Patrika Opinion : तोड़नी होगी आतंकियों के मददगारों की कमर

पिछले एक सप्ताह के दौरान घाटी में आम नागरिकों पर हमले की घटनाओं और जवानों के साथ हुुई इस मुठभेड़ से यह अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर में वे लोग अमन-चैन के हालात नहीं बनने देना चाहते, जो आतंक के पोषक और आतंकियों के खैरख्वाह हैं।

By: Patrika Desk

Published: 13 Oct 2021, 07:39 AM IST

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के सफाए के लिए सेना और स्थानीय सुरक्षा बलों के अभियान के बीच एलओसी से सटे पीर पंजाल इलाके में आतंकियों के साथ मुठभेड़ में सेना के पांच जवानों की शहादत ने सीमा पार से हो रही घुसपैठ के खतरों की ओर फिर आगाह किया है। समूचे घटनाक्रम को लेकर जो जानकारी सामने आई है, उससे लगता है कि आतंकियों को सुरक्षाबलों की कार्रवाई की भनक पहले ही लग चुकी थी और वे घात लगाकर हमले के लिए तैयार बैठे थे। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि आतंकियों को घेरने गए सुरक्षा बलों को आतंकियों की संख्या और उनके पास मौजूद हथियारों के बारे में सही अंदाजा नहीं लग पाया।

पिछले एक सप्ताह के दौरान घाटी में आम नागरिकों पर हमले की घटनाओं और जवानों के साथ हुुई इस मुठभेड़ से यह अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर में वे लोग अमन-चैन के हालात नहीं बनने देना चाहते, जो आतंक के पोषक और आतंकियों के खैरख्वाह हैं। यह आशंका भी सच होती दिख रही है कि अफगानिस्तान में तालिबानियों के सत्ता पर काबिज होने के बाद घाटी में भी आतंकी सिर उठा सकते हैं। अहम सवाल यह भी है कि कहीं हमारे खुफिया तंत्र को आतंकियों के बारे में दी जा रही सूचनाओं को लेकर गुमराह तो नहीं किया जा रहा? यह भी हो सकता है कि सेना के ऑपरेशन की जानकारी पहले से ही आतंकियों के पास पहुंच जाती हो? दोनों ही स्थितियों में जरूरत इस बात की है कि उन लोगों पर नकेल कसी जाए, जो आतंकियों और आतंकी संगठनों के मददगार बने हुए हैं। खास तौर से घाटी में तो यह कहा जा रहा है कि जैसे ही वहां आतंकवाद की कमर तोडऩे के प्रयास होते हैं, नए नाम से आतंकी संगठन खड़े हो जाते हैं। अब वहां अल्पसंख्यकों को जिस तरह से निशाना बनाया जा रहा है, उससे भी लगता है कि आतंकी घटनाओं को अंजाम देकर लोगों में डर बैठाने का प्रयास हो रहा है। हिन्दुओं की घाटी में घर वापसी के प्रयास रोकने के लिए ऐसा किया जा रहा है।

जाहिर है स्थानीय लोगों की मदद के बिना आतंकी अपने नापाक मंसूबों को अंजाम नहीं दे सकते। हमारे जवानों की शहादत भी इसीलिए हो रही है, क्योंकि आतंकियों के मददगारों की कमर अभी पूरी तरह टूटना बाकी है। पिछले एक दशक के दौर में घाटी में आतंकी संगठनों ने स्थानीय युवाओं को गुमराह कर अपना खुफिया तंत्र अलग से बना लिया है। यह तंत्र उनका मददगार साबित हो रहा है। ऐसे में सबसे पहले इस नेटवर्क को तोडऩा जरूरी है, जो आतंकियों को प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप में मदद कर रहा है।

Patrika Desk
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned