अब दौडऩा पड़ेगा

आखिर देश की शीर्ष अदालत ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ के बुधवार को आए फैसले ने देश की संघीय शासन प्रणाली पर चोट पहुंचाने की कोशिश को विफल कर दिया है।

By: भुवनेश जैन

Updated: 24 Jul 2018, 09:30 PM IST

भुवनेश जैन

आखिर देश की शीर्ष अदालत ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ के बुधवार को आए फैसले ने देश की संघीय शासन प्रणाली पर चोट पहुंचाने की कोशिश को विफल कर दिया है। दिल्ली राज्य में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार का ‘असली’ शासन बहाल हो गया है।

साढ़े तीन साल पहले 2015 में विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीतकर आम आदमी पार्टी की सरकार ने सत्ता संभाली थी। इस सरकार के कामकाज पर शुरू से ही पूरे देश की निगाहें थीं। इसका कारण था कि आम आदमी पार्टी के रूप में भारत में एक नए तरह का प्रयोग हो रहा था। कांग्रेस और भाजपा की धर्म और जाति आधारित राजनीति के विपरीत इस पार्टी ने राजनीति की अलग धार चुनी थी।

देश-विदेश में अनेक बुद्धिजीवी, पत्रकार, वकील और व्यवसायी खासतौर से युवा वर्ग इससे जुड़ा। सबको उम्मीद थी कि पार्टी कुछ अलग करके दिखाएगी। लेकिन पूरे देश ने देखा कि शुरुआत करते ही, आम सरकार के कामकाज में व्यवधान डाले जाने शुरू हो गए। केन्द्र सरकार की ओर से नियुक्त संस्थाओं ने ऐसे-ऐसे कदम उठाए, कि सरकार को रोजमर्रा के काम करने मुश्किल हो गए। कभी विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी, कभी विधायकों को गिरफ्तार कर लिया गया। व्यर्थ के मुकदमे ठोक दिए गए तो कभी अफसरों ने असहयेाग शुरू कर दिया।

व्यवधान की इस राजनीति में सबसे बड़े हथियार बने उपराज्यपाल। पहले नजीब जंग और फिर अनिल बैजल। दिल्ली सरकार अपने छोटे-बड़े सभी निर्णयों के लिए उपराज्यपाल की मोहताज हो गई। नजीब जंग ने तो बाद में अमरीका जाने से पहले अपने एकतरफा निर्णयों के लिए आप नेताओं से अफसोस भी प्रकट किया। वह अपनी मर्जी से किसी अफसर का तबादला तक नहीं कर सकती थी। उसकी कई योजनाएं उपराज्यपालों ने ठंडे बस्ते में डाल दीं।

आखिर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को उपराज्यपाल के निवास पर धरना शुरू करना पड़ा। एक तरफ सत्ता का अहंकार और दूसरी ओर सरकार बनाकर भी कुछ न कर पाने की लाचारी। ऐसी स्थिति भारतीय लोकतंत्र केे इतिहास में पहले शायद ही कभी बनी हो। देश उच्चतम न्यायालय का ऋणी रहेगा जिसने लोकतंत्र को बेडिय़ों में जकडऩे की कोशियों को नाकाम कर दिया।


दिल्ली सरकार की असली परीक्षा अब शुरू होनी है। उसके पास जश्न मनाने का समय नहीं है। अब काम करके दिखाना होगा। अब वह ज्यादातर मामलों में स्वत: निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है।

पिछले साढ़े तीन साल में मोहल्ला क्लिनिकों, बिजली और पानी के बिलों में कटौती, सरकारी स्कूलों में सुधार जैसे कई कार्य तो हुए हैं, पर दिल्ली की जनता की अपेक्षाएं बहुत ज्यादा हैं और काम करने के लिए समय कम। किसी विफलता के लिए अब वह स्वयं जिम्मेदार होगी।

हालांकि अवरोध किसी न किसी रूप में अब भी सामने आ सकते हैं। देखना है कि इन अवरोधों को पार करते हुए आने वाले कुछ महीनों में वह कितना तेज दौड़ पाती है। इस दौड़ में उसकी जीत या हार देश में लोकतंत्र के भावी स्वरूप को तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगी।

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