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कम हो कोयले पर निर्भरता, नीति का केंद्र बने ऊर्जा कुशलता

ऊर्जा क्षेत्र: कुशल थर्मल पावर प्लांट्स से उत्पादन और नवीकरणीय ऊर्जा पर देना होगा जोर

Published: May 09, 2022 08:13:32 pm

शालू अग्रवाल
सीनियर प्रोग्राम लीड, काउंसिल ऑन एनर्जी, इनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू)

एक के बाद एक कई राज्य बिजली संकट में फंसते जा रहे हैं। इससे बिजली उपभोक्ताओं को सामान्य से ज्यादा तापमान और लंबी बिजली कटौती की दोहरी मार से जूझना पड़ रहा है। मौजूदा बिजली संकट की पड़ताल करें तो इसके लिए तीन प्रमुख कारण जिम्मेदार दिखाई देते हैं।
पहला, तापमान में असामान्य बढ़ोतरी के कारण बिजली की मांग में उछाल आया है। अप्रेल में बिजली की अधिकतम मांग (पीक पावर डिमांड) 207 गीगावाट पहुंच गई, जो रेकॉर्ड है और बीते साल की तुलना में 13 फीसदी अधिक है।
दूसरा, पावर प्लांट्स के पास कोयले की किल्लत है। रूस-यूक्रेन टकराव ने कोयले की कीमतों को ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच दिया है। इससे आयातित कोयले पर निर्भर पावर प्लांट्स ने या तो बिजली का उत्पादन घटा दिया है या फिर बंद कर दिया है, जिससे घरेलू बाजार में बिजली की कमी और बढ़ गई है। इसके साथ, भारतीय रेलवे द्वारा रैक की कमी के कारण मांग के अनुरूप कोयले की आपूर्ति नहीं कर पाना भी इस कारण में शामिल एक पहलू रहा।
प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र
तीसरा, बिजली क्षेत्र में भुगतान को लेकर कमजोर अनुशासन को बारीकी से देखने की जरूरत है, जो लगातार समस्या बना हुआ है। बिजली उपभोक्ताओं पर बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) के दो लाख करोड़ रुपए बकाया हैं, तो डिस्कॉम्स पर बिजली उत्पादकों का बकाया एक लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा पार कर चुका है। नकदी की यह कमी बिजली की मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगडऩे यानी मांग बढऩे और आपूर्ति में दिक्कतें आने पर तत्काल अतिरिक्त बिजली खरीद करने की डिस्कॉम्स की क्षमता (भले ही दरें काफी ऊंची हों) को प्रभावित करता है।
हालांकि मौजूदा संकट से निपटने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं और ऊर्जा मंत्रालय ने सिर्फ पावर प्लांट्स के लिए आवंटित कोयला खदानों से खनन बढ़ाने, गैर-बिजली क्षेत्र के लिए कोयले की आपूर्ति रोकने और आयातित कोयले को मिश्रित करने के निर्देश दिए हैं। भारतीय रेलवे ने भी अतिरिक्त वैगन खरीदने के लिए टेंडर जारी किया है और कई यात्री ट्रेनों को रद्द भी किया है, ताकि कोयले की ढुलाई में तेजी लाई जा सके। लेकिन ये सभी उपाय अस्थायी हैं। दरअसल, बिजली आपूर्ति और मांग की अनिश्चितता से निपटने और समस्या के हल के लिए समग्रता से विचार करने और कोयले पर निर्भरता घटाने की जरूरत है। इसके लिए ये पांच उपाय कारगर हो सकते हैं।
