स्वास्थ्य सेवाओं के प्रबंधन की चुनौती

जब हमें कोरोना वायरस के साथ ही रहना है तो फिर बड़ी चिंता स्वास्थ्य सेवाओं के प्रबंध की भी करनी होगी। ऐसी चिंता जिसमें हमारे यहां आपातकाल के साथ-साथ सामान्य परिस्थितियों में भी लोगों को सुलभ और त्वरित उपचार मिल सके।

By: Prashant Jha

Published: 21 May 2020, 02:06 PM IST

डॉ. अशोक चौधरी, स्वास्थ्य प्रबंधन के जानकार

पहले कहा गया था कि कोरोना को भगाना है। और, अब कहा जा रहा है कि इसी के साथ रहना है। कारण साफ है। कोरोना संक्रमण का टीका बनने में अभी काफी वक्त लग सकता है। किसी वायरस को मारने की दवा आज तक नहीं बनी है। वायरस जब शरीर से बाहर होता है तो कैमिकल से मरता है। लेकिन शरीर के अंदर होता है तो भीतरी कौशिकाएं ही इसे मार सकती है। फिलहाल तो इस अज्ञात वायरस को समझना ही मुश्किल हो रहा है।

जब हमें कोरोना वायरस के साथ ही रहना है तो फिर बड़ी चिंता स्वास्थ्य सेवाओं के प्रबंध की भी करनी होगी। ऐसी चिंता जिसमें हमारे यहां आपातकाल के साथ-साथ सामान्य परिस्थितियों में भी लोगों को सुलभ और त्वरित उपचार मिल सके। न केवल राजस्थान बल्कि देश भी में चिकित्सा और स्वास्थ्य प्रशासन में बड़े परिवर्तन की जरूरत है। राजस्थान में तो इस कोरोनाकाल में नियमित चिकित्सा निदेशक तक नहीं है। स्वास्थ्य सेवाएं और कानून-व्यवस्था की भूमिका सबसे अहम होती है यह हमें इस दौर में अच्छी तरह से समझ आ गई होगी।

देख जाए तो स्वास्थ्य सेवाओं में नियमित चिकित्सा व इन सेवाओं के प्रबंध को अलग-अलग देखना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं के प्रबंध का एक अलग से कॉडर बनाया जाना चाहिए. अभी तो हालत यह है कि कोई चिकित्सा अधिकारी कुछ समय तो प्रशासन संभालता है और अचानक उसे किसी अस्पताल में नियुक्त कर दिया जाता हैे। ये दोनों काम अलग-अलग तरीके के हैं। अनुभव की उपेक्षा होने लगे तो उसका नुकसान आम जनता को ही भुगतना पड़ सकता है। जिला व ब्लॉक स्तर पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी व ब्लाक चिकित्सा अधिकारी किसी भी स्थान की चिकित्सा व्यवस्थाा की अहम धुरी होते हैं। इन पदों पर चयन ऐसे लोगों का करना होगा जो आपदा के वक्त नेतृत्व क्षमता प्रदान कर सके।

नेशनल हेल्थ मिशन जब वर्ष 2005 से शुरू हुआ तो इस मिशन में जनभागीदारी और स्थानीयता को महत्व दिया गया था। परन्तु चिकित्सा व्यवस्था से जुड़े कई फैसले अभी तक भी केन्द्रीयकृत हैं। कमीशनखोरी के चक्कर में घटिया, महुगअभी भी जयपुर और जिले में सभी निर्णय होते हैं और उसका दुष्प्रभाव स्थानीय सेवाओं पर प?ता है. कमीशन के चक्कर में घटिया, महंगी और बेहिसाबी सामग्री का खरीदा जाना आम हो गया है। इसलिए सीएचसी (सामुदायिक विकास केन्द्र) और पीएचसी (प्राथमिक स्वास्य केन्द्र) को इस मिशन का अस्सी प्रतिशत हिस्सा दिया जाना चाहिए ताकि वे स्थानीय जरूरतों के अनुसार आधारभूत सामग्री खरीद सकें।

गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मरीजों का हो सर्वे:
गम्भीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों का सर्वे होना चाहिए। यह सतत प्रक्रिया होनी चाहिए। क्योंकि कोरोना जैसे संक्रमणकारी वायरस से ज्यादा खतरा ऐसे मरीजों को ही होता है। इन लोगों की सार-संभाल पर सर्वाधिक प्राथमिकता देनी होगी। इस श्रेणी के मरीजों के नि:शुल्क और त्वरित उपचार की नीति बनानी होगी। किसी भी किस्म की समस्या होने पर ऐसे मरीजों को तत्काल आईसीयू सुविधा वाले चिकित्सा केन्द्रों तक पहुंचाना होगा।

कोरोना की दूसरी लहर अभी आनी बाकी है। बरसात के बाद और सर्दियों में भी ऐसा हो सकता है। विशेषज्ञों की मानें तो साठ प्रतिशत आबादी में संक्रमण होने पर यह वायरस स्थायी यानि स्टेबल हो जाएगा। इसके लिए आमजन को इससे नहीं डरने की सलाह व्यापक स्तर पर दी जानी चाहिए और इसके उपचार की व्यवस्था पीएचसी. स्तर पर की जानी चाहिए। जांच सीएचसी. पर हो। . इस प्रकार की व्यवस्था से कोरोना के बहाने अन्य बीमारियों का उपचार भी हो सकेगा। वैसे भी एक नए वायरस की मानव के साथ समायोजित या एडजस्ट होने की स्वाभाविक प्रक्रिया होती है। अब तक भी हमने देखा है कि अधिकतर लोग कोरोना के संक्रमण के बाद ठीक भी हो गए हैं।

दुर्भाग्य से मौतें उन्हीं लोगों की हुई हैं, जिनकी उम्र साठ से ऊपर थी और जिनमें पहले से अन्य गंभीर बीमारियां थीं। उनमें भी रोग प्रतिरोधक क्षमता का कम होना मुख्य कारण था। स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण का खतरा भी कोरोनाकाल में उभर कर सामने आया है। हमने देखा कि आपातकाल में निजी अस्पतालों ने हाथ झटक दिए। संतोष इस बात पर किया जाना चाहिए कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण अभी दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले काफी कम है। यही वजह है कि कोरोना के मुकाबले के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से जुटे कोरोना योद्धा जी जान से जुट रहे हैं। इन हालात से सबक लेते हुए भविष्य में सरकारों को भी निजीकरण के गीत कम गाने होंगे।

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