आशंकाओं और संभावनाओं का गहरा है तालिबानी जाल

बीते दशकों में जिस तरह विदेश नीति को लेकर अनुमान गलत साबित हुए हैं, इस फैसले का समर्थन भी बेसब्री का नतीजा हो सकता है।
अफगानिस्तान को सभी से और विनम्रता की दरकार।

By: विकास गुप्ता

Published: 16 Apr 2021, 07:43 AM IST

जेनिफर रुबिन, स्तम्भकार

अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने बुधवार को ऐलान किया - 'मैं अमरीका का चौथा राष्ट्रपति हूं जिसके कार्यकाल में अफगानिस्तान में अमरीकी सैनिक मौजूद हैं।... मैं इस जिम्मेदारी को पांचवें राष्ट्रपति के लिए नहीं छोड़ूंगा।' सशर्त सेना वापसी प्रक्रिया की बजाय उन्होंने घोषणा की कि अफगानिस्तान से सभी सैन्य बलों की वापसी 11 सितंबर यानी 'ट्विन टावर' आतंकी हमले की 20वीं बरसी तक हो जाएगी। उन्होंने कहा- 20 वर्ष पहले हुए एक भीषण हमले के कारण हम अफगानिस्तान गए थे। इस तथ्य के बावजूद यह समझाया नहीं जा सकता कि हमें 2021 में भी वहां क्यों रहना चाहिए। बाइडन ने कहा - तालिबान के साथ युद्ध में लौटने के बजाए हमें उन चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करना है जो आज और आने वाले वर्षों में हमारे रुख व जवाबदेही को तय करेंगी।

अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा कि मातृभूमि के खिलाफ आतंकी खतरे को निष्क्रिय करने का हमारा लक्ष्य पूरा हो गया। 'हमने ऐसा कर दिखाया', उन्होंने दृढ़ता से कहा। उन्होंने वापसी को लेकर 'जल्दबाजी' से बचने का वादा किया और कहा कि अफगानिस्तान हो या अन्य कहीं, आतंकी नेटवर्क की निगरानी और खात्मे के लिए अपनी आतंकरोधी क्षमता का पुनर्गठन करते हुए अमरीका मित्रराष्ट्रों के साथ सहयोग बनाए रखेगा। जो लोग लम्बे अर्से से 'हमेशा के लिए युद्ध को खत्म करने की' वकालत करते रहे हैं, वे खुश हैं। तो आलोचक कह रहे हैं कि यह उतावलापन है और नैतिक रूप से सवाल खड़े करता है कि क्या अचानक अफगानियों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए। संभवत: यह वक्त है कुछ विनम्रता से काम लेने का, जिसकी लम्बे समय से दरकार थी। मुख्यधारा के मीडिया से जुड़े कुछ लोगों और थिंक टैंक ने बीते कुछ दशकों में विदेश नीति के बारे में ढेर सारी गलतियां की हैं। तार्किक रूप से जो तब ठीक लग रहा था, अक्सर दुखदायी और गलत साबित हुआ।

उदाहरण स्वरूप, इराक में बड़े पैमाने पर घातक हथियारों का होना, यह वादा कि पूंजीवाद से चीन में राजनीतिक उदारीकरण आएगा, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की एक सुधारक के रूप में भूमिका होगी और यह धारणा कि अरब राष्ट्रों से रिश्ते सुधारने से पहले इजरायल को फिलीस्तीनियों के साथ शांति कायम करनी होगी आदि। वामपंथियों ने भी कभी सोवियत संघ के पतन की उम्मीद नहीं की थी। तब कंजरवेटिव्स और मेरा भी अनुमान था कि संयुक्त समग्र कार्ययोजना से ईरान से निश्चित टकराव होगा, फिर भी यह कार्ययोजना अपना काम करती रही। अधिकतम दबाव व्यर्थ गया और ईरान ने अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम बढ़ाया। जिन लोगों ने इन घटनाओं को लेकर गलत पूर्वानुमान लगाए, संभव है बाइडन के इस फैसले को लेकर उनका रुख भी बेसब्री का नतीजा हो। बातचीत के दौर में तालिबान की कट्टरता, नागरिकों पर जारी उनके हमलों और अल-कायदा से नाता तोडऩे को लेकर उनका इनकार दुनिया ने देखा है। फिर भी, बाइडन के इस कदम के आलोचकों को सोचना चाहिए कि विदेश नीति के अनुमानों का रेकॉर्ड कुछ दशकों में सड़-गल गया है।

यह संभव तो है कि बीस वर्ष बाद अफगान शासन तालिबान के साथ तालमेल बैठाने में बेहतर रूप से सक्षम हो। कारण, महिलाओं के अधिकार अब पर्याप्त रूप से सुरक्षित हैं जिससे काले युग की वापसी न हो, लोग सख्त इस्लामिक शासन को बर्दाश्त न करें और अमरीका अपनी धरती को आतंकियों से खतरे के संकेतों पर नजर रख पाए। यह भी संभव है कि अमरीकी प्रशासन का आकलन सही हो कि आतंकी खतरा अब पहले से कम हो चुका है, तो संभव यह भी है कि हम सेना वापसी के लाभों को कम आंक रहे हों। कुछ भी हो, बाइडन का फैसला सही साबित हो, हमें यही प्रार्थना करनी चाहिए। ईश्वर पश्चिमी जगत और अफगानिस्तान की मदद करें।

विकास गुप्ता
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