैज्ञानिक भी अंतरिक्ष अभियानों के लिए योग साधनाओं के प्रयोग को अपनाने की हिम्मत जुटाएंगे?

सुनील शर्मा
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