फिर कट्टरपंथ के अंधे युग की आहट

तालिबान का दावा है कि अफगानिस्तान के 85 फीसदी इलाकों पर उसका कब्जा हो चुका है और वह लगातार आगे बढ़ रहा है।

खतरे को भांपते हुए भारत ने कंधार में अपने वाणिज्य दूतावास के कर्मचारियों को वापस बुलाने का फैसला किया है।

By: विकास गुप्ता

Published: 12 Jul 2021, 08:03 AM IST

अमरीकी सेना की वापसी के बाद अफगानिस्तान में सिर उठा रहा संकट बाकी दुनिया के साथ-साथ भारत के लिए भी बेहद चिंताजनक है। तालिबान इसी फिराक में था कि कब अमरीकी सेना हटे और उसे फिर इस उजड़े देश में अपना दबदबा कायम करने का मौका मिले। तालिबान का दावा है कि अफगानिस्तान के 85 फीसदी इलाकों पर उसका कब्जा हो चुका है और वह लगातार आगे बढ़ रहा है। तालिबान की इस बढ़त से अफगानिस्तान में फिर गृह युद्ध का खतरा मंडरा रहा है। इस बार तालिबान के हौसले इसलिए भी बुलंद हैं कि पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के लड़ाके उसका साथ देने के लिए अफगानिस्तान में मौजूद हैं। खतरे को भांपते हुए भारत ने कंधार में अपने वाणिज्य दूतावास के कर्मचारियों को वापस बुलाने का फैसला किया है।

तालिबान के बदले हुए तेवर अफगानिस्तान में भारत विरोधी देशों के बीच नए समीकरणों के संकेत भी दे रहे हैं। अफगानिस्तान की खनिज सम्पदा पर नजरें गड़ाए चीन को तालिबान ने अपना 'दोस्त' करार दिया है और कहा है कि देश के पुनर्निर्माण में वह चीन के निवेश पर बातचीत करना चाहता है। अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण पर भारत अब तक भारी निवेश कर चुका है। तालिबान ही नहीं, पाकिस्तान को भी वहां भारतीय निवेश कितना खटक रहा है, यह पाकिस्तानी फौज के प्रवक्ता मेजर जनरल बाबर इफ्तिखार के बयान से साफ हो जाता है।

उन्होंने कहा - 'अफगानिस्तान में भारत का निवेश डूबता नजर आ रहा है, क्योंकि यह अच्छी नीयत से नहीं किया गया था।' अफगानिस्तान को लेकर पाकिस्तान कितनी 'अच्छी नीयतÓ रखता है, यह असलियत सारी दुनिया जानती है। तालिबान की दोस्ती की पेशकश पर चीन ने फिलहाल अपने पत्ते नहीं खोले हैं। उसने अफगानिस्तान में उपजे खतरों से निपटने के लिए पाकिस्तान से सहयोग का आग्रह किया है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी का कहना है कि उनका देश पाकिस्तान के साथ मिलकर अफगानिस्तान में संवाद के जरिए राजनीतिक हल के लिए सभी पक्षों को समर्थन देना चाहता है। जाहिर है, राजनीतिक हल की आड़ में चीन का इरादा अफगानिस्तान में भी निवेश का वही खेल खेलने का है, जो वह कई छोटे देशों में खेल चुका है।

भारत को अफगानिस्तान के ताजा घटनाक्रम पर नजर रखनी होगी, क्योंकि वहां उभरने वाले समीकरण देश की सुरक्षा के लिए खतरे पैदा कर सकते हैं। इस घटनाक्रम को लेकर भारत सरकार चिंतित है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर की हालिया ईरान यात्रा को इस चिंता से जोड़कर भी देखा जा रहा है। ईरान कई साल से जोर दे रहा है कि बातचीत के जरिए अफगानिस्तान संकट का स्थायी हल खोजा जाना चाहिए। भारत और ईरान की तरह दूसरे प्रमुख देशों को भी इस दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए। तालिबान की बढ़ती ताकत अफगानिस्तान को फिर जिद्दी कट्टरपंथ के अंधे युग में धकेल सकती है। ऐसा हुआ तो यह पूरी दुनिया के लिए बड़ा खतरा होगा।

विकास गुप्ता
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