राहत भरे फैसले

राहत भरे फैसले

Sunil Sharma | Publish: Mar, 14 2018 01:51:46 PM (IST) विचार

सरकार की सभी योजनाओं को आधार से जोडक़र जनता को लाभ पहुंचाने की मंशा होगी, लेकिन इससे जुड़ी परेशानियों पर भी विचार करना चाहिए।

आधार को बैंक खातों और मोबाइल से जोडऩे की अनिवार्यता की समय सीमा बढ़ाए जाने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला करोड़ों लोगों को राहत देने वाला है। राहत की एक और खबर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने दी है। बैंक ने न्यूनतम शेष (मिनिमम बैलेंस) पर लगने वाले जुर्माने की राशि में ७५ फीसदी कटौती की है। अदालत और बैंक के दोनों फैसले स्वागत योग्य हैं। लेकिन ये दोनों फैसले एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं, जिसका जवाब हर कोई जानना चाहता है।

सवाल ये कि आधार की अनिवार्यता के मामले में जो राहत अदालत ने दी, वह सरकार ने क्यों नहीं दी। अदालत ने साफ कहा कि सरकार अनिवार्य आधार के लिए बाध्य नहीं कर सकती। सरकारों का काम जनता को परेशानियों से बचाना होता है न कि उन पर अनावश्यक बोझ लादना। आधार की अनिवार्यता का मामला सिर्फ बैंक खातों या मोबाइल से जोडऩे तक सीमित नहीं है। भविष्य निधि खातों, जीवन बीमा पॉलिसी, गैस कनेक्शन और रोजमर्रा की अन्य सुविधाओं को भी आधार से जोडऩे की अनिवार्यता की गई है।

सरकार अपनी सभी योजनाओं को आधार से जोडक़र जनता को लाभ पहुंचाने की इच्छा रखती होगी लेकिन ऐसा करने में आने वाली परेशानियों की तरफ उसे विचार करना चाहिए। सरकार को ऐसी अनिवार्यता लागू करने से पहले ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए, जिससे व्यक्ति एक ही स्थान पर अपने आधार को सभी योजनाओं से जोड़ सके। पासपोर्ट के लिए आधार नम्बर की अनिवार्यता के चलते अनेक जगह पासपोर्ट अधिकारियों ने पासपोर्ट रिन्यू करने से इंकार तक कर दिया। सुप्रीम कोर्ट इन्हीं परेशानियों को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।

इसी तरह बैंकों में न्यूनतम जमा से कम राशि होने पर लगाए जाने वाला जुर्माना भी ग्राहकों के साथ अन्याय है। एक तरफ बैंकों को करोड़ों-अरबों रुपए की कर्ज राशि वसूल नहीं हो रही, तो दूसरी तरफ बैंक प्रबंधन आम आदमी पर अलग-अलग तरह के शुल्क लगाकर परेशान कर रहा है। सरकार को चाहिए कि तमाम बैंकों द्वारा लगाए जाने वाले इस तरह के शुल्कों पर नजर रखे। बैंकों को मनमानी करने की छूट किसी भी हालत में नहीं दी जानी चाहिए। बैंकों का प्रमुख उद्देश्य ग्राहकों को सुविधा पहुंचाना होना चाहिए, न कि लाभ कमाना।

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