शरीर ही ब्रह्माण्ड - गॉड पार्टिकल: ऋत या सत्य

समय और दूरी की अवधारणा भी ब्रह्म पर लागू नहीं होती। टेलीपैथी की अवधारणा का मूल भी यही है। किन्तु कौन जान रहा है, किसको जान रहा है, अनुभव मात्र का विषय है। गॉड पार्टिकल (कण) ऋत नहीं हो सकता।

By: Gulab Kothari

Published: 12 Jun 2021, 07:12 AM IST

- गुलाब कोठारी

सूर्य के आगे आकार है ही नहीं। वहां तो देवता भी वायु रूप हैं। उनकी शक्तियां भी वायु रूप हैं। सूर्य ही अक्षर सृष्टि का केन्द्र तथा जगत का आत्मा कहा जाता है। सूर्य सृष्टि का प्रथम 'षोडशकल' बालक है। आगे पंचकल ब्रह्मा है। इसके आगे चतुष्पाद ब्रह्म के दो पाद- परात्पर और निर्विशेष हैं। वही निर्विशेष वेदों का ब्रह्म है जहां से प्रथम 'कण' अव्यय पुरुष की सृष्टि होती है।

छान्दोग्य उपनिषद् में ऋषि कहते हैं 'तत्त्वमसि'-वह तू ही है। तू ही सत्य है, तू ही आत्मा है, तू ही ब्रह्म है। प्रलय अवस्था में निराकार भी वही ब्रह्म है और सृष्टि रूप में स्थूल भाव में भी वही ब्रह्म है। सुषुप्ति काल में व्यक्ति अचेत की तरह सोता है। न कुछ भान रहता है, न ही कुछ याद रहता है। उस अवस्था में सभी प्राणी 'सत्' में लीन हो जाते हैं। सबके भीतर उस काल में जो सूक्ष्म तत्त्व रहता है, वही ब्रह्म है। सब उसी के रूप हैं। वही आत्मा है-तत्त्वमसि। वही तू है। जिस प्रकार समुद्र में लीन होने पर नदियों की पहचान समाप्त हो जाती है, परन्तु वे नहीं जानती कि हम सत् में स्थित हैं और जागने पर भी नहीं जानती कि हम सत् में थीं। सारी प्रजाओं का मूल सत् है तथा सब इसी पर आश्रित हैं।

हम किसी वृक्ष को कहीं से भी काटें, कुछ रस निकलता है। पेड़ में रहता है। एक डाली को काटें तो वह सूख जाएगी। जड़ के नीचे बीज नहीं रहता किन्तु पेड़ में बहता रहता है। बीज को तोड़कर देखो तो भीतर कुछ नहीं है, किन्तु पेड़ बनने की क्षमता है और पूरे पेड़ का स्वरूप भी है। फल प्राप्ति भी बीज की उपस्थिति (प्राण रूप में) रहने से ही संभव है। तत्त्वमसि - वही तू है। जो सूक्ष्म तत्त्व पेड़ में बह रहा है, फल दे रहा है, वही तत्त्व बीज में भी है। वही सत्य- आत्मा है।
अन्य उदाहरण जल का है। उसमें नमक मिला देने पर नमक, पानी में घुल जाता है किन्तु दिखाई नहीं देता। सारा पानी खारा हो जाता है। सत् भी सर्वत्र रहते हुए दिखाई नहीं देता। आत्मा की वही सूक्ष्म सत्ता सत् है। वह तू ही है।

व्यक्ति कैसे एक दूसरे को पहचान लेते हैं। मरणासन्न व्यक्ति की वाणी जब तक मन में लीन नहीं हो जाती, मन प्राण में, प्राण तेज में और तेज आत्मा में लीन नहीं हो जाते, व्यक्ति पहचानता रहता है। प्रत्येक देह का आधार एक आत्मा ही है। आत्मा की यह सूक्ष्म सत्ता तू ही है। आत्मा को पांचों महाभूत नष्ट नहीं कर सकते। ये भी आत्मा से ही पैदा होते हैं।

ये सारे उदाहरण आत्मा या ब्रह्म के व्यावहारिक उदाहरण है। प्रत्येक उदाहरण में ब्रह्म निराकार है। हम बीज को देख सकते हैं, उसके फल को देख सकते हैं, किन्तु जो प्राण बीज से निकलकर पेड़ का निर्माण करते हैं और फल प्राप्ति तक कार्यरत रहते हैं, वह कोई 'कण' नहीं हो सकता। जिस प्राण से वस्तु सत् बनती है, वही ब्रह्म है। ब्रह्म एक तत्त्व है, गतिमान तत्त्व है। ऋत (निराकार) भाव से स्थूल भाव तक यात्रा करता है। स्थूल सृष्टि के केन्द्र में भी वही रहता है। जैसे कोई बीज प्रत्येक फल में रहता है। पिता, पुत्र में रहता है। सृष्टि काल में ब्रह्म अग्नि-सोम के यज्ञ रूप में आगे बढ़ता है। वही अग्नि है, वही सोम भी है। आरंभ में दोनों के ऋत रूप से ऋतुएं बनती है। अग्नि के रसात्मक सत्य से परिगृहीत होकर सत्य स्वरूप बन जाता है। सत्य तो तत्त्वत: आत्मा का स्वरूप है, जिसको वाणी से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। व्यावहारिक-ऐन्द्रियक सत्य भी इन्द्रियगम्य नहीं है। सूक्ष्म प्राण विज्ञान ही तत्त्व विज्ञान है। यही विज्ञान दृष्टि वास्तविक दृष्टि है। इसी के सहारे मानव बुद्धि केन्द्रस्थ सत्य-तत्त्व तक पहुंचती है। वाणी की अपेक्षा मन आत्मसत्य के अधिक निकट है। अत: आत्मसत्य ही सत्य की परिभाषा है। वस्तु के हृदय केन्द्र में स्थित प्राण ही सत्य की परिभाषा है। ऋत का कोई केन्द्र या शरीर नहीं होता। अत: क्या ब्रह्म की इस यात्रा का अध्ययन किया जा सकता है?

