9/11 के बीस वर्ष, अभी टला नहीं है आतंक का खतरा

9/11 attack : तालिबान के उत्कर्ष ने भारत के समक्ष नई आतंकी चुनौती खड़ी कर दी है।
- तालिबान प्रवक्ता ने कहा कि वो भारत और कश्मीर के मुसलमानों के लिए आवाज उठाएगा।

By: Patrika Desk

Published: 11 Sep 2021, 11:43 AM IST

विनय कौड़ा, अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ

9/11 attack : अमरीका की धरती पर सबसे घातक आतंकी हमले (Terrorist attack in America) को बीस साल पूरे हो गए हैं। 19 आतंकियों ने चार विमानों का अपहरण कर उन्हें मिसाइल की तरह इस्तेमाल किया था। इस हमले में करीब 3,000 लोग मारे गए थे। इस हमले के बाद विश्व का परिदृश्य नाटकीय तरीके से बदल गया और चीन काफी अक्रामक शक्ति बन कर उभरा। आतंकी हमले का बदला लेने के लिए अफगानिस्तान में अमरीका ने दखल दिया, जो अब इतिहास है। विफलता से क्या सीखा, क्या नहीं, इस पर लम्बे समय तक बहस चलेगी। हालांकि 9/11 वाला अल कायदा अब नदारद है। सिवाय अयमान अल जवाहिरी और सैफ अल अदल के, हर बड़ा नेता मारा जा चुका है। इसके बावजूद अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा होने से अलकायदा के फिर से सिर उठाने से इनकार नहीं किया जा सकता। आतंक प्रतिरोध के तमाम प्रयासों के बावजूद आतंकी खतरा बढ़ा ही है, घटा नहीं। आज दुनिया एक नहीं, बल्कि दो वैश्विक जिहादी आंदोलनों और कई विनाशकारी विचारधाराओं का सामना कर रही है।

संयुक्त राष्ट्र निगरानी समिति की रिपोर्ट के अनुसार 15 अफगानी प्रांतों में अलकायदा मौजूद है। अलकायदा अब भी कई स्थानीय शाखाओं के जरिए अंतरराष्ट्रीय आतंकी कार्रवाइयों को अंजाम देने में सक्षम है। वर्ष 2003 में इराक पर आक्रमण वैश्विक जिहाद से मुकाबले में सबसे बड़ी बाधा साबित हुआ। इससे दक्षिण एशिया से अलकायदा को खत्म करने के महत्त्वपूर्ण संसाधन उसमें काम आ गए। इसके बाद के घटनाक्रम से इस्लामिक स्टेट (आइएसआइएस) का उदय हुआ, जो अलकायदा से ज्यादा खतरनाक है। आइएसआइएस के खतरे से निपटने में 5 साल लगे। इसने आतंकवाद का आधुनिक स्वरूप बदल दिया। आतंकियों की भर्ती के लिए सोशल मीडिया और दुष्प्रचार का सहारा लिया। साथ ही 'लोन वुल्फ अटैक' के रूप में एकल हमलों को बढ़ावा मिला।

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सवाल यह है कि किसी भी देश को आतंकी हमले से बचाने के लिए कितने उपाय पर्याप्त हैं? 9/11 के बाद कई लोकतांत्रिक देशों ने विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों को आतंक के सफाए का अधिकार देकर जरूरत से कहीं ज्यादा प्रतिक्रिया दिखा दी। आतंक के खिलाफ युद्ध के समाज पर प्रभावों के बारे में अध्ययन किया जाना अभी बाकी है। स्थाई रूप से असुरक्षा का भाव, बड़े पैमाने पर निगरानी, इस्लामोफोबिया और बाकी दूसरे फोबिया जैसे विदेशियों से डर जैसी समस्याएं कई देशों में घर कर गई हैं। हालांकि अमरीका ने निगरानी और आतंकियों की खोज के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया, लेकिन ये जल्द ही कई देशों के शस्त्रागार में शामिल हो गए। व्यावसायिक तौर पर इनकी उपलब्धता बढ़ी और कीमत कम हो गई। नतीजतन ड्रोन आतंकियों के हाथ लग गए। आतंकी हमलों के डर से आव्रजन नियंत्रण की नीति लोकप्रिय हुई। सीमा सुरक्षा को नए सिरे से महत्त्व दिया गया। बायोमेट्रिक डेटा आधारित 'स्मार्ट बॉर्डर' की अवधारणा के चलते सीमा पर मोर्चाबंदी बढ़ा दी गई।

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भारत के लिए आइएसआइएस और अलकायदा का खतरा टला नहीं है। जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा अभी सक्रिय हैं। वे तालिबान की जीत से उत्साहित हैं । बड़ी चुनौती है घरेलू और विदेशी आतंकवाद के सम्पूर्ण चक्रव्यूह से निपटना। हालांकि आतंकरोधी उपाय 9/11 जैसी आतंकी घटना दोबारा होने देने से रोकने में सफल रहे हैं। इसके बावजूद घटते राजकोषीय संसाधन के बल पर आतंकी खतरों से सुरक्षा और अन्य प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती है। तालिबान की वापसी और आइएसआइएस से चला आ रहा खतरा अब भी भयावह है, लेकिन अमरीकी रणनीति बदल गई है।

अमरीकी विदेश नीति का फोकस फिलहाल चीन और रूस पर है। साइबर सुरक्षा युद्ध का नया मोर्चा है। सैटेलाइट व ड्रोन आतंक प्रतिरोध के नए हथियार हैं। तालिबान ने भारत को आश्वासन देते हुए कहा था कि वह भारत के कश्मीर सहित किसी भी देश के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देगा। इसके बावजूद हाल ही उसके प्रवक्ता ने कहा कि तालिबान भारत और कश्मीर के मुसलमानों के लिए आवाज उठाएगा। तालिबान के उत्कर्ष ने भारत के समक्ष नई आतंकी चुनौती खड़ी कर दी है।

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