द वाशिंगटन पोस्ट से... वायरस से छेड़छाड़ व महामारी का जोखिम लेना बंद हो

नीति नवाचार: खतरनाक वायरसों की खोज, महामारी के शस्त्रागार का ब्लूप्रिंट साझा करने जैसा है।
प्राकृतिक महामारियां अपरिहार्य हो सकती हैं, लेकिन ऐसी सिंथेटिक महामारियां नहीं जिनसे समाज के लिए पैदा होने वाले जोखिमों की पूरी जानकारी हो। हमें महामारियां पैदा करना नहीं सीखना चाहिए।

By: Patrika Desk

Updated: 08 Oct 2021, 08:40 AM IST

केविन एम. एसवेल्ट, (सीआरआइएसपीआर आधारित जीन ड्राइव तकनीक के अन्वेषक)

पिछले बीस सालों से करदाताओं के पैसे से वित्तपोषित अनुसंधान कार्यक्रम महामारी जनक वायरस पहचानने और बनाने का जरिया बन गए हैं, वह भी बेहद कम पारदर्शिता के साथ। इसका नवीनतम साक्ष्य मिला 21 सितंबर को, जब ऑनलाइन जासूसों के एक समूह ने कथित तौर पर लीक दस्तावेज जारी कर दिए, जिनसे 2018 के एक बड़े प्रस्ताव का खुलासा हुआ है। हालांकि इस प्रस्ताव को फंड नहीं मिला। इसके लिए 1.42 करोड़ डॉलर मांगे गए थे और मकसद था - अत्यधिक संक्रामक सार्स-जैसे कोरोनावायरसों को खोजना और जोड़-तोड़ कर ऐसे नए वायरस तैयार करना।

इस खुलासे में सबसे ज्यादा ध्यान यह बात खींचती है कि प्रस्ताव में चीन की वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी लैब के आरंभिक आंकड़ों का जिक्र है, जिस लैब का कोविड-19 महामारी का संभावित स्रोत होना जांच के दायरे में है। जो पर्याप्त रूप से पूछा नहीं गया वह सबसे बड़ा सवाल है - कोई दुनिया को यह सिखाने की कोशिश आखिर क्यों कर रहा है कि लाखों लोगों की जान लेने वाले वायरस कैसे बनाए जाते हैं? दुनिया में तबाही मचाने में सक्षम परमाणु भौतिकी की तरह महामारी जीव विज्ञान के प्रसार को भी वैश्विक सुरक्षा से जुड़ा विषय समझा जाना चाहिए। परमाणु हथियार बनाने के लिए तो राष्ट्रीय-राज्यीय संसाधनों की जरूरत होती है, पर बहुत से लोग अब स्वयं वायरस बनाने व उनके साथ छेड़छाड़ करने लगे हैं। बायोटेक्नोलॉजी के बारे में कुछ लोग यहां तक दावा करते हैं कि यह कोई भी अपने गैराज में ही कर सकता है, लेकिन यह गलत है। बायोइंजीनियरिंग के लिए वर्षों प्रशिक्षण की जरूरत होती है। फिर भी ऐसे लोग कम नहीं है जो सिंथेटिक डीएनए से वायरस बना सकते हैं। एमआइटी में मेरी अपनी लैब में पांच लोग ऐसा करने में सक्षम हैं।

तो नए महामारी वायरस की खोज क्यों की जाए? लुभाने वाला विचार यह है कि शोधकर्ता अनुमानित पांच लाख जीव-जंतु वायरसों में से अगली महामारी फैलाने में सक्षम वायरस के बारे में जान सकते हैं, और फिर सबसे जोखिमपूर्ण वायरसों के खिलाफ सुरक्षा चक्र तैयार कर सकते हैं। लेकिन ऐसे एक वायरस की पहचान करने का मतलब है, हजारों लोगों को इसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का मौका देना। खतरनाक वायरसों की खोज करना या कमजोर वायरस की ताकत बढ़ाना ऐसा ही है, जैसे महामारी के शस्त्रागार का ब्लूप्रिंट साझा करना। इससे पहले कि हम परमाणु हथियारों जितने घातक वायरसों की खोज करें, हमें इनके दुरुपयोग के परिणामों को जान लेना चाहिए। मानवता का कोई एक शत्रु भी दुनियाभर में अलग-अलग स्थानों पर एक से अधिक महामारी वायरसों को इस तरह फैला सकता है कि नियंत्रण असंभव हो जाए। शुक्र है कि हम अभी तक ऐसे किसी पशु जनित वायरस के बारे में नहीं जानते, पर 'गेन-ऑफ फंक्शन' रिसर्च प्रोजेक्ट यदि ऐसे वायरस विकसित करने में कामयाब हुए तो जो अभी तक नहीं हुआ, वह होगा।

विश्व की कई स्वास्थ्य एजेंसियां महामारी कारक वायरस की खोज, अध्ययन व रैंक-ऑर्डर तय करने के प्रयासों को निधि मुहैया करा रही हैं। लेकिन सुरक्षा और अप्रसार इन वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण व जिम्मेदारी का हिस्सा नहीं हैं। ऐसे अनुसंधान जुआ हैं और इनके लिए मानव सभ्यता को जोखिम में नहीं डाला जा सकता। प्राकृतिक महामारियां अपरिहार्य हो सकती हैं, लेकिन ऐसी सिंथेटिक महामारियां नहीं जिनसे समाज के लिए पैदा होने वाले जोखिमों की पूरी जानकारी हो। हमें महामारियों को जन्म देना नहीं सीखना चाहिए, जब तक कि पूरे विश्वास के साथ हम उनसे मानवता की रक्षा करने में सक्षम न हो जाएं।

(द वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत)

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