आत्म-दर्शन: रहमतों का महीना

रोजा इंसान को भूखे और प्यासे इंसान की परेशानी का एहसास कराता है और उनको बुरे कामों से बचाकर नेक काम की ओर प्रेरित करता है।

By: विकास गुप्ता

Published: 16 Apr 2021, 08:33 AM IST

इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है रमजान महीने के रोजे रखना। हर आकिल (अक्ल रखने वाला) और बालिग मुसलमान पर रमजान के महीने के रोजे रखना फर्ज (अनिवार्य) है। रोजा सुबह से शाम तक भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि इससे इंसान में तकवा (ईश्वरीय भय) और परहेजगारी (संयमशीलता) पैदा होती है। रोजा इंसान को भूखे और प्यासे इंसान की परेशानी का एहसास कराता है और उनको बुरे कामों से बचाकर नेक काम की ओर प्रेरित करता है।

कुरआन कहता है- ऐ ईमान लाने वालो! तुम पर रोजे अनिवार्य किए गए, जिस प्रकार तुमसे पहले के लोगों पर अनिवार्य किए गए थे, ताकि तुम ईश्वर का डर रखने वाले बन जाओ। (२: 183) पवित्र कुरआन रमजान के महीने में ही अवतरित हुआ। कुरआन कहता है- रमजान के महीने में कुरआन उतारा गया लोगों के मार्गदर्शन के लिए। यह कुरआन सत्य और असत्य को साफ बयां करता है प्रमाणों के साथ। (२: 183) इस्लाम के आखिरी पैगंबर मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने फरमाया कि जब रमजान शुरू होता है, तो स्वर्ग के दरवाजे खोल दिए जाते हैं और नरक के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। साथ ही शैतान कैद कर लिए जाते हैं।

विकास गुप्ता
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