आत्म-दर्शन : अवसाद का कारण

संपन्न वर्ग में यह आशा खत्म हो जाती है। वे अवसाद में हैं, क्योंकि बाहर जो कुछ भी किया जा सकता है, सब हो चुका है, अब कुछ बाकी नहीं रहा है।

By: विकास गुप्ता

Published: 20 May 2021, 10:04 AM IST

सद्गुरु जग्गी वासुदेव, ईशा फाउंडेशन के संस्थापक

लोग अपने मिजाज में कई तरह से अवसाद भर सकते हैं। बहुत सारे लोगों के साथ, खासतौर पर संपन्न वर्ग में, त्रासदी यह होती है कि उनके पास सब कुछ होता है, पर फिर भी कुछ नहीं होता। अवसाद का मतलब है कि कहीं न कहीं, एक खास तरह की निराशा घुस गई है। अगर आप किसी पिछड़े गांव में जाएं, जहां लोग बहुत गरीब हैं, फिर भी वहां आपको आनंदपूर्ण चेहरे दिखेंगे, क्योंकि उन्हें आशा रहती है कि कल कुछ बेहतर होगा। संपन्न वर्ग में यह आशा खत्म हो जाती है। वे अवसाद में हैं, क्योंकि बाहर जो कुछ भी किया जा सकता है, सब हो चुका है, अब कुछ बाकी नहीं रहा है।

एक गरीब आदमी सोचता है कि नए जूते पहनने को मिल जाएं, तो सब कुछ बढिय़ा हो जाएगा। अगर उसे नए जूते मिल गए, तो वह एक राजा की तरह चलेगा। उसके चेहरे पर खुशी नजर आएगी, क्योंकि उसकी आशा पूरी हुई है और अब भी उसे आशा है। बाहर सभी चीजें अभी ठीक नहीं हुई हैं। संपन्न वर्ग में बाहर सब चीजें ठीक हो चुकी हैं, पर उनके अंदर कुछ भी ठीक नहीं है। इसीलिए निराशा और अवसाद है। उनके पास अच्छा खाना है, मकान है, कपड़े हैं, सब कुछ है, पर फिर भी कुछ गलत है, और वह क्या है बस वे यही नहीं जानते। जैसे हम बाहर की ओर काम करते हैं, वैसे ही हमें अपने अंदर की बातों को भी ठीक कर लेना चाहिए और तभी संसार सुंदर होगा। हम जिसे आध्यात्मिक प्रक्रिया कहते हैं, वह बस यही है। यानी अपने जीवन के सिर्फ भौतिकतावादी पहलू पर ही नहीं, बल्कि अपनी चेतना के पहलू पर भी ध्यान दीजिए।

विकास गुप्ता
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