स्पंदन : स्त्री-1

सह शिक्षा के वातावरण में न पौरुष का अंश दिखाई देगा, न ही स्त्रैण भाव। किसी पर भी एक-दूसरे का प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता। इससे ज्यादा नुकसान मानवता का और क्या हो सकता है। शरीर रह गया, मानव मर गया।

By: Gulab Kothari

Published: 19 Sep 2021, 08:51 AM IST

- गुलाब कोठारी

मैं ब्रह्म का अंश हूं। पुरुष हूं। माया से घिरा हूं। वही मेरे आवरण बना रही है, ताकि नंगा नहीं दिखाई पड़ूं। वही मेरा शरीर है, योनि है, रूप है। माया ही दिखाई देती है। ब्रह्म केन्द्र में है। अर्थात् मैं ही पुरुष भी हूं, शक्ति रूपा स्त्रैण भी हूं। मैं ही अग्नि भी हूं, सोम भी हूं। मैं आक्रामक भी हूं, समर्पण कर्ता, ग्रहण कर्ता भी हूं। मैं पोषक हूं, विस्तार करने का निमित्त भी हूं। मैं ही इच्छा हूं और मेरी इच्छा के बिना कोई ब्रह्म तक नहीं पहुंच सकता। मेरा यह संकल्प भी है कि मेरे रहते कोई ब्रह्मलीन नहीं हो सकता। ब्रह्म चूंकि पुरुष है, अत: उसमें दूसरा पुरुष लीन नहीं हो सकता। निश्चित ही उसे स्त्रैण होना पड़ेगा। इसीलिए शायद मेरा पुरुष भाव माया भाव से ढका है। वही मुझे मार्ग देगी अथवा उसी में से मुझे मार्ग बनाना है।

सृष्टि के हर पिण्ड के केन्द्र में ब्रह्म है और परिधि पर माया। प्रत्येक प्राणी, पेड़, पर्वत या कीट-पतंगे, सभी का एक ही सिद्धान्त है। इसीलिए दूसरों की तरह मैं भी अर्द्धनारीश्वर हूं। यह एक दूसरा सिद्धान्त है। इसमें दायां भाग पुरुष भाव का एवं बायां भाग स्त्रैण अथवा वामा अथवा सौम्या कहलाता है। हमारी सृष्टि युगल सृष्टि है। अग्नि-सोम के योग से ही आगे बढ़ती है। अत: सृष्टि में प्राणियों की नर और मादा संज्ञा है। हम नर-नारी या मानव -मानवी कहलाते हैं। मैं अपने स्वरूप में नर रूप का प्रतिनिधि हूं। यह चुनौती तो मेरे भी सामने है ही कि यदि मुझे ब्रह्म में लौटना है, तो उसके लिए पुरुष शरीर में भी स्त्रैण तो बनना ही पड़ेगा। अब समझ में आता है कि जीवन में इतने द्वन्द्व क्यों होते हैं। युगल सृष्टि ही द्वन्द्व का मूल है। विद्या-अविद्या भी द्वन्द्व है।

भीतर का पुरुष-स्त्री भाव भी द्वन्द्व का बड़ा आधार है। विषय का अपना द्वन्द्व तो है ही। जैसे-सुख-दु:ख, अच्छा-बुरा, हिंसा-दया आदि। ये सारे द्वन्द्व तो माया प्रदत्त ही हैं। पुरुष तो कर्ता है ही नहीं। हां, माया की सारी गतिविधियों का नियन्ता अवश्य है। इसका नाम है सर्वकृतत्व। उसके सभी कार्यों में चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया मुख्य भूमिकाएं हैं। जीव भाव में उसकी अभिन्न स्वातंत्र्य शक्ति ही उसकी आनंदघनता है। आनन्द का चमत्कार ही इच्छा शक्ति, प्रकाश रूपता ही चिद्शक्ति, विमर्शमयता ही ज्ञान शक्ति और प्रत्येक प्रकार आदि को अवभासित करने का सामथ्र्य ही क्रिया शक्ति है। अर्थात् जो कुछ माया प्रकट कर रही है, वह ब्रह्म के ही भाव हैं। व्यवहार में माया का रूप इच्छा-ज्ञान-क्रिया अथवा मन-प्राण-वाक् है। चूंकि ब्रह्म स्वतंत्र ज्ञाता और कर्ता है, अत: उसकी मुख्य शक्ति भी स्वातंत्र्य ही कहलाती है। उसी को चेतना, चिद्शक्ति, संवित, विमर्श आदि नामों से कहा जाता है। मूल में अहं-विमर्श को ही शक्ति का मूल स्वरूप कहते हैं। यही प्रसार-संकोच रूप स्पन्द कहा जाता है। मुझे अपने भीतर स्त्री भाव को इसी रूप में ढूंढऩा होगा।

