शिक्षक: चुनौतियों से जूझता गरिमामय पेशा

Sunil Sharma

Publish: Sep, 05 2017 04:10:00 (IST)

Opinion
शिक्षक: चुनौतियों से जूझता गरिमामय पेशा

तमाम चुनौतियों के बावजूद शिक्षक अपनी गरिमा बनाए रखने की जद्दोजहद से जूझना जानता है

- अतुल कनक, वरिष्ठ टिप्पणीकार

तमाम चुनौतियों के बावजूद शिक्षक अपनी गरिमा बनाए रखने की जद्दोजहद से जूझना जानता है। यही कारण है कि आज भी बड़े मुकाम पर पहुंचे लोग भी शिक्षकों से सामना होते ही नतमस्तक होते हैं। आज शिक्षक दिवस पर विशेष:

शिक्षक व शिक्षा के बारे में परंपरागत भारतीय दृष्टि बहुत सकारात्मक रही है। कहा भी है ‘सा विद्या या विमुक्तये।’ अर्थात् विद्या वही है जो व्यक्ति को मुक्त करे। यह मुक्ति की चाह जीवन के तमाम दुराग्रहों से रहित होने की चाह है। वहीं गुरु शिक्षा के माध्यम से शिष्यों की चेतना में मुक्ति के इस संस्कार को प्रगाढ़ करता है।

गुरुकुल परंपरा के दौर में दो तरह के शिक्षक समाज में थे। एक वे जो विद्यादान के बदले शुल्क स्वीकार करते थे और दूसरे वे जो नि:शुल्क शिक्षा दिया करते थे। भारतीय समाज में विद्या के दान को सबसे बड़ा दान माना गया है। नि:शुल्क विद्या दान का संकल्प लेकर जीने वाले व्यक्ति के परिवार की भी आवश्यकताएं तो होती ही थीं, इसलिये समाज में उसे कुछ विशेष अधिकारों से संपन्न किया गया था। शिष्यों के प्रति अपनत्व भाव रखते हुए उन्हें जीवन की समग्रता से अवगत कराना भारतीय शिक्षा व्यवस्था की मूल पहचान थी। इसीलिये विद्यार्थी सारी उम्र अपने शिक्षक के प्रति श्रद्धाभाव से परिपूर्ण रहते थे।

कालांतर में जीवन की जटिलताओं से गुजरते हुए इस व्यवस्था में विकृतियां आईं और इस विशेष सामाजिक सम्मान का लोग दुरूपयोग करने लगे। स्वार्थ, द्वेष और कुंठा का तो हर युग में अस्तित्व रहा है। वरना अपने संकल्प के दम पर श्रेष्ठ धनुर्धर बने एकलव्य से द्रोणाचार्य गुरुदक्षिणा में उसका अंगूठा क्यों मांगते? मैकाले की सिफारिशों के आधार पर जो शिक्षा प्रणाली अंग्रेजों ने लागू की उसका देश को काफी नुकसान हुआ। होना तो यह चाहिये था कि आजादी के बाद ऐसी शिक्षा पद्धति अपनाई जाती जो जीवन के प्रति सकारात्मक बोध जगाती। आपाधापी में हमारे नीति नियंताओं ने उसी शिक्षा पद्धति को अपना लिया। बात इतने तक ही सीमित रहती तो भी गनीमत होती, लेकिन नब्बे के दशक में बाजारवाद की आंधी में सेवा का पर्याय समझी जाने वाली शिक्षा एक बड़ा ‘व्हाइट कॉलर’ व्यवसाय बन गई। इसने विभिन्न स्तरों पर शिक्षकों के शोषण को भी प्रोत्साहित किया।

निजी शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों को कम वेतन मिलने की शिकायतें आम हैं तो सरकारी तंत्र का शिक्षक जनगणना, पशुगणना से लेकर मिड-डे मील की गुणवत्ता बनाए रखने की जिम्मेदारियों में अपनी गरिमा को खपाता रहता है। इस स्थिति ने शिक्षकों के मनोबल पर प्रतिकूल असर डाला है। तमाम चुनौतियों के बावजूद शिक्षक अपनी गरिमा को बनाये रखने की जद्दोजहद से जूझना जानता है। यही कारण है कि आज भी जीवन के विविध क्षेत्रों में बड़े मुकाम तक पहुंचे लोग भी जब अपने शिक्षकों के सम्मुख पहुंचते हैं तो सार्वजनिक तौर पर उनके सामने नतमस्तक नजर आते हैं।

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