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Patrika Opinion : बंद हो सरकारी खजाने के दम पर वोट का दांव

- सरकारी खजाने में रोकड़ा भले न हो लेकिन लोकलुभावन वादे कर जनता के वोटों की फसल काटने के सपने हमारे राजनेता खुली आंखों से देखते हैं।

नई दिल्ली

Published: November 02, 2021 09:45:52 am

चुनाव में मतदाताओं को लुभाना कोई भारत के नेताओं से सीखे। सरकारी खजाने में रोकड़ा भले न हो लेकिन लोकलुभावन वादे कर जनता के वोटों की फसल काटने के सपने हमारे राजनेता खुली आंखों से देखते हैं। अगले साल की शुरुआत में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की घोषणा होने वाली है। लिहाजा हर राजनीतिक दल अपने हिसाब से वादों का पिटारा खोल रहा है। इन राज्यों में जो पार्टी सत्ता में है वह घोषणाएं करके दांव चल रही है तो विपक्ष में बैठे राजनीतिक दल सत्ता में आने पर मतदाताओं के लिए बड़े-बड़े ऐलान करने में जुट गए हैं। पंजाब सरकार ने सोमवार को सौ यूनिट तक बिजली तीन रुपए सस्ती करने का ऐलान कर डाला। पंजाब सरकार ने दावा किया कि यह दर देश में सबसे कम है।

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पंजाब के साथ उत्तरप्रदेश में भी चुनाव होने हैं। वहां की सरकार भी इस महीने से युवाओं को स्मार्टफोन और टैबलेट बांटने जा रही है। पंजाब और उत्तरप्रदेश की सरकारें साढ़े चार साल से सत्ता में हैं, पर इस दौरान उन्हें जनता की याद नहीं आई। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी सोमवार को सियासी दांव खेलते हुए ऐलान किया कि उनकी पार्टी गोवा में सत्ता में आई तो लोगों को धार्मिक यात्रा तथा बिजली मुफ्त में उपलब्ध कराएगी।

लोकतंत्र में चुनी हुई सरकारें जनता का ध्यान रखें, यह अच्छी बात है। लेकिन चुनाव के समय इस तरह की घोषणाओं और वादों को क्या प्रलोभन नहीं माना जाए। मतदाताओं के समक्ष लोकलुभावन वादे पहले भी होते थे लेकिन आज की तरह नहीं। साढ़े चार साल आपसी झगड़ों में उलझी रहने वाली सरकारों को लगता है कि मुफ्त के ऐलान से उनकी झोली वोटों से भर जाएगी। चुनाव के समय ऐसे वादे जनता के साथ किसी छलावे से कम नहीं माने जा सकते।

देश के अधिकांश राज्यों में बिजली बोर्ड आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं लेकिन राजनीतिक दलों का ध्यान इस तरफ जाता ही नहीं। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों की मदद के लिए भी एक नीति होनी चाहिए। सरकारी खजाने का लाभ किसे मिले और किसे नहीं, इसके कुछ नियम होने चाहिए। चुनाव आयोग को भी ऐसी घोषणाओं पर संज्ञान लेना चाहिए। आखिरी के छह महीने में सरकारों का यों खजाना लुटाना अच्छा कदम नहीं माना जा सकता। पिछले डेढ़ साल में कोरोना महामारी ने सरकारों की आर्थिक सेहत पर बुरा असर डाला है। सरकारों पर कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। विकास कार्यों की गति धीमी हो गई है। लोकतंत्र में चुनावी जीत काम के आधार पर होनी चाहिए। जनता के पैसों को राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करने से बचा जाना चाहिए।

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