स्त्री भाव का दूसरा रूप है सौम्या। सोम रूप भी, शीतल भी और इसके साथ-साथ अग्नि को सदा समर्पित भी। पुरुष के लिए तो समर्पण सहज नहीं, मजबूरी हो सकती है। आप किसी सात-आठ साल की बच्ची को देखें कि किस प्रकार अपने छोटे बहन-भाई का पालन करती है तथा मां के कार्यों में हाथ बंटाती है। इसी उम्र के बच्चे को देखें, ठीक विपरीत भाव में जी रहा होगा। छोटे बहन-भाइयों से छीना-झपटी, मार-पीट, घर से बाहर भटकना। इसमें स्त्रैण तो जरा भी नहीं। कहां झलकता है अद्र्धनारीश्वर? स्कूल-कॉलेज तक भी नहीं। अहंकार ही बढ़ता दिखाई पड़ता है। खाने की थाली, पहनने के कपड़ों से लेकर मित्रों का आना-जाना, खेलना और परिवार के प्रत्येक सदस्य से अपेक्षा भाव। खुद बदले में नहीं के बराबर या रौब मारकर चले जाना। लडक़ी के मन में इस तरह का अपेक्षा भाव शायद सम्पन्न एवं अति शिक्षित परिवारों में अधिक हो। यह कोई छोटा-सा उदाहरण मात्र नहीं है। दोनों में (लडक़े-लडक़ी में) नर-नारी के अंश होते हैं और एक शुद्ध नर तथा दूसरी शुद्ध नारी ही दिखाई देती है। इनका दूसरा अद्र्धांग कहां दबा रहता है? आज तो स्थिति एक कदम और आगे जाती जान पड़ती है। किसी विकसित देश की बच्ची को देखो। उतनी ही स्वच्छन्द जितना कि एक लडक़ा। सौम्यता का भाव शरीर से आगे दिखाई ही नहीं देता। इतना तो कुदरत के हर मादा प्राणी में भी होगा।

सह शिक्षा के वातावरण में न पौरुष का अंश दिखाई देगा, न ही स्त्रैण भाव। किसी पर भी एक-दूसरे का प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता। इससे ज्यादा नुकसान मानवता का और क्या हो सकता है। शरीर रह गया, मानव मर गया। शरीर से सौम्या दिखने वाली भीतर आग्नेय हो गई। समाज को जला देने वाली जैविक नारी जो पूरी तरह आत्मा से अनभिज्ञ है, केवल शरीर को शाश्वत मानकर इसी के लिए जी रही है। तब क्यों मुझे अहिल्या, मीरां, द्रौपदी, मन्दोदरी, सावित्री और शबरी जैसी गाथाएंं सुनाई गईं। जिन-जिन मूल्यों के आधार पर जीवन का उत्थान परिभाषित किया गया था, समाज ने क्यों निकाल दिया जीवन से? आज तो किसी को जीने और मरने में भेद ही दिखाई नहीं पड़ता। कैसे कोई पुरुषार्थ का मार्ग समझ पाएगा। मरते दम तक आज का आदमी गृहस्थाश्रम नहीं छोडऩा चाहता। इन सबका एक कारण यह भी है कि माया शक्ति के बजाए शिव बनने को बेचैन हो उठी।

