राज्य, नागरिक और बढ़ता अविश्वास

राज्य और नागरिक के बीच अविश्वास इतना गहरा गया है कि मजदूर अपनी जान की परवाह किये बगैर अपने घर लौट जाना चाहते हैं। लेकिन सवाल यह भी कि इतना अविश्वास क्यों? क्योंकि राज्य ने नागरिकों के साथ सामाजिक समझौते का घोर उल्लंघन किया है।

By: Prashant Jha

Updated: 21 May 2020, 05:59 PM IST

संजय लोढ़ा - साथ में राजनीतिशास्त्र की शोधार्थी हर्षा वर्मा

राज्य और शासन से जुड़े कुछ अहम सवालों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि राज्य र अस्तित्व में कैसे आया? दार्शनिक रूप से एक ज़रूरी जवाब यह है कि लोगों ने मिलकर, आपसी समझौते से ‘राज्य’ बनाया। इन लोगों ने राज्य क्यों बनाया, इसकी भी खास वजह थी। लोगों ने अपने प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य बनाया। उन्होंने राज्य को इस शर्त पर अपने अधिकार और शक्तियाँ सौंपी कि बदले में राज्य उनके जीवन, संपत्ति, गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करेगा। भले ही प्रसिद्ध दार्शनिकों जॉन लॉक और रूसो ने अपने-अपने तरीके से इस समझौते को समझाया हो लेकिन उनमें एक ज़रुरी बात सामान्य थी। वह यह कि ‘लोग’ और यदि आज की शब्दावली में कहें तो ‘नागरिक’ संप्रभु हैं और उनके अधिकार, राज्य के अस्तित्व से पहले हैं।

यहाँ तक की सब बातें ठीक लगती हैं लेकिन क्या हो यदि राज्य अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने लगे और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा न कर पाये? क्या हो यदि वह नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असक्षम साबित हो? क्या हो यदि राज्य के द्वारा बिना सोचे-समझे लिए गए निर्णय नागरिकों के लिए अभिशाप बन जायें?

असल में यही हुआ भी। जनवरी के महीने में हमारा पडोसी देश चीन आधिकारिक तौर पर कोविड को महामारी घोषित कर चुका था। हम उस जनवरी नहीं जागे, फिर हम फरवरी में भी नहीं जागे। जब हम जागे तो 24 मार्च के दिन हमने 4 घंटे के अत्यंत अल्पकालिक नोटिस पर भारत जैसे बड़े देश का पहिया जाम कर दिया। जो जहाँ था, वहीं थम गया। कल-कारखानों पर ताला लगा दिया गया। खेल, दुकान, व्यापार, निर्माण-कार्य सब बंद।

विपदा के समय लोगों को सबसे पहले अपना घर-परिवार ही याद आता है। करोड़ों की संख्या में प्रवासी श्रमिक, विद्यार्थी आदि अपने घर लौटना चाहते थे। लेकिन आने-जाने का कोई साधन उपलब्ध नहीं। फंस गए वे, जो मजदूर, गरीब और लाचार थे। जब कुछ नहीं सूझा तो लाखों की संख्या में ये नागरिक देश के विभिन्न कोनों से सड़कों, रेल की पटरियों और नहरी रास्तों के सहारे अपने मूल स्थान लौटने लगे।

ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस इंडेक्स में ‘इंडिया' की सुधरती रैंकिंग के बीच ‘भारत’ भूखे-प्यासे, नंगे पैर अपने गाँव-घरों में लौटने लगा। सरकार ने माफ़ी मांगकर समझाया भी कि ‘इंडिया’ ही ‘भारत’ है लेकिन ‘भारत’ को समझ आ गया कि वह तो ‘ इंडिया’ है ही नहीं, और तो और यह सरकार भी उसके लिए नहीं है। मानें या न मानें लेकिन औरंगाबाद रेल हादसे के 16 मजदूरों को आखिरी क्षण तक सरकार पर विश्वास नहीं था। महाराष्ट्र से मध्यप्रदेश अपने गांव जाने वाली गर्भवती महिला को भी बीच रास्ते बच्चा जनने तक सरकार पर विश्वास नहीं था।

