कठोर फैसलों की मुलायम नीति

उत्तर प्रदेश की राजनीति और नेताजी मुलायम सिंह यादव को जो लोग जानते हैं उनको समाजवादी पार्टी व सरकार

By: मुकेश शर्मा

Published: 14 Sep 2016, 11:15 PM IST

उत्तर प्रदेश की राजनीति और नेताजी मुलायम सिंह यादव को जो लोग जानते हैं उनको समाजवादी पार्टी व सरकार में ताजा घटनाक्रम से कोई खास आश्चर्य नहीं हो रहा।  मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पहले शिवपाल   सिंह यादव के दो करीबी मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया, मुख्य सचिव की कुर्सी छीन ली। इसके बाद शिवपाल यादव से अहम विभाग छीनकर कम महत्व के विभाग दे दिए। उत्तर प्रदेश की राजनीति समझने वालों को यह नेताजी की एक बहुत सोची-समझी रणनीति लगती है।

  इस चुनाव में और यदि सपा की सरकार नहीं बन पाई तो इसके बाद के समय में  पुत्र अखिलेश यादव की छवि को बचाने के लिए ही यह कवायद हुई दिखती है।  मुलायम सिंह राजनीति में जमीनी हकीकत को अपने समकालीन अन्य नेताओं से ज्यादा अच्छा समझते  हैं।  उन्हें शायद लगने लगा है कि उनकी पार्टी अगले चुनाव में सरकार नहीं बना पाएगी।  ऐसा कयास भी लगाया जा रहा है कि उत्तरप्रदेश में अगले चुनाव में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलेगा।  ऐसी स्थिति में अखिलेश को परिवार की राजनीति में शहीद बता कर नेताजी शायद उनकी बिगड़ी छवि को बचाने में सक्षम हो जाएं।  

मुलायम के कुनबे में विवाद की हालिया शुरुआत मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल के सपा में विलय से  हुई दिखती है।  जब पार्टी को लगा कि कौमी एकता दल के विलय से फायदे से ज्यादा नुकसान  हो सकता है तो इसे शिवपाल यादव के मत्थे टांग दिया गया। शिवपाल सिंह यादव के बारे में कहा जा रहा था कि वे गुड्डू  पंडित और राज किशोर सिंह जैसे बाहुबलियों और भ्रष्टाचार के विवादों में रहे नेताओं को शह देते रहे हैं। इन सबके लिए शिवपाल को ही  दोषी करार करके मुलायम सिंह अपने  अखिलेश की छवि को साफ-सुथरा बनाए रखना चाहते हैं। सबको पता है कि  पिछले चुनावों में भी शिवपाल सिंह को हाशिए पर रखा गया था। और नेताजी अपने बेटे की छवि  को भुनाने में सफल हो गए थे।


 आगरा का चर्चित रामवृक्ष यादव प्रकरण और बहुत से दूसरे ऐसे उदाहरण है कि जब भी भ्रष्टाचार, मनमानी और ज्यादती के प्रकरण सामने आए सारा दोष शिवपाल यादव के मत्थे डाल दिया गया। पार्टी में शिवपाल के समर्थित ऐसे बहुत से विधायक और नेता टिकटों की दौड़ में हैं जिनके बारे में माना जा रहा है कि यदि इनको टिकट मिला तो पार्टी की छवि को नुकसान ही पहुंचेगा। अब जो ताजा विवाद खड़ा हुआ है उसकी आड़ में पार्टी और शिवपाल एक-दूसरे पर टालकर ऐसे लोगों से बच सकेंगे। मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश यादव का  कार्यकाल कोई खास करिश्माई नहीं रहा। पार्टी और सरकार के पास जनता को बताने व दिखाने के लिए कोई बड़ी उपलब्धि भी नहीं है।


  हालांकि यह भी सच है कि पार्टी या सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार या ऐसा कोई बड़ा मामला खुले में नहीं आया है  जैसा कि मायावती की सरकार में एनआरएचएम का मामला था। यह बात जरूर है कि सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार के कई किस्से -कहानियां गाहे- बगाहे लोगों की जुबान पर आती तो हैं लेकिन मीडिया में या खुले तौर पर इनको ज्यादा हवा नहीं मिली। एक बात यह भी है कि समाजवादी पार्टी की सरकार और अखिलेश यादव के पास 'छवि-प्रबंधनÓ का अच्छा और प्रभावी का इंतजाम है। उनके पास नीलेश मिश्रा और अभिषेक मिश्र जैसे इमेज-मैनेजर है।  राज्य सरकार भी अपनी छवि सुधारने के अभियान पर खासा खर्च कर रही है।


इसका बेहतर उदाहरण यही है कि मुज्जफरनगर के साम्पद्रायिक दंगो की चर्चा अब चुनाव के ऐन-पहले समाचार माध्यमों से गायब हैं। न ही इनको लेकर कोई बहस करता दिखता।  परिवार के विवाद पर यदि इन दिनों समाचार पत्रों को देखें तो नए-पुराने ऐसे समाचार- फोटो नजर आते हैं जिससे संदेह होता है कि नियोजित तरीके से इनको जारी करवा रहा है। इसे मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक चतुराई कह  लें या प्रभावी और सटीक छवि प्रबंधन, इस पूरे कार्यकाल में विपक्षी दल भी अखिलेश और उनकी सरकार पर कोई गंभीर आरोप नहीं लगा पा रहे हैं।


यह बात सही है कि पिछले दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति  में उथल पुथल हुई है । अभी और उथल-पुथल होना बाकी है।  अब तक आए अधिकतर चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में यह दिख रहा है कि सपा अपने बलबूते सरकार नहीं बना पाएगी। राज्य में कोई ऐसा बड़ा दल भी नहीं है जिससे वह चुनाव पूर्व गठबंधन कर सके। साथ ही यह भी दिख रहा है कि अन्य दल भी आपस में कोई गठबंधन नहीं कर पाएंगे। यह भी आशंका है कि जो भी सरकार बनेगी, वह ज्यादा दिन नहीं चल पाएगी।


 ऐसे में नेताजी समझते हैं कि यदि समाजवादी पार्टी की सरकार नहीं बने और  फिर मध्यावधि चुनाव की परिस्थितियां बन जाएं तो अखिलेश खुद को परिवार की राजनीति को शहीद बताते हुए फिर मौका पा सकते हैं। इस परिवार में यह संभव नहीं कि मुलायम को बिना बताए ही रामगोपाल यादव, शिवपाल को राज्य में पार्टी का मुखिया घोषित कर  दें। मुलायम अभी इतने  कमजोर नहीं हुए हैं और, बिना मुलायम, शिवपाल को भी कोई भविष्य नहीं है।

डॉ.मनीष तिवारी राजनीतिक विश्लेषक
मुकेश शर्मा Reporting
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