शरीर ही ब्रह्माण्ड : जगत् है प्राणों का तपन

प्राण के समावेश से ही भौतिक वस्तु 'प्राणी' कहलाती है। प्राणों की सत्ता रहने तक ही वस्तु प्राणवान् रहती है अन्यथा वह निष्प्राण हो जाती है। प्रश्न है कि यदि प्राणों के कार्य का परिणाम विधारण (धारण करने की क्षमता) करना है तो कार्य क्या है? तपना ही प्राणों का कार्य है।

By: Gulab Kothari

Published: 11 Sep 2021, 06:43 AM IST

- गुलाब कोठारी

विश्व में जड़ और चेतन मूलत: दो ही प्रकार की सृष्टि है। जो श्वास लेता है वह चेतन है, जहां श्वास प्रक्रिया दिखाई नहीं देती वह जड़ है। इन्द्रियों का होना चेतनता है और इन्द्रियविहीन पदार्थ जड़ है। स्थावर-जंगम में प्राण हैं। जहां आकृति है, वहां केन्द्र है। केन्द्र ऋक्, आकृति साम है। मध्य में यजु: प्राण है। आकृति शरीर है, केन्द्र मन है। मध्य में प्राण सेतु है। भले ही जड़ श्वास नहीं लेता किन्तु उसके जीवन का आधार भी प्राण ही है। जीवन के आधार को ही ईश्वर कहते है। आत्मा को मन-प्राण-वाङ्मय कहा जाता है। जड़ पदार्थ वाक् रूप तो दिखाई देता ही है। मन और प्राण अदृश्य रूप में केन्द्र में रहते है। केन्द्र का होना ही पदार्थ का स्वरूप कहलाता है। जहां केन्द्र है वहां ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र हैं। यही कारण है कि लोहा हो या स्वर्ण, समय के साथ उनमें भी जंग लगता है, अर्थात् प्राणन् क्रिया वहां भी निरन्तर बनी रहती है। प्राणहीन काष्ठ समय के साथ मिट्टी हो जाती है। दूसरी ओर इन्हीं प्राणों की शक्ति से कोयला हीरा बन जाता है, लोहा स्वर्ण बन जाता है। व्यक्ति प्राणों का यदि पूर्ण रूप से नियमन करता है, प्राणों को सृष्टि साक्षी दिशा के विपरीत मोड़कर मोक्ष साक्षी कर लेता है, तब वह प्रज्ञा को जागृत कर लेता है। शनै:शनै: त्रिगुण से बाहर निकल जाता है। यही प्राण का पितृभाव कहा जा सकता है।

सृष्टि कार्य कर्म है। इस क्रियामय कर्म को तपशक्ति से युक्त प्राण तत्त्व ही करने में सर्वथा समर्थ है। प्राण तत्त्व के नेतृत्व में वाक् व मन के सहयोग से सृष्टिकर्म सम्पन्न होता है। केवल इच्छा करने से कार्य की सिद्धि नहीं होती, उसके लिए कर्म करना आवश्यक है। गीता भी इसी मत को स्थापित करती है कि 'कर्मण्येवाधिकारस्ते'। सांसारिक जीवन के लिए कृष्ण कहते हैं कि कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है। कर्म के बिना फलसिद्धि असंभव है-अवश्यमेव कत्र्तव्यं कृतं कर्म शुभाऽशुभम्। कोई भी क्षणमात्र भी क्रिया के बिना नहीं रह सकता - न हि कश्चित् क्षणमपि... जातु तिष्ठत्य कर्मकृत्। जब मानव को ही अपने सामान्य फलों के लिए कर्म करना आवश्यक है तो अतिविशिष्ट इस विश्व सृजन के लिए तो असाधारण कर्म अनिवार्य ही है।

इच्छा एवं आवश्यक साधनों की उपलब्धि के साथ तपशक्ति का होना अनिवार्य है। प्राणों के व्यापार से तप होता है- एतद्वै तप इत्याहुर्यत् स्वं ददाति अर्थात् जिसमें कर्मकर्ता स्वयं का दान कर देता है वह तप है।

अत: सृष्टि सर्जना में इच्छा, श्रम एवं तप तीनों की एक साथ आवश्यकता मानी गई है। यहां इच्छा का सम्बन्ध मन से, श्रम का वाक् से तथा तप का प्राण से माना गया है। ज्ञानमय मन का व्यापार इच्छा, क्रियाप्रधान प्राण का व्यापार तप तथा अर्थमूला वाक् का व्यापार श्रम है। इस रूप में मन-प्राण-वाक् तीनों ही सृष्टि के मूल तत्त्व हैं। इन तीनों के एक साथ समन्वय से ही यह नाम-रूप-कर्मात्मक विश्व उत्पन्न हुआ है। फिर भी विश्व में प्राणों को ही सबका मूलाधार माना जाता है। प्राणों के च्युत हो जाने से वस्तु का स्वरूप नष्ट हो जाता है।

प्राण के समावेश से ही भौतिक वस्तु 'प्राणी' कहलाती है। प्राणों की सत्ता रहने तक ही वस्तु प्राणवान् रहती है अन्यथा वह निष्प्राण हो जाती है। प्रश्न है कि यदि प्राणों के कार्य का परिणाम विधारण (धारण करने की क्षमता) करना है तो कार्य क्या है? तपना ही प्राणों का कार्य है।

आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक तीनों में से किसी भी तत्त्व को प्राप्त करने के लिए जो व्यापार (कार्य) किया जाए, वही 'तप' है। वह व्यापार तप तभी कहलाएगा, जबकि उसमें अपने आत्मा का समर्पण होगा। आप अन्य वस्तु को स्वयं में लाना चाहते हैं। इसके लिए पहले अपने आप में स्थान बनाना पड़ेगा। जिस स्थान पर आप प्राप्त वस्तु रखना चाहते हैं, उस स्थान के प्राणों को विसर्जित करना पड़ेगा। यदि बिना प्राणदान के आप किसी की सम्पत्ति को ले लेंगे, तो उससे आप उचित लाभ नहीं उठा सकेंगे। प्राणदान वाले परिश्रम से जो सम्पत्ति लाभ होता है, उससे आत्मा में शान्ति प्राप्त होती है। बिना आत्म समर्पण के लाभ हो ही नहीं सकता। वास्तविक शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती।

अपनी आन्तरिक शक्तियों का सर्वस्व दान ही तप है, यही आत्मतर्पण है। यही वास्तविक प्राण व्यापार है। किसी प्रिय वस्तु को छोडऩा, दान देना, उससे विलग होना द्ग इनमें जो पीड़ा अनुभूत होती है वही तपन कहलाती है। इस तपन से ही कार्य सिद्धि संभव है। सामान्य जीवन के उदाहरण से इस तपन को समझ सकते हैं - स्वयं की अत्यन्त प्रिय वस्तु, जैसे विवाह में अपनी पुत्री का सुयोग्य वर को दान दिया जाता है। इस कन्यादान में माता-पिता को जो आत्मिक व मानसिक पीड़ा होती है वही तप कही जाती है। यहां कन्यादान रूपी तप की तपन से ही आगे के कर्मों की सिद्धि संभव होती है। सृष्टि कार्य में गति आती है। इसी तपन को कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् में अत्यन्त मार्मिक रूप में स्पष्ट किया है।

यास्यत्यद्येति शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया,
कण्ठ: स्तम्भितवाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्।
वैक्लव्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकस:,
पीड्यन्ते गृहिण: कथं नु तनयाविश्लेषदु:खैर्नवै:।।

कण्व ऋषि अपनी पालिता पुत्री की विदाई के अवसर पर भाव विह्वल होकर कहते हैं कि आज शकुन्तला अपने पतिगृह को जाएगी यह सोचने मात्र से मेरा हृदय व्याकुल हो रहा है। यद्यपि यह मेरी पालिता पुत्री है फिर भी मैं व्यथित हो रहा हूं तो अपनी औरस पुत्री की विदाई के अवसर पर गृहस्थों की क्या दशा होती होगी? इस रूप में महर्षि के हृदय की जिस परम कारुणिक अवस्था का वर्णन किया गया वस्तुत: वही तपन है।

सृष्टि सर्जना में भी तप की अतिविशिष्ट महिमा है। स्वयंभू, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी इस पञ्चपर्वा विश्व में स्वयंभूलोक को प्राणों का लोक कहा जाता है। विष्णु की नाभिकमल पर आसीन ब्रह्मा स्वयंभूलोक के अधिष्ठाता हैं। चूंकि स्वयंभू ऋषिप्राणों का लोक है और प्राणों का कार्य तपन है अत: इसके आगे का लोक तपोलोक कहा जाता है। इसी स्वयंभूलोक से आगे की सारी सृष्टियों का निर्माण होता है। स्वयंभूलोक की सत्याग्नि में अत्यधिक तपन होने से अप् तत्त्व उत्पन्न होता है। यह अप् तत्त्व स्वयंभूलोक के तीन अग्नि वेदों ऋक्-यजु व साम के कारण उत्पन्न होता है। वस्तुत: तीनों वेदों में यजु: ही मूल तत्त्व है, वह ऋक् व साम से घिरा रहता है। यजु: में यत् एवं जू दो तत्त्व है। यत् गतिकारक तथा जू स्थिति कारक है। यत् अर्थात् गति से घर्षण होने से तपन पैदा होता है तथा इसी तपन से स्वेद निकलता है। यह स्वेद ही अप् तत्त्व है। जब अनन्त विजातीय ऋषि प्राणों का परस्पर घर्षण होता है तो अप् पैदा होता है। इस अप् तत्त्व के कारण आपोमय परमेष्ठी लोक की सर्जना होती है।

परमेष्ठी में भृगु व अङ्गिरा इन युगल तत्त्वों की सृष्टि होती है। भृगु के अप्, वायु, सोम तथा अङ्गिरा के आदित्य, यम व अग्रि इन छह तत्त्वों की परमेष्ठी लोक में सर्जना होती है। इन तत्त्वों के केन्द्रीभूत भाग को अथर्व कहते है। अत: परमेष्ठी को अथर्वलोक भी कहा जाता है। जिस प्रकार स्वयंभू लोक के शुद्ध मौलिक प्राण ऋषि कहलाते हैं उसी प्रकार परमेष्ठी के प्राण पितर कहे जाते हैं। ये पितर प्राण ऋषि प्राणों के पञ्चीकरण से उत्पन्न होते हैं।

पुन: परमेष्ठी के अप् व वायु के घर्षण से अंगिरा रूप में विद्यमान अग्रि तत्त्व अति प्रज्ज्वलित होकर सूर्य बनता है। सूर्य से ही पाञ्चभौतिक सृष्टि का प्रारम्भ होता है। चन्द्रमा एवं पृथ्वी भी पांचभौतिक जगत् कहे जाते हैं। अत: समस्त स्थावरजंगम रूप जगत् का मूल कारण तो ऋषि प्राणों में ही विद्यमान है। क्योंकि इन्हीं के तपन का परिणाम यह दृश्यमान जगत् है।

क्रमश:

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