राज्य और नागरिक के बीच यह अविश्वास इतना गहरा है कि मजदूर अपनी जान की परवाह किये बगैर अपने घर लौट जाना चाहते हैं। लेकिन इतना अविश्वास क्यों? क्योंकि राज्य ने नागरिकों के साथ किये सामाजिक समझौते का घोर उल्लंघन किया है।

एक कहावत है, “जस्टिस डिलेड इज़ जस्टिस डिनाइड" अर्थात न्याय का महत्व तभी है, जब वह समय से मिल जाये। सरकार ने मजदूरों, किसानों के हितों में अनेक कदम गिनाए हैं, लेकिन आज की ज़रूरतों के अनुसार ये न केवल अपर्याप्त हैं अपितु दृष्टिहीन भी नज़र आते हैं| जले का घाव अभी भरना भी शुरू नहीं हुआ कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात जैसे राज्यों की सरकारों ने अपने यहाँ श्रम कानूनों का स्थगन शुरू कर दिया। इन श्रम कानूनों में बरती जा रही ढिलाई अन्ततः मजदूरों के हितों पर ही चोट करने वाली है। काम के निश्चित घंटे, हवा, पानी, शौचालय, स्वच्छता, फर्स्ट-ऐड बॉक्स , सुरक्षा के साधन, आराम के घंटे जैसे अधिकार हमारे जीवन के मूल अधिकार से जुड़े हैं। और ये इसलिए छीने जा रहे हैं कि देश में विदेशी पूंजी का निवेश हो सके। सरकार यह भी तय नहीं कर पा रही है कि ‘आत्मनिर्भरता’ और ‘लोकल’ को बढ़ावा देना है कि विदेशी निवेश को। फिर कैसे मजबूर न हों मजदूर अपने गाँव, अपने घर जाने के लिए|

जिन किसानों के कठोर श्रम के कारण आज देश कम से कम खाद्यान्न के क्षेत्र में वास्तव में ‘आत्मनिर्भर’ हो गया है, सरकार उनके लिए भी कुछ विशेष नहीं कर पा रही है। समाज-विश्लेषक योगेंद्र यादव के शब्दों में किसानों की मूल मांगें लॉकडाउन के कारण हुई फसल के नुकसान का मुआवजा, मुनाफा नहीं तो कम से कम न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसल की खरीद, किसान क्रेडिट कार्ड के कर्ज़ पर ब्याज की छूट, बीजों पर सब्सिडी को लेकर थीं। उपाय लाने के बजाय, पुरानी बजट योजनाओं को ही नए कलेवर में पेश करने की कोशिश की।

आज ज़रूरत इस बात की है कि केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों को सशक्त करने की दिशा में कार्य करते हुए अभिभावक की भूमिका निभाये। केंद्र द्वारा शक्तियों का केन्द्रीकरण करने की इस प्रवृति की रघुराम राजन और अभिजीत बैनर्जी ने भी चिंता जाहिर की। पंजाब, केरल और राजस्थान जैसे राज्यों की सरकारों द्वारा कमजोर होती वित्तीय स्थिति के बीच कुछ उद्योगों को खोलने, ऋण-सीमा को बढ़ाने की मांगें फिर क्यों जायज़ नहीं हैं?

सुदामा पांडे ‘धूमिल' लिखते हैं, “लोहे का स्वाद, लोहार से मत पूछो। उस घोड़े से पूछो, जिसके मुँह में लगाम है"। हमारे समाज का वंचित वर्ग, हमारे साथी नागरिक इन विषमताओं और त्रासदियों से बच सकते थे, यदि राज्य ने जॉन रॉल्स की नज़र से समाज में ‘फेयर जस्टिस' देने की कोशिश की होती। यदि हमने ‘अज्ञान के पर्दे’ के पीछे रहकर उनकी जगह स्वयं को रखकर सोचा होता तो हमारी नीतियां अलग होती।

(लेखक मोहनलाल सुखाड़िया विवि उदयपुर में प्रोफ़ेसर)

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