कर्ज का पैसा खर्च करना भी विभागीय प्रबंधन

आम बजट में प्रभावी सुधार... सतर्कता जरूरी कहीं यह न हो कि कर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों विकास हुआ

By: सुनील शर्मा

Published: 17 Feb 2021, 08:41 AM IST

- प्रदीप मेहता, आर्थिक, वाणिज्यिक, उपभोक्ता और पर्यावरणीय मामलों के जानकार, अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘कट्स’ के महासचिव

आम बजट 2021-22 में प्रस्तुत किए गए कड़े सुधारों की सराहना की जा रही है, जिसे उचित ही कहा जाएगा। सरकार ने जिस तरह महज राजकोषीय नीतियों के पथ से आगे बढऩे की आवश्यकता जताई और इसमें पारदर्शिता अपनाई है, वह प्रभावी है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि संसाधनों को दक्षता के साथ खर्च करना भी उतना ही जरूरी है, जितना अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत जताना।

ऋणों पर ब्याज का भुगतान, भारत के संचित निधि कोष (सीएफआइ) से किए जाने वाले भुगतानों में शामिल है। राजकोषीय वर्ष 2022 के लिए यह राशि अनुमानत: 8.40 ट्रिलियन रुपए रहने का अनुमान है। यह राज्यों को दी जाने वाली सहायता राशि (5.57 ट्रिलियन रुपए), कृषि एवं सहायक गतिविधियों (3.82 ट्रिलियन रुपए), परिवहन (2.29 ट्रिलियन रुपए), रक्षा (2.21 ट्रिलियन रुपए), सामाजिक सेवाएं (1.96 ट्रिलियन रुपए) और ग्रामीण विकास (0.76 ट्रिलियन रुपए) के भुगतान के लिए निर्धारित बजट से ज्यादा है। दरअसल, ऋण पर ब्याज भुगतान की राशि में साल दर साल इजाफा हुआ है। अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में यह 0.78 ट्रिलियन रुपए और बढक़र अगले वर्ष में 1.14 ट्रिलियन रुपए तक पहुंच जाएगी। हालांकि सीएफआइ के राजस्व खाते से अन्य उपयोगी खर्चे या तो कम कर दिए गए या फिर उन पर बजट में निर्धारित राशि से कम खर्च किया जा रहा है। जैसे, खाद्य भंडारण एवं गोदामों में संग्रहण पर खर्च में आई कमी के चलते कृषि और उससे जुड़ी सेवाओं के बजट आवंटन में 2.01 ट्रिलियन रुपए की कटौती (इस वर्ष के संशोधित अनुमानों से तुलना के आधार पर) की गई। ग्रामीण रोजगार के लिए बजट आवंटन में भी पिछले वर्ष की तुलना में 0.39 ट्रिलियन की कटौती की गई है। चालू वर्ष में परिवहन (मुख्य रूप से रेलवे) पर बजटीय खर्च 2.38 ट्रिलियन रखा गया लेकिन वास्तविक खर्च संशोधित अनुमानों के आधार पर केवल 1.59 ट्रिलियन रुपए ही होता है। सीएफआइ के पूंजी खाते से भुगतान के मामले में चालू राजकोषीय वर्ष में भारतीय रेल पर 0.70 ट्रिलियन रुपए का बजट आवंटित किया गया था, जबकि वास्तविक खर्च केवल 0.29 ट्रिलियन रुपए है। पुलिस सुधारों के लिए 92.68 बिलियन रुपए का बजट तय किया गया था लेकिन चालू वित्त वर्ष के संशोधित अनुमान के आधार पर यह राशि कम करके 49.26 बिलियन रुपए कर दी गई। इसी प्रकार शहरी विकास के लिए शुरू में 34.16 बिलियन रुपए आवंटित किए गए थे, जो अब चालू वर्ष के लिए घटा कर 17.21 बिलियन रुपए कर दिए गए हैं।

कुल मिलाकर इन सभी क्षेत्रों में अगले वर्ष का बजटीय खर्च चालू एवं गत वर्ष के बजटीय आवंटन के करीब-करीब बराबर है। हालांकि यह संदेह भी उठते हैं कि ऐसे फंड जो मुख्यत: कर्ज लेकर जमा किए जाते हैं, उनका वास्तव में सार्थक उपयोग होगा अथवा नहीं। बढ़ते कर्ज के बावजूद नियोजित रूप से खर्च प्रबंधन की अक्षमता अच्छा संकेत नहीं है। वर्ष 2020-21 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में कर्ज के बल पर हो रहा विकास लंबे समय तक कर्ज जारी रहने का सबब बन सकता है। इस पर यह विकास दर यदि कर्ज पर ब्याज दर से अधिक रही तो कर्ज की अवधि बढ़ती जाएगी। इस प्रकार यह एक तरह से कर्जपोषित सार्वजनिक व्यय का मामला बनता है, खास तौर पर आर्थिकमंदी के दौरान। जैसा कि जाहिर है, सार्वजनिक व्यय के परिप्रेक्ष्य में ये हालात चिंताजनक हैं।

इस बीच समय के साथ कर्ज पर ब्याज भुगतान की राशि का सूचकांक निरंतर बढ़ता जा रहा है। हाल ही संसद में पेश १५वें वित्त आयोग की रिपोर्ट में भी कहा गया कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि जिन अतिरिक्त खर्चों की आवश्यकता जताई जा रही है, वे अर्थव्यवस्था और समाज को सुदृढ़ करने के लिए समुचित रूप से निवेश किए जाएं। सरकार ने तुरंत ये सिफारिशें नहीं मानीं, लेकिन केंद्र प्रायोजित अथवा केंद्र की योजनाओं के क्रियान्वयन के दौरान राज्य सरकारों के असंगठित संसाधनों और केंद्र सरकार की वित्तीय प्रतिबद्धताओं के मद्देनजर इन पर विचार करने का आश्वासन अवश्य दिया है। काश! कुछ बेहतर उपाय किया जाता। 14 दिवसीय कोषीय बिल और बाजार ऋण से मिलने वाला पैसा ही सीएफआइ के पूंजी खाते की मुख्य प्राप्तियां हैं। सरकार को उम्मीद है कि वह आगामी राजकोषीय वर्ष में बाजार ऋण के जरिए 12.06 ट्रिलियन रुपए जमा कर लेगी।

वित्त आयोग ने विभिन्न स्रोतों से वित्त बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कर-जीडीपी अनुपात को सुधारने के महत्व पर बल दिया है। यह समकक्ष देशों के मुकाबले कम है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कर्ज लेने की हमारी क्षमता, कर प्रशासन की कमजोरी का फायदा उठाती नजर नहीं आनी चाहिए। इस संदर्भ में ऐसी एक स्वतंत्र वित्तीय परिषद के गठन की सिफारिश की जाती है जो वित्तीय भविष्यवाणियां करे, वित्तीय प्रदर्शन का आकलन करे, राजकोषीय लक्ष्य तय करे और उसकी प्राप्ति पर निगरानी रखे। साथ ही स्वतंत्र सार्वजनिक ऋण प्रबंधन इकाइयां गठित की जाएं।

(सह-लेखक: ‘कट्स’ के अमोल कुलकर्णी और अपूर्व लालवानी)

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