ठोस कचरा: समस्या या संसाधन

Jameel Khan

Publish: Jun, 14 2018 02:26:55 PM (IST)

विचार
ठोस कचरा: समस्या या संसाधन

आज 45 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी भारत की शहरी आबादी हर दिन करीब एक लाख मीट्रिक टन ठोस कचरा पैदा करती है।

आज 45 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी भारत की शहरी आबादी हर दिन करीब एक लाख मीट्रिक टन ठोस कचरा पैदा करती है। ठोस कचरे की यह मात्रा सालाना 80 लाख टन नाइट्रोजन, फॉस्फेट व पोटेशियम दे सकती है। आवश्यकता है इसके प्रथक्करण, एकत्रीकरण, निस्तारण एवं उपचार की पर्यावरण अनुकूल वैज्ञानिक विधियों को अपनाने व इच्छाशक्ति से लागू करने की। कुछ समय पूर्व पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा पूर्व नियमों में परिवर्तन कर छह नए ठोस कचरा प्रबंधन नियम लागू किए गए। यह सरकार की वर्तमान कचरा निस्तारण व्यवस्था में सुधार के प्रति सजग व सक्रिय रुचि को दिखाता है। नए नियम नगरीय निकाय क्षेत्रों से परे भी लागू होंगे। अनियमित नगरीय बसावट, जनगणना नगर, अनुसूचित औद्योगिक बस्तियां एवं रेलवे ही नहीं, विशेष आर्थिक क्षेत्रों, तीर्थस्थलों, धार्मिक व ऐतिहासिक महत्त्व के क्षेत्रों को भी इन नियमों के दायरे में लाया गया है।

हमारे देश में अपशिष्ट प्रबंधन का दायित्व स्थानीय नगरीय निकायों पर है। ऐसे में बड़ी मात्रा में अपशिष्ट निस्तारण की लागत प्राय: शहरी स्थानीय निकायों की आर्थिक क्षमताओं से अधिक होती है। इस समस्या पर ध्यान न दे पाने के कारण कमजोर संस्थागत क्षमता और कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति भी हैं। अधिकांश शहरों में ठोस अपशिष्ट निस्तारण सुविधाओं का अभाव है और अनियंत्रित डंपिंग/ अप्रभावी निस्तारण आम है।

स्वच्छ भारत अभियान के उद्देश्यों को तब ही प्राप्त किया जा सकता है, जब कचरे की मात्रा कम करने की कुछ आदतों को अपनाया जाए। जैसे कि पुन:प्रयोग, पुन:चक्रण, पृथक्करण की उचित तकनीक अपनाना व कम कचरा उत्पन्न करना आदि। शहरी कचरे में 50 से 60 प्रतिशत भाग कार्बनिक व जैविक कचरे का होता है, जिसे खाद में परिवर्तित कर इस समस्या को लगभग आधा किया जा सकता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में बहुत से राज्य जैविक खेती की ओर बढ़ रहे हैं। अत: इसके लिए बाजार में अच्छी संभावना है।

तिरुवनंतपुरम नगर निगम (टीएमसी) अपने नवाचार के लिए जाना जाता है। यह किसी नगरपालिका द्वारा 'ठोस कचरा निस्तारण' के लिए एक नया दृष्टिकोण अपनाने का सर्वोत्तम उदाहरण है। केन्द्रीकृत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की विफलता के बाद टीएमसी ने 'एंटे नगरम् सुंदर' नामक एक अभियान 2014 में शुरू किया, जिसका अर्थ है 'मेरा शहर सुंदर है।' जन जागरूकता अभियान के परिणामस्वरूप तिरुवनंतपुरम शहर के लोगों को जैव-अपघटन योग्य अपशिष्ट या रसोई अपशिष्ट को स्वयं उपचारित करने के लिए संवेदनशील बनाया गया।

वर्तमान में, निगम सीमाओं के भीतर जैव-अपघटन योग्य अपशिष्ट के संचयन के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। यह जनता को उनके द्वारा उत्पन्न कचरे की जिम्मेदारी स्वयं लेने के लिए प्रोत्साहित करता है। टीएमसी कई तरीके की अपशिष्ट निपटान और उपचार प्रणालियों की आपूर्ति भी करता है। परिवारों और संस्थाओं से प्लास्टिक और ई-अपशिष्ट को इकट्ठा करने और निस्तारण करने के लिए भी टीएमसी ने क्लीन केरल कंपनी के साथ समझौता किया।

केरल के ही अलाप्पुड़ा शहर में विकेंद्रित कचरा प्रबंधन का सफल प्रयोग किया गया है। अलाप्पुड़ा नगर परिषद ने सामान्य 'एकत्रण व संभरण' व्यवस्था अपनाने के स्थान पर अपशिष्ट प्रबंधन के लिए विकेंद्रित व्यवस्था पर बल दिया। इस सफल प्रयोग के लिए अलाप्पुड़ा नगर परिषद को कई राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। हाल ही में 'संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम' ने इसे विश्व के 'पांच स्वच्छतम शहरों में से एक' की मान्यता दी है।

तिरुअनंतपुरम व अलाप्पुड़ा द्वारा 'विकेंद्रित अपशिष्ट प्रबंधन' के सफल प्रयोग ने अन्य नगरपालिकाओं को भी ऐसी ही व्यवस्था अपनाने के लिए प्रेरित किया है। इस व्यवस्था को बल देने के लिए करीब एक हजार ग्राम पंचायतों में 'एरोबिक कचरादान' लगाए जाने की राज्य नीति विकसित की गई है।


ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 एवं प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 स्वागतयोग्य पहल है। लेकिन इनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए अधिक बल और स्पष्टता की आवश्यकता है। इन नियमों द्वारा 'अपशिष्ट एकत्रण व निस्तारण' का दायित्व उसे उत्पन्न करने वाले पर ही तय करना प्रायोगिक तौर पर अव्यावहारिक है, क्योंकि अधिकांश उत्पादक छोटे व अनौपचारिक क्षेत्रों से हैं।

इसी तरह 'द्वार से द्वार' अपशिष्ट एकत्रण व सूखे व गीले अपशिष्ट की छंटाई का पालन शायद ही किसी शहर में पूर्णत: किया गया हो। दायित्वों को पूरी तरह नगर पालिकाओं पर थोपने की अपेक्षा सभी हितधारकों के समन्वित प्रयास से ही एक मितव्ययी अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था का विकास हो सकता है। नियमों के सफल कार्यान्वयन के लिए यह भी बहुत आवश्यक है कि प्रयोग की शुरुआत से ही जन भागीदारी के साथ क्षेत्रवार सूचना अभियान चलाया जाए।

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