आपका हक : भुखमरी और सरकार का दायित्व

- दुनिया भले ही चांद पर पहुंच चुकी है लेकिन पृथ्वी पर इंसानों का एक बड़ा वर्ग आज भी भूख से त्रस्त है।
- 'वैश्विक भुखमरी सूचकांक' के अनुसार विश्व के 107 देशों में से भारत 27.2 के स्कोर के साथ 94वें स्थान पर है।

By: विकास गुप्ता

Published: 17 Feb 2021, 03:37 PM IST

विभूति भूषण शर्मा

रोटी, कपड़ा और मकान किसी भी इंसान या परिवार की मूलभूत आवश्यकता है। दुनिया भले ही चांद पर पहुंच चुकी है लेकिन पृथ्वी पर इंसानों का एक बड़ा वर्ग आज भी भूख से त्रस्त है। 'वैश्विक भुखमरी सूचकांक' के अनुसार विश्व के 107 देशों में से भारत 27.2 के स्कोर के साथ 94वें स्थान पर है। कुल 107 देशों के आकलन में केवल 13 देश भारत से तुलनात्मक रूप से बदतर स्थिति में हैं, जिनमें रवांडा 97वें, नाइजीरिया 98वें, अफगानिस्तान 99वें, लाइबेरिया 102वें, मोजाम्बिक 103वें, चाड 107वें स्थान पर हैं। पड़ोसी देश श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार और पाकिस्तान बेहतर स्थिति में हैं।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार खाद्य सुरक्षा का अर्थ है कि 'सभी व्यक्तियों की हर समय पर्याप्त, सुरक्षित और पोषक आहार तक भौतिक, सामाजिक और आर्थिक पहुंच हो और जो उनके सक्रिय तथा स्वस्थ जीवन के लिए उनकी आहार आवश्यकताओं तथा भोजन वरीयताओं को भी संतुष्ट करें।' इस परिभाषा के अनुसार खाद्य सुरक्षा में स्वाभाविक रूप से पोषण सुरक्षा का भी समावेश है। जहां भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन जीने का अधिकार देता है वहीं अनुच्छेद 47 के अनुसार 'राज्य, अपने लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कत्र्तव्यों में मानेगा और राज्य, विशिष्टतया, मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक औषधियों के, औषधीय प्रयोजनों से भिन्न, उपभोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करेगा।'

2001 में भारत के उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की जनहित याचिका में भोजन के अधिकार को स्वीकार किया और नीति विकल्पों को लागू करने योग्य अधिकारों में परिवर्तित किया। 2011 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक लाया गया जिसे लोकप्रिय रूप से 'भोजन का अधिकार विधेयक' के रूप में जाना गया। 2013 में 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम-2013' संसद द्वारा पारित किया गया। यह अधिनियम शहरी आबादी के 50% और ग्रामीण आबादी के 75% तक सब्सिडी वाले भोजन की गारंटी देता है। इस कानून के तहत गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के समान 'प्राथमिकता वाले घरों' को बहुत कम कीमत पर चावल, गेहूं और मोटे अनाज 'सार्वजनिक वितरण प्रणाली से वितरित किए जाते हैं। भारत, भोजन के अधिकार की न्यायसंगतता के संदर्भ में दुनिया में एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करता है, पर क्रियान्वयन को लेकर कई दिक्कतें हैं।

भारत का संविधान सभी तरह के भेदभावों को रोकता है और सभी मानव अधिकारों को मान्यता देता है। संविधान में जीवन जीने के अधिकार को सीधे न्यायसंगत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है, वहीं भोजन के अधिकार को राज्य की नीति के एक निर्देशक सिद्धांत अनुच्छेद 47 के रूप में परिभाषित किया गया है। इन प्रावधानों की व्याख्या स्वरूप ही भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पाया है कि सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि वह भुखमरी से लडऩे के लिए आवश्यक कदम उठाए।
(लेखक राजस्थान सरकार मेंअतिरिक्त महाधिवक्ता हैं)

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विकास गुप्ता
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