कभी हम शक्ति के उपासक थे, आज उसके खून के प्यासे हो गए। जीवन की सारी कामनाओं की पूर्ति के आधार भग नाम की छह शक्ति-स्वरूप थे। धर्म, ज्ञान, वैराग्य, यश, श्री और ऐश्वर्य (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशीत्व और वशीत्व)। यही जन्म-स्थिति-मृत्यु का आधार भी है।

विवाह का संकल्प ही शक्ति का प्राकट्य है। वहीं से जीवन में क्षुधा का प्रवेश है। माया का यही इच्छा रूप प्रवेश है। क्षुधा एवं तृप्ति के मध्य का काल विद्या और अविद्या पर आश्रित रहता है। प्रारब्ध भी चलाता है। तृप्ति के साथ शक्ति भी बढ़ती है और तृष्णा भी। जीवन के हर भाव के साथ द्वन्द्व भी रहता है। माया ही कारण है। वही निवारण भी है। कलियुग के इस चरण में प्रलय की तैयारियां करनी हैं। यह भी माया का ही कार्य है। एक माया जो बाहर पत्नी रूप में कार्य करती है। दूसरी माया भीतर अद्र्धनारीश्वर का अंग है। बाहर और भीतर की नारी में आम तौर पर सामंजस्य रहता है। अत: दोनों मिलकर पुरुष को दाम्पत्य रति-श्रद्धा, वात्सल्य, स्नेह तथा प्रेम में निष्णात कर देती हैं। इसी के सहारे देवरति में प्रवेश संभव होता है।

आज चूंकि बाहर की स्त्री का भी अहंकार तथा उसके भीतर का पौरुष भाग अधिक विकसित हो रहा है, अत: सृष्टि में पौरुष भाव बढ़ रहा है। भले ही कन्याओं का औसत भी बढ़ रहा है भीतर का पौरुष भाव ही बाहर के स्त्रैण को दबाता जाएगा। तब गुलाब के साथ एक नारी शरीर जी रहा होगा, जिसके पास भोग की कामना होगी, किन्तु माधुर्य नहीं होगा। भाव नहीं होंगे। दाम्पत्य रति में प्रवेश वर्जित हो जाएगा। भक्ति मार्ग पर ताले लग जाएंगे। होगा तो बस तर्क होगा, जिरह और कलह होगा। एक दूसरे का अपमान करके अहंकार की तुष्टि होगी। सम्बंधों का आधार बुद्धि ही होगी। अत: सतही रूप से आगे कभी जा नहीं पाएंगे। यही कारण है कि ऐसी पुरुषत्व पर आधारित नारी को संस्कार देने का दायित्व सौंपा भी नहीं जा सकता। स्वच्छन्दता के स्वभाव के कारण समर्पण, अनुशासन, प्रतीक्षा, श्रद्धा जैसे शब्द भी परिवार में स्थान नहीं पा सकेंगे। गुलाब के बच्चों को संस्कृति एवं सभ्यता का आधार नहीं मिल सकेगा। तब केन्द्र के प्रति चेतना तो कभी जाग्रत होगी ही नहीं। नित्य परिवर्तन के कारण परिधि अथवा बाहरी बदलाव ही भोग का कारण रह जाएगा।

आहार, निद्रा, भय, मैथुन का माया जाल व्यक्ति को चेतना की ओर जाने ही नहीं देगा। मानव का विद्या से सम्पर्क, धर्म और मोक्ष की अवधारणा से परिचय भी नहीं होगा। जिस माया के सहारे आवरण हटाकर आत्म साक्षात् किया जा सकता है, वही अज्ञानवश पाश बनकर पुनर्जन्म को प्रेरित करती रहेगी। पुरुष अपने भीतर के स्त्री भाव को कभी समझ नहीं पाएगा। उसका विकास नहीं होगा। पुरुष आकर्षित कैसे होगा?

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