बचो फेक न्यूज से

बचो फेक न्यूज से

Shri Gulab Kothari | Updated: 06 Dec 2018, 12:53:12 PM (IST) विचार

दो हिन्दी भाषी प्रदेशों के विधानसभा चुनाव हो चुके। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में परिवर्तन की हवा चले तो आश्चर्य की बात नहीं होगी क्योंकि दोनों ही प्रदेशों की सरकारें 15-15 वर्ष पूरे कर चुकी हैं।

गुलाब कोठारी

दो हिन्दी भाषी प्रदेशों के विधानसभा चुनाव हो चुके। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में परिवर्तन की हवा चले तो आश्चर्य की बात नहीं होगी क्योंकि दोनों ही प्रदेशों की सरकारें 15-15 वर्ष पूरे कर चुकी हैं। राजस्थान में तो अभी एक कार्यकाल ही पूरा हुआ है। फिर भी चर्चा उठ रही है? फैसला तो मतदाता ही करेगा। चुनाव आयोग ने जनमत संग्रह पर भी रोक लगा रखी है। मैदान में या तो सोशल मीडिया है या फिर पेड-न्यूज की बाढ़ आई हुई है। फेक-न्यूज चलाने वालों को सोशल मीडिया पर गर्व हो रहा है। इस देश में चुनाव की गंभीरता का स्थान मनोरंजन ने ले लिया है। देश का भविष्य खिलवाड़ का विषय बनकर रह गया है। छींटाकशी करके सब हाथ झाड़ लेना चाहते हैं।

दोनों प्रदेशों के चुनाव पूर्ण हो जाने का एक लाभ राजस्थान को यह हुआ कि लगभग सारा इलेक्ट्रानिक मीडिया राजस्थान में फैल गया। इससे एक ओर जहां पर्यटन केन्द्रों की चर्चा बढ़ी, वहीं दूसरी ओर पानी, कृषि, महिला विकास जैसे विषयों की हकीकत भी देशभर में पहुंची। मीडिया पर लोग भरोसा करते हैं। उससे आशा करते हैं कि वह किसी 'पक्ष' से नहीं जुड़ेगा और निष्पक्षता से हकीकत को उजागर करेगा। किन्तु पिछले कुछ वर्षों से मीडिया का एक और स्वरूप तेजी से उभरा है-'पक्षकार' मीडिया का। इस तरह का मीडिया किसी न किसी राजनीतिक दल का पक्ष लेता है और उसके पक्ष में समाचार देता है। दिखावा निष्पक्षता का करता है, पर लोग जल्दी ही असलियत समझ जाते हैं। इनको कोई गंभीर नहीं मानता। सिर्फ मनोरंजन के रूप में लेते हैं। पर ऐसे पक्षकार मीडिया सम्पूर्ण मीडिया जगत की गरिमा जरूर घटा देते हैं।

ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण रोज हमारे सामने आते हैं। नामी क्रिकेटर और पंजाब सरकार में मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू पिछले दिनों अलवर गए। अपनी एक चुनावी सभा में। किसी ने नारा लगाया, पाकिस्तान मुर्दाबाद का। लेकिन एक चैनल पर वह चला पाकिस्तान जिंदाबाद का। मुद्दा बनना था, बना। सबने सिद्धु को निशाने पर लिया। लेकिन जब सिद्धू ने असलियत बताई, मानहानि के मुकदमे की धमकी दी, तब सुधार किया गया। इसी तरह की एक खबर सट्टा बाजार के सर्वे की आई। पूरी तरह मनगढ़ंत थी। लेकिन बड़ी सफाई से उस पर लोगो बीबीसी का लगा दिया।

सामान्य आदमी के लिए सर्वे पर भरोसा करना आसान हो गया। जब तक असलियत सामने आई, खबर हजारों आंखों से निकल गई। दोनों मामलों में सच सामने आया तो मीडिया-सोशल मीडिया की खूब थू-थू हुई। साख का खूब नुकसान हो गया।

चुनाव प्रचार में फेक-न्यूज के ऐसे मामलों ने मीडिया की गरिमा घटाई है। उच्च पदों के लिए अनर्गल भाषा का प्रयोग पहले किसी चुनाव में ऐसा नहीं देखा जाता था। आज नेताओं से ज्यादा सोशल मीडिया की आलोचना हो रही है। कितना कूड़ा इधर से उधर फेंका जा रहा है, मानो देश में सकारात्मक संवाद बचा ही नहीं। न हम देशवासियों को शिक्षित करना चाहते हैं, न ही अपना सही परिचय देना चाहते हैं। धन के बदले नागरिकों को भ्रामक सूचनाएं देना मीडिया को देशभक्त तो नहीं बना सकता। तब स्थिति ऐसी बनकर उभरी कि भ्रामक समाचार कोई तैयार करवा रहा है, परोसने का कार्य मीडिया कर रहा है। यह व्यापार खूब फल-फूल रहा है। भले ही यह लोकतंत्र के लिए कितना भी घातक है।

राजस्थान के चुनावों को सट्टा बाजार ने भी एक पक्षीय बना रखा है। पिछले लगभग एक माह से सट्टा-बाजार कांग्रेस की एक तरफा जीत के आंकड़े प्रसारित कर रहा है। देश का सारा मीडिया इसके आगे फेल है। सट्टा-बाजार ने सारा गुड़-गोबर कर रखा है। इस पर लोगों का करोड़ों रुपयों का दावं लगा हुआ है और इसकी सूचना पर शंका नहीं होती। न इस पर किसी प्रकार का नियंत्रण संभव है, न ही इसे चुनाव आयोग अथवा कानून ही रोक पाया है। इसको गलत साबित करने के लिए कई मीडिया-सीरीज चलाई जा चुकी हैं। युवा भ्रमित नहीं हुआ।

लेकिन मीडिया की साख अवश्य सिमटकर रह गई। सट्टा-बाजार किसी एक स्थान पर केन्द्रित नहीं होता, जैसा कि शेयर बाजार है। देश के हर बड़े शहर में इसके भाव उपलब्ध रहते हैं। भाव भी लगभग एक जैसे ही होते हैं। तभी तो आप देश में कहीं से भी दांव लगा सकते हैं।

कभी-कभी तो पक्षकार मीडिया में फेक न्यूज इतनी जोर-शोर से प्रकाशित करवाई जाती हैं कि वे निष्पक्ष मीडिया के सच को ढक लेती हैं। सौ झूठ के बीच एक सच भी झूठा पड़ जाता है। भले ही बाद में परिणाम उसे सच सिद्ध कर दें। चुनाव में मीडिया की भूमिका इतनी बढ़ गई है कि यदि मीडिया अपना थोड़ा सा स्वार्थ छोड़ दे, तो देश विकास में छलांगें लगाने लगेगा। अगली पीढ़ी के मीडिया कर्मी को सम्मान मिलेगा। आज मीडिया संचालक का जनता से कोई नाता नहीं है। वह सिमटकर सरकारों में शामिल रहना चाहता है। जिस दिन जनता उससे नाता तोड़ लेगी, उसका अस्तित्त्व ही खो जाएगा।

 

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