पहला, कुशल थर्मल पावर प्लांट्स से बिजली उत्पादन को प्राथमिकता देनी चाहिए। मौजूदा संकट के मद्देनजर, कुछ लोग कोयला आधारित बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने की अपील कर रहे हैं। लेकिन यह मौजूदा समस्या का सटीक समाधान नहीं है। भारत के पास 200 गीगावाट कोयला आधारित बिजली उत्पादन क्षमता है, जिसकी कुल बिजली उत्पादन में हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत है। लेकिन इनमें से ज्यादातर बिजली पुराने, अकुशल पावर प्लांट्स से पैदा होती है, क्योंकि नए पावर प्लांट्स के सामने अनुकूल कोयला आपूर्ति अनुबंध या बिजली खरीद समझौते न होने जैसी समस्याएं हैं। इन्हें दूर करके भारत कोयले की इतनी ही मात्रा का इस्तेमाल करते हुए ज्यादा बिजली पैदा कर सकता है।
दूसरा, पावर ग्रिड में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाना जरूरी है। विकासशील देश होने के नाते, भारत में बिजली की मांग लगातार बढ़ेगी, और 2030 तक इसके दोगुना होने का अनुमान है। जलवायु संबंधी अपने लक्ष्यों को देखते हुए, भारत को हर हाल में बिजली की नई मांग नवीकरणीय ऊर्जा से पूरी करनी होगी। हमें नवीकरणीय ऊर्जा जैसे- सौर, पवन और छोटे हाइड्रो प्लांट्स को अपनाने और उन्हें ग्रिड से जोडऩे को प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास करने की जरूरत है।
तीसरा, डिस्कॉम्स को बिजली की मांग का पूर्वानुमान करने की अपनी क्षमता बढ़ानी होगी। आर्थिक विकास और जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में ऊर्जा की मांग भविष्य में और ज्यादा अनिश्चित होगी। इस मांग को किफायती तरीके से पूरा करने के लिए डिस्कॉम्स को मांग का मौसम आधारित पूर्वानुमान अपनाना होगा, ताकि बिजली खरीद के बारे में सटीक फैसले किए जा सकें। इससे सप्लाई चेन के दूसरे पक्षों को सकारात्मक संकेत जाएगा।
चौथा, ऊर्जा कुशलता को भारत की ऊर्जा नीति के केंद्र में लाना होगा। बिजली वितरण के दौरान नुकसान की ऊंची दर को देखते हुए, ज्यादा बिजली उत्पादन करने के बजाए हर एक यूनिट बिजली को बचाना ज्यादा विवेकपूर्ण है। इससे घर, उद्योग, डिस्कॉम्स और सरकारों, सभी के लिए बिजली और खर्च में बचत होगी। वित्तीय प्रोत्साहन, कम खर्चीले वित्तीय उपायों, समय के अनुरूप बिजली दरें और जन-जागरूकता अभियानों से देश में बिजली के कुशलतापूर्ण इस्तेमाल की आदत को अपनाने और बिजली की अधिकतम मांग के प्रबंधन में मदद मिल सकती है।
पांचवां, बिजली बिल का भुगतान करने की सामूहिक समझ बनाना और समय पर भुगतान करने का अनुशासन लाना। इसके लिए राज्यों को सब्सिडी और लंबित पड़े भुगतान का समय पर निपटारा करना चाहिए। उन्हें विद्युत नियामकों को यह सुनिश्चित करने के लिए सशक्त बनाना चाहिए कि डिस्कॉम्स नुकसान घटाएं, उपभोक्ताओं से बकाया वसूल करें और बिजली उत्पादकों को समय पर भुगतान करें। यह बिजली क्षेत्र में भुगतान से जुड़ा अनुशासन लाने और पूरी सप्लाई चेन में जरूरी निवेश सुनिश्चित करने की दिशा में काफी महत्त्वपूर्ण होगा।
जलवायु और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं में बढ़ोतरी हो रही है। इससे सामने आ रहे हालिया रुझान बिजली के उत्पादन, वितरण और उपभोग से जुड़े हमारे तौर-तरीके को ज्यादा कुशल बनाने की जरूरत रेखांकित करते हैं। भारत के बिजली क्षेत्र में दीर्घकालिक लचीलापन आए, इसके लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है।

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