‘वर्क फ्रॉम होम’ से घर में कर्फ्यू का हुआ अहसास!

जिन परिवारों में पति और पत्नी दोनों ही ‘वर्क फ्रॉम होम’ कर रहे हैं, उन परिवारों में तो स्थिति बहुत ज्यादा खराब हुई है।

By: सुनील शर्मा

Published: 15 Jun 2021, 12:28 PM IST

- डॉ. अमियकुमार महापात्र एवं डॉ. अंकुर सक्सेना

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान कार्यालय के काम और यात्रा के दौरान संक्रमण के खतरे से बचाव के लिए कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को कार्यालय की बजाय अपने-अपने घरों से काम करने की अनुमति दी। यह माना गया था कि इससे कर्मचारियों को कुछ राहत मिलेगी और उन्हें परिवार के साथ अधिक समय बिताने का अवसर मिलेगा, पर विशेषज्ञ ऐसा नहीं सोचते हैं। मनोचिकित्सक और व्यवहार तंत्रिका विज्ञान विशेषज्ञ कह रहे हैं कि ‘वर्क फ्रॉम होम’ ने व्यक्तिगत सीमाओं को खत्म कर दिया। एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एसोचैम) के सीएसआर काउंसिल के अध्यक्ष अनुसार ‘वर्क फ्रॉम होम’ ने पूरे परिवार के पारिस्थितिकी तंत्र को अस्त-व्यस्त कर दिया है। वहां स्थिति और भी बिगड़ी हुई है, जहां पति और पत्नी दोनों ही वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं।

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कोरोना काल में सामाजिक ताने-बाने और व्यावहारिक मानदंडों के इस अप्रत्याशित परिवर्तन ने बच्चों के व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित किया है। इस नई और अपूर्व स्थिति ने उनके सीखने, खेलने, व्यवहार करने, बातचीत करने और भावनाओं को संभालने और प्रदर्शित करने के तरीके को बदल दिया है। इस तनावपूर्ण स्थिति का प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। ऐसे में घर में बंद, मोबाइल में गेम खेलते बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाने से नई समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। जिन घरों में माता और पिता दोनों ही घर के दो हिस्सों में ऑफिस चला रहे हों, वहां तो बच्चे को खेलने, आवाज करने और चंचल मन के साथ मां और पिता के पास आने की भी अनुमति नहीं। बुजुर्ग अपने कामकाजी बेटा-बहू को दिन-भर सिर्फ यही हिदायत दे पा रहे हैं कि कंप्यूटर और मोबाइल से आंखों को कैसे बचाएं और अपने नियोक्ता से काम के घंटे निर्धारण करने की बात करें, ताकि घर के सदस्यों को भी उनका कुछ समय मिल पाए।

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छोटे मकानों में रहने वाले निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों में तो व्यक्ति का सम्मान ही दांव पर है। कोरोना ने मास्क से सबके चेहरे छुपा दिए, परन्तु घर से काम करने के कारण घर के अंदर की जो स्थिति सब से छुपी थी, वह कैमरे के दूसरी और बैठे सह कर्मचारियों को दिख ही जाती है। व्यवहार और सामाजिक परिवर्तनों के अलावा, कोरोना महामारी के दौरान वर्क फ्रॉम होम ने घर के वातावरण में भौतिक स्थान की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला है। ध्यान देने वाली बात यह है कि सभी कर्मचारियों के पास घर में कार्यालय का काम करने का स्थान नहीं है।

अनलॉक और तीसरी लहर की आशंका के बीच कुछ आवश्यक उपाय करने पड़ेंगे। इसमें सर्व प्रथम है, समय और कार्य प्रबंधन, जिससे घर के हर सदस्य के साथ समय बिता कर स्वयं और सभी सदस्यों की ‘मेन्टल इम्युनिटी’ बढ़ाई जा सके। घर में ऑफिस के एक कोने का निर्माण करने के साथ ही हेडफोन जैसे उपकरणों का उपयोग जैसे कुछ समाधान खोजे जा सकते हैं। स्कूली बच्चों और किशोरों के लिए दोस्त बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। महामारी के कारण दोस्तों का साथ नहीं मिल पा रहा। ऐसे में घर के बुजुर्गों और बच्चों के मनोरंजन के लिए खास उपाय जरूरी हैं। घर पर कार्य की अवधारणा अभी भारतीय समाज के लिए बहुत नवीन है। मुश्किल यह है कि वर्तमान में इस व्यवस्था ने परिवार के सदस्यों को घर में ही कर्फ्यू का अहसास दिया है। कार्यालय की तरह ही हमारा घर एक संस्था है और जैसे कि कार्यालय में एक संस्कृति होती है और एक नियमों की सूची का पालन करना पड़ता है, वैसे ही घर के नियमों-सीमाओं को पहचानने और ध्यान में रखने की आवश्यकता है। नियोक्ताओं और कर्मचारियों को इस महत्त्वपूर्ण पक्ष की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

सुनील शर्मा
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