प्रश्न यह भी है कि क्या यात्रा में ब्रह्म का स्वरूप बदलता है? नहीं! केवल आवरण (शरीर) बदलता है। केन्द्र में ब्रह्म वही निराकार रूप में रहता है। तभी तो 'अणोरणीयान महतोमहियान्' बना रह सकता है। हाथी और चींटी के शरीर में समान रूप से व्याप्त रहता है। अव्यक्त रहता है। स्वयं जीव भी नित्य जीवन में कहां देख पाता है। शरीरों के आकार चौरासी लाख हैं। जीव एक से निकलकर दूसरे में प्रवेश करता रहता है। नए शरीर का आकार ले लेता है। अत: प्रत्येक प्राणी ही 'अहं ब्रह्मास्मि' है।

ब्रह्म द्युलोक से, मह: लोक से चलकर पृथ्वी लोक पर आकर स्थूल शरीर में प्रवेश करता है। सम्पूर्ण यात्रा मार्ग में जीव नए रूप धारण करता जाता है । प्रत्येक अगला स्वरूप पिछले स्वरूप से स्थूलतर होता है। प्रत्येक जीव का आत्मा षोडशकल (१६ कलाओं वाला) होता है। इसमें अव्यय, अक्षर, क्षर पुरूष की पांच-पांच कलाएं तथा परात्पर केन्द्र में रहता है। यह परात्पर ही ब्रह्म माया का युगल है। सृष्टि का पहला षोडशी पुरुष चूंकि सूर्य हैं, अत: वही सम्पूर्ण सृष्टि का आत्मा है। यहीं से सृष्टि का आरंभ है। सूर्य का दक्षिण गोलाद्र्ध मत्र्य है, अत: आगे की सृष्टि का एक नाम मृत्यु लोक भी है। यह नश्वर सृष्टि है।

सूर्याग्नि में द्युलोक का श्रद्धा सोम आहूत होता रहता है। सूर्य समिधा की तरह जलता रहता है। इस यज्ञ से जो नया निर्माण होता है वह सोम राजा है। सोम की तीन स्थितियां होती हैं-घन, तरल, विरल। विरल अवस्था से तरल (वायु) रूप हो जाता है। वायु भी ऋत है।

वायु रूप अग्नि से पर्जन्य (बादल) का निर्माण होता है। पर्जन्य (आदित्य) सूर्य की सन्तान ही है। इसमें वायु रूप सोम जलता है। विद्युत पैदा होता है। अप् (घन सोम) रूप नई सृष्टि उत्पन्न होती है। यही अप् जल रूप बरसता है। भिन्न-भिन्न आकाशीय पिण्डों पर बरसकर यह जल भिन्न-भिन्न प्रकार की नई सृष्टि पैदा करता है। जल के भीतर स्थित ब्रह्म प्राण ही पृथ्वी में बीजारोपण करता है। स्वयं जड़-चेतन सृष्टि को उत्पन्न करके, भीतर प्रविष्ट हो जाता है। मनुष्य भी इसी क्रम में उत्पन्न होता है। पृथ्वी पर उत्पन्न अन्न शरीर की वैश्वानर अग्नि (जठराग्नि) में आहूत होकर शरीर को बड़ा करता है। नए शरीर को उत्पन्न करने के लिए शुक्र बनता है। आगे चलकर यही शुक्र मन का निर्माण करता है। अत: शुक्र का संचालन भी मन ही करता है।

शुक्र स्वयं द्रव्य पदार्थ है जिसमें शुक्राणु संरक्षित रहते हैं। इन शुक्राणुओं के शुक्र भाग में वृषा रूप पुंभ्रूण रहता है। यही सोम रूप मानव-बीज स्त्री देह में योषा प्राण से युक्त होकर ब्रह्मविवर्त को आगे बढ़ाता है। योषा-वृषा दोनों ही ऋत रूप है। निर्मित शरीर तो सत्य (आकार) रूप होता है। इसमें व्याप्त ब्रह्म ऋत रूप में ही रहता है जिस प्रकार दूध में घी।

ब्रह्म पंचाग्नि के माध्यम से आता-जाता है। अग्नि-सोम के यज्ञ से, महाभूतों (पांच) के माध्यम से और सातों लोकों में विचरता हुआ सार्वभौमिक और सार्वकालिक है। समय और दूरी की अवधारणा भी ब्रह्म पर लागू नहीं होती। टेलीपैथी की अवधारणा का मूल भी यही है। किन्तु कौन जान रहा है, किसको जान रहा है, अनुभव मात्र का विषय है। गॉड पार्टिकल (कण) ऋत नहीं हो सकता। अक्षर हो सकता है, अव्यय हो सकता है, किन्तु ब्रह्म नहीं हो सकता। ब्रह्म भीतर ही मिलेगा, माया के आवरण में। बाहर तो संभव ही नहीं है। वैज्ञानिकों को ध्यान में उतरना पड़ेगा।

क्रमश:

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