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शरीर ही ब्रह्माण्ड : असुर भाव भी हो जाए देव

- व्यक्ति पूर्व जन्म की दैवीय सम्पत्तियों से अथवा आसुरी सम्पत्तियों से युक्त होकर आता है। किन्तु वर्तमान जन्म के संस्कारों के अनुरूप वह अपने दैवीय अथवा आसुरी भावों से मुक्त हो सकता है।
- जिस प्रकार जब तक बादल है तब तक प्रकाश आवरित रहता है, वायु रूप उपाय से बादल के हटने पर प्रकाश प्रकट हो जाता है। उसी प्रकार हम जन्मसिद्ध संस्कार को वैध संस्कारों से बदलने में समर्थ हो सकते हैं। जन्मसिद्ध दैवीसम्पत्ति भी आसुरी सम्पत्ति बन जाती है तथा आसुरी सम्पत्ति भी दैवी सम्पत्ति में बदलती देखी जाती है।

नई दिल्ली

Updated: September 25, 2021 08:21:34 am

शरीर ही ब्रह्माण्ड : असुर भाव भी हो जाए देव
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