आर्ट एंड कल्चर : दिलों को जोड़ता वह खाली कोना

बच्चों की उच्छृंखल उड़ान की जगहों को या तो पार्कों में बांध दिया गया या स्टेडियम में ।

By: विकास गुप्ता

Published: 11 Jun 2021, 09:26 AM IST

विनोद अनुपम

बहुत ही शालीनता और व्यवस्थित रूप से चलने वाले 'समर कैंपों' से उसकी भरपाई शायद ही कभी हो ,जो हमने अपने गांव या कस्बे के कोने में जमीन के एक छोटे से टुकडे को बिना नागा हासिल की थी। 50 की उम्र तक पहुंच चुके लोगों की स्मृतियों में कस्बे की वह खाली जगह अब भी कायम होगी, जहां उनके पसीने गिरते थे और कभी खून भी। कस्बे की वह खाली जगह एकदम खाली होती थी, बाउंड्री भी नहीं, बस किनारे-किनारे जंगली कांटेदार झाडिय़ां और पैरों से मसली जा चुकी सूखे घास। जमीन का वह टुकड़ा किसका होता था, किसलिए होता था, यह तो कभी जानने की कोशिश ही नहीं की जाती थी। पूरे अधिकार से हम वहां जमा होते, कंचे, लट्टू से लेकर फुटबॉल और क्रिकेट तक पूरी गंभीरता से खेले जाते। गिरते, घुटने फूटते, कोहनियां छिलतीं, वहीं की मिट्टी रगड़ कर वहीं इलाज भी हो जाता, घर में चोट दिखाने का तो मन में ख्याल भी नहीं आता। आज स्मृतियों में जाने पर लगता है, उस समय ऐसा क्या था कि न तो हमें धूप लगती थी, न ही गर्म हवा का डर, मां-बाबू जी की डांट और मार से तो हमारी पीढ़ी बेअसर थी ही।

वर्ष 2017 में बनी मलयालम फिल्म 'रक्षाधिकारी बैजू ओप्पू' हमें उस नास्टेलजिया में ही नहीं ले जाती, जीवन के उस बेतरतीब से लगते समय के सामाजिक सांस्कृतिक महत्त्व को भी रेखांकित करती है, जिसे समझने और अहसास करने की क्षमता उस समय तो हममें नहीं ही रही होगी। बैजू एक प्रौढ़ हो रहे व्यक्ति की कहानी है, जिसने अपने गांव के जिस खाली कोने पर खेलते हुए बचपन की शुरुआत की थी, उसे आने वाली पीढ़ी के लिए भी उसी तरह उपयोगी बनाए रखने की जिद में अपनी सरकारी नौकरी के बावजूद लगा है। उस छोटी सी खाली जगह का महत्त्व सिर्फ बच्चों के खेल के लिए नहीं है, वह पूरे गांव को एक सूत्र में बांधे रखने का माध्यम भी है।

मुश्किल यह है कि विकास की एक अजीब सी समझ की नियति हम झेल रहे हैं। शहरों में बच्चों की उच्छृंखल उड़ान की तमाम जगहों को या तो पार्कों में बांध दिया गया या स्टेडियम की चारदीवारी में बंद कर दिया गया, जहां सारा का सारा जोर बस निजी उपलब्धियों पर दिया जा रहा। 'रक्षाधिकारी बैजू ओप्पू' का भी अंत यही है। बुलडोजर और जेसीबी से पेड़ गिरा दिए जाते हैं और सामाजिकता के उस केंद्र को टीन की चादरों में बंद कर दिया जाता है। महामारी कोरोना तो आज की बात है, सोशल डिस्टेंसिंग तो इस पीढ़ी को हम न जाने कब से सिखा रहे हैं। 'रक्षाधिकारी बैजू ओप्पू' देखना इसलिए भी जरूरी है कि यह पीढ़ी कस्बे के उस कोने को जान सके, जहां कभी सारी डिस्टेंसिंग खत्म करने की सीख मिलती थी।

(लेखक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक हैं)

विकास गुप्ता
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned